पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई ने शनिवार को कहा कि भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में शक्ति का कोई एक केंद्र नहीं होता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश में संसद नहीं, बल्कि संविधान सर्वोच्च है। कोलंबो विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ’19वें सुजाता जयवर्धने मेमोरियल ओरेशन’ में उन्होंने कहा कि शासन के तीनों अंग – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – अपनी शक्ति संविधान से प्राप्त करते हैं और उसी के दायरे में बंधे हैं।
गवई ने शनिवार को कहा कि भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में शक्ति का कोई एक केंद्र नहीं होता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश में संसद नहीं, बल्कि संविधान सर्वोच्च है।
भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई ने शनिवार को कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र सत्ता के किसी एक केंद्र के इर्द-गिर्द स्थित नहीं होता है और देश में संसद नहीं, बल्कि संविधान सर्वोच्च है. कोलंबो विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित 19वें सुजाता जयवर्धना स्मृति व्याख्यान में, न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि संसद और न्यायपालिका के बीच टकराव के कारण ऐसे संघर्षों के प्रबंधन के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों और सिद्धांतों का विकास हुआ है.
पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि संसद (विधायिका), कार्यपालिका (सरकार) और न्यायपालिका नहीं, बल्कि संविधान सर्वोच्च है. उन्होंने जोर देकर कहा कि तीनों को संविधान से अधिकार प्राप्त होता है और तीनों इससे बंधे हुए हैं.
उन्होंने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र सत्ता के किसी एक केंद्र के इर्द-गिर्द स्थित नहीं होता. यह ऐसी व्यवस्था नहीं है, जिसमें कोई एक संस्था असीमित अधिकार का प्रयोग करती हो. बल्कि, यह एक सुनियोजित व्यवस्था है, जिसमें शक्ति का वितरण किया जाता है और सीमा तय की जाती है.
न्यायमूर्ति गवई ने कहा, भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में संसद किसी भी अर्थ में सर्वोच्च नहीं है. न ही कोई अन्य संस्था सर्वोच्च है. संविधान केवल अपनी सर्वोच्चता को ही मान्यता देता है. सभी संस्थाएं अपना अधिकार इससे प्राप्त करती हैं और सभी इसकी सीमाओं से बंधी हुई हैं.
जस्टिस गवई ने डा. बीआर आंबेडकर के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक अंग अपने क्षेत्र में स्वतंत्र है, लेकिन उनकी सीमाएं संविधान द्वारा निर्धारित हैं। उन्होंने न्यायपालिका को ‘संवैधानिक प्रहरी’ बताया, जिसका कार्य यह सुनिश्चित करना है कि अन्य अंग अपनी सीमाओं का उल्लंघन न करें। उन्होंने आगाह किया कि न्यायिक समीक्षा को ‘न्यायिक अतिरेक’ में नहीं बदलना चाहिए और सक्रियता को दुस्साहस का रूप नहीं लेना चाहिए।
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