डॉ. वैभव बेमेतरिहा, रायपुर। जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया से मेरी पहली मुलाकात कब हुई, यह तो अब ठीक-ठीक याद नहीं। इतना जरूर याद है कि पत्रकारिता में आने के बाद शायद एक दशक पहले उनसे मिलने का अवसर मिला था। हालांकि उन्हें देखने और सुनने का सौभाग्य मुझे बहुत पहले स्कूल के दिनों से ही मिलता रहा था। गांव-गांव, मंच-मंच और रेडियो पर गूंजती उनकी आवाज से मेरा परिचय बचपन में ही हो चुका था।

रेडियो और ऑडियो कैसेट के दौर में लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत केवल गीत नहीं थे, वे छत्तीसगढ़ की मिट्टी की खुशबू, गांवों की आत्मा और लोकजीवन की धड़कन थे। उनकी रचनाओं में प्रेम था, विरह था, संघर्ष था, स्वाभिमान था और सबसे बढ़कर अपनी धरती के प्रति अथाह प्रेम था। आज भी उनके गीत कानों में पड़ते हैं तो मन उसी तरह झूम उठता है जैसे बचपन में झूमता था-
“बखरी के तुमा नार बरोबर…”
“ए ओ मोर पड़की मैना…”
“मोर धरती मईया, जय होवय तोर…”
“भारत मां के रतन बेटा, मयं छत्तीसगढ़िया अंव रे…”
“धनी बिन्ना सुन्ना लागे रे…”
“मन डोले रे मांग फगुनवा…”

ये केवल गीत नहीं हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ के जनजीवन की सामूहिक स्मृतियां हैं। यही कारण है कि उनके अनेक गीत समय के साथ जनगीत बन गए और छत्तीसगढ़ियों की रग-रग में बस गए।

लक्ष्मण मस्तुरिया केवल प्रेम और लोकसंस्कृति तक सीमित नहीं थे। उनके भीतर एक आग भी थी, एक बेचैनी भी और अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने का साहस भी। जब वे सोनाखान के आगी लेकर सामने आए तब लोगों ने उनके भीतर के उस क्रांतिकारी कवि को पहचाना, जो छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान और अस्मिता की मशाल लेकर चल रहा था। “मयं छत्तीसगढ़ के माटी अंव…” जैसे गीतों ने उन्हें केवल कवि नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की चेतना का स्वर बना दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ियों को उनकी पहचान, उनके इतिहास और उनके गौरव का बोध कराया। शायद यही कारण है कि आज जब कोई गर्व से कहता है— “मयं छत्तीसगढ़िया अंव रे”, तो उसमें कहीं न कहीं मस्तुरिया जी के शब्दों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के अनेक चेहरे रहे, लेकिन यदि इस आंदोलन के सांस्कृतिक योद्धाओं की बात की जाए तो लक्ष्मण मस्तुरिया का नाम सबसे आगे दिखाई देता है। उन्होंने गीतों को आंदोलन का हथियार बनाया। उन्होंने जनता की पीड़ा को स्वर दिया, उपेक्षा और शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद की और छत्तीसगढ़ की अलग पहचान के लिए जनभावनाओं को जागृत किया। मस्तुरिया जी के गीतों में छत्तीसगढ़ का दर्द बहुत गहराई से दर्ज है। वे उस पीड़ा को केवल देखते नहीं थे, बल्कि उसे जीते थे। यही वजह है कि उनके गीत सीधे लोगों के हृदय तक पहुंचते थे।

छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद आई चर्चित फिल्म मोर छइंया भुइंया के गीतों में भी यही संवेदना दिखाई देती है। पलायन, गांव और अपनी मिट्टी से बिछड़ने के दर्द को जिस मार्मिकता से उन्होंने शीर्षक गीत में उकेरा, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है— “छइंया-भुइंया ल छोड़ जवइया, तैं थिराबे कहां रे…” दरअसल, लक्ष्मण मस्तुरिया ने केवल छत्तीसगढ़ पर गीत नहीं लिखे, बल्कि छत्तीसगढ़ को जिया।

पत्रकारिता के दौरान उनसे कई बार मिलने और बातचीत करने का अवसर मिला। जितना उन्हें समझ पाया, उतना यह महसूस किया कि वे बेहद स्वाभिमानी, खुद्दार और फक्कड़ इंसान थे। उन्होंने कभी सम्मान, पुरस्कार या प्रसिद्धि के पीछे दौड़ नहीं लगाई। वे अपने सिद्धांतों के साथ जीने वाले व्यक्ति थे। शायद यही कारण था कि वे कभी-कभी लोगों को अक्खड़ भी लगते थे, लेकिन उनके भीतर छल-कपट के लिए कोई जगह नहीं थी।

मुझे आज भी याद है, एक बार छत्तीसगढ़ी राजभाषा के मुद्दे पर आयोजित धरने को कवर करने के दौरान वे मुझ पर नाराज हो गए थे। उस समय उनका गुस्सा मुझे असहज लगा था, लेकिन बाद में समझ आया कि वह नाराजगी किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से थी, जो छत्तीसगढ़ियों की आवाज को पर्याप्त महत्व नहीं देती थी। उनके भीतर अपनी भाषा, संस्कृति और समाज के लिए जो बेचैनी थी, वही कभी-कभी उनके शब्दों में गुस्से के रूप में दिखाई देती थी। इसके बाद उनसे लगातार जुड़ाव बना रहा। होली के अवसर पर उनके घर जाकर कार्यक्रमों को कवर करना, उनके साथ समय बिताना और उन्हें करीब से देखना मेरे पत्रकार जीवन की अनमोल स्मृतियों में शामिल है।

3 नवंबर 2018 की वह सुबह आज भी याद है, जब यह दुखद खबर मिली कि लक्ष्मण मस्तुरिया नहीं रहे। हृदयाघात ने छत्तीसगढ़ की इस महान आवाज को हमेशा के लिए मौन कर दिया। उनके निधन की खबर केवल एक व्यक्ति के जाने की खबर नहीं थी; ऐसा लगा मानो छत्तीसगढ़ ने अपना कोई बेहद अपना सदस्य खो दिया हो।

आज उनकी 77वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए मन बार-बार उसी अधूरे सपने की ओर लौट जाता है, जिसे उन्होंने अपने गीतों और कविताओं में देखा था। सोनाखान के आगी में उन्होंने जो विश्वास व्यक्त किया था, वह आज भी उम्मीद जगाता है—
“एक न एक दिन ये पीरा ह रार मचाही रे,
नरी कटाही बइरीमन के,
नवा सुरुज फेर आही रे…”

व्यक्तिगत रूप से उनकी कमी हमेशा महसूस होती रहेगी, लेकिन सच यह है कि वे कहीं गए नहीं हैं। वे अपने गीतों में हैं, लोक स्मृतियों में हैं, गांवों की चौपालों में हैं और हर उस छत्तीसगढ़िया के मन में हैं जो अपनी मिट्टी से प्रेम करता है। लक्ष्मण मस्तुरिया सही मायनों में “भारत मां के रतन बेटा” थे।

जनकवि लक्ष्मण मस्तुरिया को विनम्र श्रद्धांजलि।
जय जोहार।

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