पश्चिम बंगाल की राजनीति में सरकारी शिक्षकों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों में भविष्य में नियुक्त होने वाले शिक्षकों के सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेने पर रोक लगाने का फैसला किया है। सरकार के मुताबिक, इस नियम का उद्देश्य शिक्षण व्यवस्था और राजनीतिक गतिविधियों को अलग रखना है। हालांकि, फैसले को लेकर शिक्षक संगठनों और विपक्षी दलों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

SSC भर्ती नियमों में शामिल हुआ नया प्रावधान

नबान्न में हुई कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इस फैसले की घोषणा की। बताया गया है कि नया नियम केवल भविष्य में नियुक्त होने वाले शिक्षकों पर लागू होगा, जबकि पहले से कार्यरत शिक्षकों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।

सरकार ने इस प्रावधान को स्कूल सर्विस कमीशन (SSC) की भर्ती प्रक्रिया के नियमों में शामिल किया है। इसके जरिए नए शिक्षकों के लिए सेवा शर्तों को स्पष्ट करने और स्कूलों में शैक्षणिक जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देने की कोशिश की जा रही है।

सरकार के फैसले को मिला समर्थन

स्कूली शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने इस कदम का समर्थन करते हुए कहा कि सक्रिय राजनीति में शामिल होने के इच्छुक शिक्षकों को अन्य सरकारी कर्मचारियों की तरह सेवा नियमों का पालन करना चाहिए। उनके अनुसार, शिक्षण और सक्रिय राजनीतिक गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना जरूरी है।

वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने भी फैसले का स्वागत किया है। संगठन का मानना है कि इस प्रावधान से शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और शिक्षकों की जिम्मेदारियों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिल सकती है।

शिक्षक संगठनों और विपक्ष ने उठाए सवाल

सरकार के फैसले का विरोध करते हुए वाम समर्थित ऑल बंगाल टीचर्स एसोसिएशन समेत कई शिक्षक संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस नियम से शिक्षकों की राजनीतिक स्वतंत्रता और विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार पर असर पड़ सकता है। साथ ही, सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों पर इसके लागू होने को लेकर भी स्पष्टता की मांग की गई है।

कांग्रेस और CPI(M) के नेताओं ने भी फैसले की आलोचना करते हुए इसे एकतरफा बताया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार शिक्षा व्यवस्था की बुनियादी समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए ऐसे विवादित मुद्दे उठा रही है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि नए नियमों को किस तरह लागू किया जाएगा और शिक्षक संगठनों की आपत्तियों पर सरकार क्या रुख अपनाती है।

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