Bastar News Update : दंतेवाड़ा. बस्तर की पारंपरिक खाद्य संस्कृति अब सिर्फ गांव-घर तक सीमित नहीं, बल्कि बड़े मंचों पर अपनी पहचान दर्ज करा रही है. रायपुर में आयोजित आईपीएल मुकाबलों के दौरान दंतेवाड़ा की चंदा दीदी ने अपने व्यंजनों से क्रिकेट सितारों को प्रभावित किया. महुआ लड्डू, कोदो-कुटकी और बाजरे के पकवान के साथ चापड़ा चटनी ने खिलाड़ियों का दिल जीत लिया. विराट कोहली, रजत पाटीदार जैसे खिलाड़ियों ने इन व्यंजनों की खुलकर तारीफ की. चंदा दीदी पहले भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने महुआ लड्डू का स्वाद चखा चुकी हैं. ‘बिहान’ योजना से जुड़कर उन्होंने आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है. अब वे सिर्फ खुद नहीं, बल्कि अन्य ग्रामीण महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन चुकी हैं. जिला प्रशासन के सहयोग से वे देशभर में बस्तरिया फूड को पहचान दिला रही हैं. उन्हें फूड प्रोसेसिंग और मार्केटिंग के लिए विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाएगा. इस पहल से स्थानीय उत्पादों को बाजार और पहचान दोनों मिल रही है. बस्तर का पारंपरिक स्वाद अब ग्लोबल प्लेटफॉर्म तक पहुंचने की राह पर है. यह सफलता ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे रही है.
यात्री परेशान, मालगाड़ियां दौड़ती… पैसेंजर ट्रेन बंद होने से बढ़ी नाराजगी
दंतेवाड़ा. विशाखापत्तनम-किरंदुल पैसेंजर ट्रेन के 16 दिनों तक बंद रहने से लोगों में आक्रोश है. रेलवे ने दोहरीकरण कार्य का हवाला देते हुए यह फैसला लिया है. 15 से 31 मई तक ट्रेन केवल दंतेवाड़ा तक ही संचालित होगी. दक्षिण बस्तर के यात्रियों के लिए यह एकमात्र सस्ती और जरूरी सुविधा है. बचेली, किरंदुल और भांसी के लोग इसी ट्रेन से जगदलपुर आते-जाते हैं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि यात्री सुविधा से ज्यादा मुनाफे पर ध्यान दिया जा रहा है. जबकि इसी मार्ग पर मालगाड़ियां लगातार चल रही हैं. ट्रेन बंद होने से लोगों को महंगे साधनों का सहारा लेना पड़ रहा है. आर्थिक बोझ के साथ समय की भी बर्बादी हो रही है. बार-बार ट्रेन बंद होने से लोगों का भरोसा भी कमजोर हो रहा है. क्षेत्रीय विकास के लिए नियमित यातायात जरूरी बताया जा रहा है. लोगों ने रेलवे से जल्द समाधान की मांग की है.
हरियाली पर खतरा… साल वन घटे, 31 साल पुरानी मांग अधूरी
बस्तर. बस्तर, जिसे कभी साल वनों का द्वीप कहा जाता था, अब धीरे-धीरे अपनी पहचान खो रहा है. साल वृक्षों की लगातार कटाई से पर्यावरण संतुलन पर असर पड़ रहा है. वन अधिकार पट्टा और कूप कटाई ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. हर दो साल में हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं. वहीं पौधारोपण में साल के पेड़ों की हिस्सेदारी बेहद कम है. करीब एक लाख एकड़ वन भूमि पर पेड़ों की कटाई हो चुकी है. आदिवासियों के लिए साल वृक्ष आजीविका का प्रमुख स्रोत रहा है. इससे लकड़ी, बीज, तेल और पत्तल जैसे कई उत्पाद मिलते हैं. 31 साल से साल अनुसंधान केंद्र खोलने की मांग लंबित है. आज भी परीक्षण के लिए बाहरी विशेषज्ञों पर निर्भरता बनी हुई है. पर्यावरणविदों ने इसे गंभीर चेतावनी माना है. साल वन बचाने के लिए ठोस नीति और प्रयास की जरूरत बताई जा रही है.
जंगल का खजाना… छिंद फल से सेहत और स्वरोजगार दोनों
बस्तर. बस्तर के जंगलों में मिलने वाला छिंद अब ‘सुपरफूड’ के रूप में पहचान बना रहा है. शहद जैसी मिठास वाला यह फल पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है. इसमें फाइबर, मिनरल्स और एमिनो एसिड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. छिंद से निकलने वाला रस ‘पाम गुड़’ के रूप में उपयोग होता है. यह चीनी का एक हेल्दी विकल्प माना जा रहा है. ग्रामीण इलाकों में इसके बीजों का उपयोग पारंपरिक औषधि के रूप में होता है. यह दिल, हड्डियों और पाचन के लिए फायदेमंद बताया गया है. गर्भवती महिलाओं के लिए भी इसे ऊर्जा का अच्छा स्रोत माना गया है. हालांकि डायबिटीज मरीजों को सीमित सेवन की सलाह दी गई है. छिंद से जुड़े उत्पाद ग्रामीणों के लिए आय का जरिया बन रहे हैं. वन संपदा का यह उपयोग स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है. अब इसे बाजार से जोड़ने की दिशा में भी प्रयास तेज हो रहे हैं.
समझौते से समाधान… लोक अदालत में हजारों मामलों का निपटारा
दंतेवाड़ा. नेशनल लोक अदालत में वर्षों पुराने मामलों का त्वरित समाधान किया गया. दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर और बचेली में कुल 10 खंडपीठ गठित किए गए. 4684 मामलों में से 4617 का निराकरण सहमति से किया गया. इस प्रक्रिया में 1 करोड़ 40 लाख से अधिक राशि का एवार्ड पारित हुआ. लोक अदालत ने समय और धन दोनों की बचत कराई. वर्चुअल और भौतिक दोनों माध्यमों से सुनवाई की गई. घरेलू मामलों में सुलह के बाद दंपतियों को पौधे भेंट किए गए. इसके जरिए पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया गया. बैंकों और अन्य संस्थाओं ने भी सक्रिय सहयोग किया. न्याय प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाने पर जोर रहा. लोगों में न्याय के प्रति भरोसा मजबूत हुआ है. यह पहल न्याय व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव का संकेत मानी जा रही है.

गली बनी ट्रक अड्डा… रहवासी इलाके में बढ़ा खतरा
बचेली. मुख्य मार्ग पर सख्ती के बाद अब भारी वाहन रहवासी गलियों में खड़े हो रहे हैं. सरस्वती स्कूल और अस्पताल चौक के आसपास जाम की स्थिति बन रही है. दिन-रात खड़े ट्रकों से आम लोगों की आवाजाही प्रभावित हो रही है. स्कूल जाने वाले बच्चे और मरीज सबसे ज्यादा परेशान हैं. संकरी गलियों में दुर्घटना का खतरा लगातार बढ़ रहा है. स्थानीय लोगों ने प्रभावशाली ट्रक मालिकों पर मनमानी का आरोप लगाया है. कई बार शिकायत के बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं होने से नाराजगी है. लोगों का कहना है कि नियम सिर्फ मुख्य सड़कों तक सीमित हैं. रहवासी इलाकों में भी सख्त कार्रवाई की मांग उठ रही है. पुलिस ने अब कार्रवाई का भरोसा दिलाया है. अवैध पार्किंग पर चालान और सख्ती की बात कही गई है. नगर में सुरक्षित यातायात के लिए अब ठोस कदमों की उम्मीद है.
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