Bastar News Update, सुकमा: दक्षिण बस्तर में करीब दो दशक पहले विस्थापन का दर्द झेल चुके ग्रामीणों के सामने अब एक नई चिंता खड़ी हो गई है। कोंटा क्षेत्र में पोलावरम परियोजना की संभावित डूब को लेकर ग्रामीणों ने प्रभावित गांवों की स्थिति स्पष्ट करने की मांग उठाई है। स्थानीय लोगों के मुताबिक कोंटा क्षेत्र के 18 से ज्यादा गांव परियोजना की जद में आ सकते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि अभी तक प्रभावित क्षेत्र का स्पष्ट सर्वे और मुआवजे की जानकारी सामने नहीं आई है। पुनर्वास को लेकर भी स्थिति साफ नहीं होने से लोगों की चिंता बढ़ रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि गांव डूब में आए तो यहां रहने वाले लोगों का भविष्य क्या होगा। दोरला समाज के लिए यह चिंता केवल जमीन और मकान तक सीमित नहीं हैजल-जंगल-जमीन से जुड़ी जीवनशैली के साथ भाषा, पूजा स्थल और सामाजिक परंपराओं पर भी असर पड़ने की आशंका है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले सलवा जुडूम के दौरान विस्थापन झेल चुके परिवार दोबारा उजड़ना नहीं चाहते। अब ग्रामीण सरकार से प्रभावित गांवों का सर्वे, कर मुआवजा और पुनर्वास नीति स्पष्ट करने की मांग कर रहे हैं। सवाल यह है कि परियोजना आगे बढ़ने से पहले प्रभावित लोगों की स्थिति और अधिकारों को लेकर सरकार कब तस्वीर साफ करेगी।
दोरला समाज के सामने पहचान बचाने की चुनौती
सुकमा: पोलावरम की संभावित डूब ने कोंटा क्षेत्र के दोरला समाज के सामने जमीन के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने का सवाल खड़ा कर दिया है। दोरला समाज पीढ़ियों से जंगल, जमीन और नदी से जुड़ी जीवनशैली के साथ इस इलाके में निवास करता आया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक समाज की आबादी समय के साथ कम हुई है और अब करीब 30 हजार के आसपास होने का अनुमान है। हालांकि इस आंकड़े का आधिकारिक सत्यापन अभी जरूरी है।
ग्रामीणों का कहना है कि बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ तो इसका असर खेती और रोजगार से कहीं आगे तक जाएगा। गांवों के साथ पारंपरिक पूजा स्थल, सामाजिक व्यवस्था और स्थानीय भाषा भी प्रभावित हो सकती है। दोरला समाज की जीवनशैली प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक व्यवस्थाओं से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसे में नई जगह पर पुनर्वास केवल मकान देने तक सीमित रहने से कई सामाजिक सवाल अनसुलझे रह सकते हैं। स्थानीय लोग प्रभावित परिवारों की जनजातिवार संख्या और वास्तविक स्थिति सामने लाने की मांग कर रहे हैं।।
उनका कहना है कि किसी भी सर्वे में जमीन के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव का भी आकलन होना चाहिए। अब निगाह इस बात पर है कि सरकार संभावित डूब को लेकर समुदाय की इन चिंताओं का किस तरह समाधान करती है।
आंध्र में सर्वे का दावा, कोंटा में तस्वीर साफ होने का इंतजार
सुकमा: पोलावरम परियोजना को लेकर छत्तीसगढ़ के कोंटा क्षेत्र में ग्रामीणों की चिंता लगातार बढ़ रही है। ग्रामीणों का दावा है कि सीमा से लगे आंध्रप्रदेश के चिंतूर मंडल में सर्वे और पुनर्वास की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। वहीं कोंटा क्षेत्र के संभावित प्रभावित गांवों में अब तक स्थिति स्पष्ट नहीं होने की बात कही जा रही है।
स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, करीब 18 गांवों पर संभावित डूब का असर पड़ सकता है। लेकिन कौन सा गांव कितना प्रभावित होगा, इसे लेकर अभी लोगों के पास स्पष्ट जानकारी नहीं है। मुआवजे की प्रक्रिया और पुनर्वास स्थल को लेकर भी ग्रामीणों को कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं मिल पाई है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले प्रशासन को ज्ञापन देकर अपनी मांग रखी जाएगी। इसके बाद भी कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन का रास्ता अपनाने की बात कही जा रही है। स्थानीय लोगों की मांग है कि प्रभावित क्षेत्र का आधिकारिक सर्वे जल्द कराया जाए। साथ ही प्रत्येक परिवार की जमीन, मकान और आजीविका का आकलन कर स्पष्ट नीति बनाई जाए। ग्रामीणों का कहना है कि फैसला होने से पहले प्रभावित लोगों को पूरी जानकारी देना जरूरी है।
सलवा जुडूम का पुराना दर्द, पोलावरम ने जगाई नई चिंता
सुकमा: आदिवासी इलाकों में पोलावरम की संभावित डूब ने पुराने विस्थापन की यादें फिर ताजा कर दी हैं। सलवा जुडूम के दौरान गांव छोड़कर कोंटा पहुंचने वाले परिवारों ने विस्थापन का असर करीब से देखा है। शिक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता कट्टम सीताराम ने अपनी मां के विस्थापन का अनुभव साझा किया है। उनके मुताबिक गांव का खुला वातावरण, खेत-खलिहान और पशुधन उनकी मां के जीवन का हिस्सा था। कोंटा में बसने के बाद नया माहौल उनके लिए सहज नहीं रहा और उन्होंने घुटन महसूस की। सीताराम के अनुसार बाद में उनकी मां बीमार पड़ीं और उनका निधन हो गया।
उनका कहना है कि विस्थापन का असर केवल जमीन और घर छोड़ने तक सीमित नहीं रहता। नई जगह पर भाषा, सामाजिक संबंध और पारंपरिक जीवनशैली भी बदलती है। अब पोलावरम की संभावित डूब को लेकर ग्रामीणों को दोबारा इसी तरह के विस्थापन की चिंता है। दोरला समाज के लोगों का कहना है कि पुनर्वास हुआ तो सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने की भी व्यवस्था होनी चाहिए। यानी इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं कि लोग कहां बसेंगे, बल्कि यह भी है कि उनकी पुरानी पहचान कैसे बचेगी।
दलपत सागर के काम पर निगरानी की पहल
बस्तर: ऐतिहासिक दलपत सागर की सफाई और सौंदर्याकरण के काम को लेकर निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की पहल की गई है। महापौर संजय पांडे ने जिला स्तर पर निगरानी समिति गठित करने का प्रस्ताव कलेक्टर के सामने रखा है। दलपत सागर की सफाई और सौंदर्याकरण के लिए 49 लाख 95 हजार रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति दी गई है। शहर के महत्वपूर्ण जलस्रोत और पर्यटन स्थल होने के कारण काम की गुणवत्ता पर लगातार नजर रखने की जरूरत बताई गई है।
प्रस्तावित समिति कार्यस्थल का निरीक्षण कर काम की वास्तविक प्रगति का सत्यापन करेगी। साथ ही स्वीकृत राशि के उपयोग और सफाई की स्थिति की समीक्षा करने का प्रस्ताव है। समिति में नगर निगम के प्रतिनिधि के साथ जनप्रतिनिधियों को शामिल करने की बात कही गई है। स्वच्छता समिति अध्यक्ष लक्ष्मण झा सहित राकेश मौर्य, कुबेर देवांगन और पायल बोथरा के नाम प्रस्तावित किए गए हैं।
महापौर ने दलपत सागर को पूरी तरह स्वच्छ और जलकुंभी मुक्त करने की बात कही है। अब निगरानी समिति के गठन के बाद काम की गुणवत्ता और प्रगति पर नियमित रिपोर्टिंग की व्यवस्था बन सकती है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य स्वीकृत राशि का निर्धारित काम में उपयोग और धरातल पर काम की स्थिति स्पष्ट रखना बताया गया है।
करपावंड के शिक्षक का राष्ट्रीय प्रशिक्षण के लिए चयन
बस्तर के शैक्षणिक क्षेत्र से जुड़ी एक उपलब्धि सामने आई है। पीएमश्री स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट अंग्रेजी माध्यम विद्यालय करपावंड के वाणिज्य व्याख्याता अंबिका प्रसाद वर्मा का चयन राष्ट्रीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यशाला के लिए हुआ है। यह प्रशिक्षण 21 से 25 सितंबर तक भोपाल स्थित क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान में आयोजित होगा। वर्मा बस्तर जोन के नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रशिक्षण में शामिल होंगे। इस दल में सुकमा, बस्तर, कांकेर, कोंडागांव और बीजापुर के वाणिज्य व्याख्याता भी शामिल रहेंगे।
प्रशिक्षण के दौरान आधुनिक शिक्षण पद्धतियों पर जानकारी दी जाएगी। गतिविधि और परियोजना आधारित अधिगम को कक्षा में लागू करने के तरीकों पर भी प्रशिक्षण होगा। इसके साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप शिक्षण तकनीकों पर मार्गदर्शन दिया जाएगा। राष्ट्रीय स्तर के इस प्रशिक्षण में बस्तर संभाग की भागीदारी स्थानीय शिक्षकों के लिए नए अनुभव का अवसर होगी। अब प्रशिक्षण से प्राप्त नई तकनीकों को विद्यालयों की कक्षाओं में लागू करने की दिशा में उम्मीदें हैं। इससे स्थानीय स्तर पर नवाचार आधारित शिक्षण को और बढ़ावा मिलने की संभावना है।
गढ़ सिलियारा की विरासत को पहचान का इंतजार
बस्तर का गढ़ सिलियारा अपने भीतर पुरखों से जुड़ी कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्मृतियां समेटे हुए है। नगर सीमा में शामिल होने के बावजूद यह क्षेत्र आज भी कई मूलभूत सुविधाओं की जरूरत महसूस कर रहा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक गांव और आसपास कई ऐसे स्थल हैं जिनका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण अब तक नहीं हुआ है।
गढ़ सिलियारा में मां मावली का स्थल ग्रामीणों की आस्था का प्रमुख केंद्र है देवी-देवता स्थल के पास तालाब की पूर्व दिशा में बरगद के नीचे प्राचीन गणेश प्रतिमा और शिवलिंग भी मौजूद हैं। गांव के पूर्वी हिस्से में पुराने लोहे के दो नगाड़े भी देखे जा सकते हैं। इन नगाड़ों से जुड़ी कई लोककथाएं स्थानीय लोगों के बीच आज भी प्रचलित हैं। हालांकि इन दावों की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए विशेषज्ञ अध्ययन जरूरी है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि आसपास और भी पुरावशेष मौजूद हो सकते हैं। ऐसे में इतिहास और पुरातत्व विशेषज्ञों के साथ स्थानीय समुदाय को शामिल कर सर्वेक्षण की जरूरत है। सड़क और दूसरी बुनियादी सुविधाओं में सुधार के साथ धरोहरों का संरक्षण हो तो क्षेत्र को पर्यटन से भी जोड़ा जा सकता है।
विश्वकर्मा जयंती पर खुलेंगे एनएमडीसी के परियोजना क्षेत्र
दंतेवाड़ा: विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर बचेली और किरंदुल की एनएमडीसी परियोजनाओं में आम लोगों को प्रवेश दिया जाएगा। 17 सितंबर को बीआईओएम कॉम्प्लेक्स में विश्वकर्मा पूजा के लिए दोनों परियोजनाएं जनता के लिए खुली रहेंगी। श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने कानून-व्यवस्था को लेकर बैठक की है। चार निक्षेप 10/11 और 5 क्षेत्र में निर्धारित नियमों के तहत प्रवेश की अनुमति रहेगी। दो पहिया वाहन, पिकअप और मेटाडोर को परियोजना क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। बचेली में प्रवेश सुबह 8 बजे से दोपहर 3 बजे तक रहेगा।
वाहनों की पार्किंग के लिए हॉकी मैदान और केंद्रीय विद्यालय मैदान निर्धारित किए गए हैं। किरंदुल में बीआईओपी स्कूल और केंद्रीय विद्यालय टाइप-1 क्षेत्र में पार्किंग की व्यवस्था रहेगी। आगंतुकों के लिए एनएमडीसी की निःशुल्क बसें भी संचालित की जाएंगी। बचेली में 8 और किरंदुल में 7 बसों की व्यवस्था की गई है। प्रशासन ने शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध और तीन स्तर की सीआईएसएफ-पुलिस चेकिंग की व्यवस्था की है।

खैर के घटते जंगल, कत्थे की बढ़ती कीमत
बस्तर के जंगलों में कभी बड़ी संख्या में नजर आने वाले खैर के पेड़ों पर अब संकट की बात सामने आ रही है। खैर की लकड़ी से पारंपरिक तरीके से कत्था तैयार किया जाता है, जिसकी बाजार में कीमत बढ़ने की बात कही जा रही है। स्थानीय जानकारी के मुताबिक सीमावर्ती इलाकों में खैर की अवैध कटाई की शिकायतें सामने आती रही हैं। आरोप है कि पेड़ों को काटकर लकड़ी को दूसरे राज्यों तक पहुंचाया जाता है।
बताया जाता है कि परिपक्व खैर की लकड़ी को छोटे टुकड़ों में काटकर उबालने के बाद गाढ़ा द्रव्य तैयार किया जाता है। इसी प्रक्रिया से कत्थे की टिकिया तैयार की जाती है। बाजार में शुद्ध कत्थे की कीमत करीब 2500 रुपये किलो तक पहुंचने की बात कही जा रही है।
वहीं कृत्रिम कत्था करीब 800 से 1000 रुपये किलो में मिलने का दावा है। कीमत के इस अंतर के बीच खैर के पेड़ों पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय स्तर पर वन संपदा की सुरक्षा और अवैध कटाई पर प्रभावी निगरानी की जरूरत है। खैर के जंगलों को बचाने के लिए नियमित गश्त, अवैध कटाई की जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग उठ रही है।
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