प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि केवल धर्म परिवर्तन करने से किसी व्यक्ति का ST दर्जा अपने आप समाप्त नहीं होता. हालांकि, यदि व्यक्ति अपनी जनजाति के रीति-रिवाज, परंपराएं और सामुदायिक जीवन पूरी तरह छोड़कर दूसरी सामाजिक और धार्मिक पहचान अपना लेता है, तो वह ST को मिलने वाले कानूनी सुरक्षात्मक लाभों का दावा नहीं कर सकता.
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नन्हकी उर्फ नैमुन्निशा की तीन याचिकाएं खारिज
न्यायमूर्ति अरुण कुमार की एकल पीठ ने सोनभद्र निवासी नन्हकी उर्फ नैमुन्निशा की तीन रिट याचिकाएं खारिज कर दीं. याचिकाकर्ता ने दुद्धी के उप जिलाधिकारी के 22 जनवरी 2026 के आदेशों को चुनौती दी थी. इन आदेशों में उसकी जमीनों के बैनामों को अवैध मानते हुए उन्हें राज्य सरकार में निहित करने का निर्देश दिया गया था.
भुईयां ST होने का किया था दावा
याचिकाकर्ता ने खुद को जन्म से भुईयां अनुसूचित जनजाति का सदस्य बताते हुए ST प्रमाण पत्र हासिल किया था. इसके बाद उसने 2011 से 2018 के बीच गोंड ST समुदाय के लोगों से कृषि भूमि खरीदी थी. राजस्व अधिकारियों की जांच में उसके सामाजिक और धार्मिक जीवन से जुड़ी अलग जानकारी सामने आई.
सिराजुद्दीन से इस्लामिक रीति से विवाह
मामले में सामने आया कि नन्हकी ने कई दशक पहले सिराजुद्दीन से इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था और इसके बाद उसका नाम नैमुन्निशा हो गया. उसके बच्चों के नाम भी मुस्लिम नामों के रूप में दर्ज हैं और परिवार रजिस्टर में उसका धर्म मुस्लिम दर्ज बताया गया. हाईकोर्ट ने इसी सामाजिक पहचान और जनजातीय परंपराओं से दूरी को मामले में महत्वपूर्ण माना.
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जमीन के बैनामे अवैध माने गए
राजस्व अधिकारियों ने माना कि संबंधित जमीन खरीदते समय याचिकाकर्ता के पास वैध ST दर्जा साबित करने वाला आधार नहीं था. इसी आधार पर बैनामों को कानून के तहत गलत मानते हुए जमीन राज्य सरकार में निहित करने का आदेश दिया गया. हाईकोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उप जिलाधिकारी के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया और तीनों याचिकाएं खारिज कर दीं.



