Dharm Desk – सनातन परंपरा में भड़ल्या नवमी (भड़ली नवमी) का विशेष स्थान है. इस वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि यानी 22 जुलाई को भड़ल्या नवमी मनाई जाएगी. धार्मिक व ज्योतिषीय दृष्टि से यह तिथि इस सीजन में शादी एवं अन्य मांगलिक कार्यों के लिए अंतिम और अत्यंत दुर्लभ अवसर लेकर आई है. इसके ठीक, 2 दिन बाद, 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास का आरंभ हो जाएगा. जिसके बाद अगले 4 महीनों तक विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे सभी शुभ कार्यों पर पूर्ण विराम लग जाएगा.

गुरु अस्त के बावजूद शहनाइयों की गूंज
वर्तमान में देवगुरु बृहस्पति के अस्त रहने के कारण सामान्यतः मांगलिक कार्यों पर शास्त्र सम्मत रोक लगी हुई है. किंतु भड़ल्या नवमी एक ‘अबूझ’ अथवा ‘स्वयंसिद्ध’ मुहूर्त है. सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार, स्वयंसिद्ध तिथियों पर ग्रहों की स्थिति या गुरु अस्त का प्रभाव विचारणीय नहीं होता. यही कारण है कि इस दिन बिना किसी विशेष पंचांग देखने या ज्योतिषीय परामर्श के अनगिनत विवाह संपन्न होंगे.
क्या होता है ‘अबूझ’ या ‘स्वयंसिद्ध’ मुहूर्त?
ज्योतिष शास्त्र में अबूझ मुहूर्त का तात्पर्य ऐसी तिथियों से है जो स्वयं में अत्यंत पवित्र, सकारात्मक और सिद्ध होती है. इन तिथियों पर समय और नक्षत्र की अगल से गणना करने की आवश्यकता नहीं पड़ती. व्यक्ति अपनी सुविधा अनुसार, दिन में किसी भी समय नया व्यापार शुरू कर सकता है, गृह प्रवेश कर सकता है या शादी संस्कार संपन्न कर सकता है. भड़ल्या नवमी को अक्षय तृतीया के समान ही परम शुभ माना गया है.
सनातन धर्म की प्रमुख अबूझ तिथियां
सनातन परंपरा में वर्ष भर में कुछ तिथियों को अत्यंत शुभ और अबूझ मुहूर्त का दर्जा है, जिनमें शामिल हैं…
- अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल तृतीया): इसे वर्ष का सबसे बड़ा अबूझ मुहूर्त माना जाता है.
- देवउठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी): इस दिन चातुर्मास समाप्त होता है और शुभ कार्य पुनः प्रारंभ होते हैं.
- भड़ल्या नवमी (आषाढ़ शुक्ल नवमी): चातुर्मास से ठीक पहले का स्वयंसिद्ध मुहूर्त.
- बसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी): विद्या और शुभ कार्यों के आरंभ के लिए श्रेष्ठ.
- विजयादशमी (आश्विन शुक्ल दशमी): नए कार्यों व शस्त्र-वाहन पूजन के लिए सिद्ध.
तिथि का समय, पूजा विधि व दान का महत्व
आषाढ़ शुक्ल नवमी तिथि का प्रारंभ 22 जुलाई को प्रातः 5:16 बजे से होगा और इसका समापन 23 जुलाई को प्रातः 7:3 बजे होगा. उदया तिथि के आधार पर भड़ल्या नवमी का पर्व 22 जुलाई को ही मनाया जाएगा. वर्तमान में आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि भी चल रही है. जिसकी पूर्णाहुति इसी नवमी पर होती है. इस दिन भगवान श्री गणेश, देवाधिदेव महादेव और माता दुर्गा की विशेष पूजा का विधान है. श्रद्धालु इस दिन जरूरत मंदों को अनाज, वस्त्र, धन, जूते-चप्पल तथा छाते का दान कर अक्षय पुण्य की प्राप्ति कर सकते हैं. देवशयनी एकादशी के बाद अब मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत 1 नवंबर को देव प्रबोधिनी एकादशी (देवउठनी एकादशी) पर भगवान विष्णु के जागृत होने के साथ ही होगी.


