अजय सैनी, भिवानी. यूं ही नहीं मिलती राही को मंजिल, एक जुनून सा दिल में जगाना होता है। यह पंक्तियां भिवानी की बेटी कंचन सिंह भुवाल पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। भिवानी के शांत माहौल से निकलकर देश की धडक़न और मायानगरी कही जाने वाली मुंबई के ग्लैमर और कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी जगह बनाना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन कंचन सिंह भुवाल ने यह साबित कर दिया कि अगर हौसलों में उड़ान हो और इरादे फौलादी हों, तो छोटे शहरों के बंद कमरों में देखे गए बड़े सपने भी हकीकत का रूप ले सकते हैं।

आज कंचन देश के उन लाखों युवाओं के लिए एक जीवंत प्रेरणा बन चुकी हैं, जो अपनी आँखों में बड़े-बड़े सपने संजोए बैठे हैं। भिवानी की बेटी कंचन सिंह भुवाल की बहुप्रतीक्षित हिंदी फिल्म जीना दिल से देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है, जिसमें वह मुख्य अभिनेत्री के रूप में बड़े पर्दे पर अपनी अदाकारी का जादू बिखेर रही हैं। बता दे कि कंचन ने अपना बॉलीवुड डेब्यू इसी फिल्म से किया है, जबकि वे कई पंजाबी व हरियाणवी फिल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेर चुकी है।


कंचन सिंह भुवाल की यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है। इसके पीछे सालों का कड़ा संघर्ष, धैर्य और कला के प्रति अटूट समर्पण है। कंचन ने अपने अभिनय सफर की शुरुआत रंगमंच यानी थिएटर से की थी। लगभग छह वर्षों तक उन्होंने हिंदी और पंजाबी थिएटर में लगातार काम किया। थिएटर को अभिनय की पाठशाला कहा जाता है, और कंचन ने इस पाठशाला में अपनी कला को हर रोज निखारा। मंच पर लाइव ऑडियंस के सामने संवाद बोलना, भावनाओं को जीवंत करना और हर किरदार में खुद को ढाल देना, यही वो तपस्या थी जिसने उन्हें आज एक मंझी हुई अभिनेत्री और बेहतरीन वॉइस आर्टिस्ट बनाया है।


निर्देशक अधीश राणा के निर्देशन में बनी फिल्म जीना दिल से एक भावनात्मक म्यूजिकल ड्रामा है। यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि जिंदगी के उन पहलुओं को छूती है जिनसे हर इंसान कभी न कभी गुजऱता है। दोस्ती, प्यार, रिश्तों का ताना-बाना और संघर्ष के बीच जीने की चाह को इस फिल्म में बेहद खूबसूरती से पिरोया गया है। फिल्म में कंचन का किरदार बेहद सशक्त और भावनाओं से भरपूर है। शुरुआती समीक्षाओं और दर्शकों के रुझान की मानें तो कंचन ने अपनी अभिनय क्षमता से इस किरदार में जान फूंक दी है, जिससे दर्शक खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं।


भिवानी जैसे छोटे शहर से मुंबई जाना और वहा बिना किसी गॉडफादर के खुद को स्थापित करना एक बेहद कठिन यात्रा थी। मुंबई की भागदौड़ और लगातार रिजेक्शन के बीच बड़े-बड़े लोग टूट जाते हैं, लेकिन कंचन का आत्मविश्वास कभी नहीं डगमगाया। उन्होंने हर चुनौती को एक अवसर के रूप में देखा और लगातार खुद को बेहतर बनाने में जुटी रहीं। कंचन सिंह भुवाल ने अपनी इस ऐतिहासिक सफलता का श्रेय किसी एक को नहीं, बल्कि अपने पूरे परिवार, अपने गुरुओं, थिएटर के उन संघर्ष भरे दिनों और अपने दर्शकों के अटूट प्यार को दिया है। कंचन सिंह भुवाल का कहना है जीना दिल से सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि मेरे दिल का एक टुकड़ा है।

यह मेरे करियर का सबसे खास पड़ाव है और आगे भी मैं ऐसे ही किरदार निभाना चाहती हूँ जो सीधे लोगों के दिलों को छू सकें। कंचन की इस कामयाबी से न सिर्फ उनका परिवार फूले नहीं समा रहा है, बल्कि पूरे भिवानी और हरियाणा में गर्व की लहर है।