प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर कर्मचारियों को सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर करने के मामले में अहम टिप्पणी की है. न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर नागरिक को अपने धर्म और आस्था का पालन करने की स्वतंत्रता है. ऐसे में किसी कर्मचारी पर इस तरह की बाध्यता अलग-अलग धर्म और विश्वास रखने वाले लोगों की भावनाओं को प्रभावित कर सकती है.

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आगरा के वी बाजार से जुड़ा है मामला

मामला आगरा के सदर बाजार थाने में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है. विक्रम सिंह उर्फ विश्व विक्रम सिंह ने अपने खिलाफ दाखिल आरोपपत्र, संज्ञान और समन आदेश समेत आपराधिक कार्यवाही को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. आरोप था कि वी बाजार में काम करने वाले विक्रम सिंह ने अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर किया.

वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर कोर्ट ने की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने आवेदन के साथ पेश दस्तावेजों की जांच के बाद कहा कि उनसे स्पष्ट होता है कि कर्मचारियों को लाल टोपी पहनाने की बाध्यता वी बाजार के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से पैदा हुई थी. कोर्ट ने कहा कि इस तरह का निर्देश अलग-अलग आस्था रखने वाले कर्मचारियों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है.

शांतिपूर्ण कार्यस्थल प्रभावित होने की आशंका

कोर्ट ने कहा कि ऐसे निर्देश कार्यस्थल के शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण माहौल को प्रभावित कर सकते हैं. न्यायालय ने आवेदक और उसके वरिष्ठ अधिकारियों को भविष्य में इस तरह के निर्देश दोबारा नहीं देने की चेतावनी भी दी.

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समन आदेश रद्द, शिकायत वाद के रूप में सुनवाई संभव

मामले में विक्रम सिंह पर IPC की धारा 298 और 504 के तहत आरोप लगाए गए थे. हाईकोर्ट ने माना कि ये गैर-संज्ञेय अपराध हैं और पुलिस की ओर से दाखिल आरोपपत्र को सामान्य राज्य मुकदमे के बजाय शिकायत के रूप में माना जाना चाहिए था. कोर्ट ने दिसंबर 2023 में आगरा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समन आदेश को विक्रम सिंह के संबंध में रद्द कर दिया. हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार जरूरत होने पर मामले को शिकायत वाद के रूप में आगे बढ़ाया जा सकता है.