कुमार उत्तम, मुजफ्फरपुर। न्यायालय ने बहुचर्चित भूटकून शुक्ला हत्याकांड में आखिरकार 29 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-10 की अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद मुख्य आरोपी दीपक सिंह को दोषी करार देते हुए सजा का ऐलान किया है।
​यह सनसनीखेज हत्याकांड जुलाई 1997 में अंजाम दिया गया था, जिसने बिहार की राजनीति और अपराध जगत में भूचाल ला दिया था। मृतक भूटकून शुक्ला वैशाली जिले के लालगंज से पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ला के भाई थे। उनके पिता एक जाने-माने अधिवक्ता थे, जो नया टोला स्थित अपने निजी मकान में रहते थे।

​शागिर्द से बना गद्दार: अपराध की वह खौफनाक दास्तान

​वैशाली जिले के लालगंज अंतर्गत खंजाहचक गांव का रहने वाला दीपक सिंह कभी भूटकून शुक्ला का बेहद करीबी और खास शूटर हुआ करता था। वह उनके बॉडीगार्ड के रूप में साथ रहता था और मुजफ्फरपुर तथा आसपास के कई जिलों में उनके इशारे पर वारदातों को अंजाम देता था।
​घटना से कुछ समय पहले दीपक सिंह के साथ भूटकून शुक्ला की किसी बात को लेकर अनबन हो गई थी, जिसके चलते वह उन्हें छोड़कर चला गया था। उस दौरान दीपक एक आपराधिक मामले में जेल भी गया था, लेकिन छूटने के बाद उसने पुरानी बातों को भुलाने का नाटक किया। उसने भूटकून शुक्ला के पास वापस लौटकर अपनी गलती का अहसास जताया और माफी मांगते हुए दोबारा उनके साथ जुड़ गया। हालांकि, हितेषी मित्रों ने भूटकून शुक्ला को पहले ही आगाह किया था कि दीपक पर भरोसा करना घातक साबित हो सकता है, लेकिन उन्होंने इस चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया।

​स्नान के दौरान अपने ही हथियार से भूना

​भूटकून शुक्ला स्वभाव से बेहद तेज-तर्रार और सतर्क व्यक्ति थे। वह हमेशा अपने साथ अत्याधुनिक हथियार रखते थे, जिस वजह से किसी में भी उन पर सीधे हमला करने की हिम्मत नहीं होती थी।
​जुलाई 1997 के एक दिन भूटकून शुक्ला अपने हथियार कमरे में रखकर स्नान करने के लिए बाथरूम गए। जैसे ही वे स्नान करके बाहर निकले, घात लगाए बैठे दीपक सिंह ने उनके ही अत्याधुनिक हथियारों से ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर उनकी बेरहमी से हत्या कर दी। वारदात को अंजाम देने के बाद दीपक उनके दो अत्याधुनिक हथियार लेकर मौके से फरार हो गया था। इस दुस्साहसिक घटना के बाद मुजफ्फरपुर समेत पूरे बिहार में सनसनी फैल गई थी।

​50 हजार का इनाम और गिरफ्तारी

​हत्याकांड को अंजाम देने के बाद मुख्य आरोपी दीपक सिंह लंबे समय तक पुलिस की पकड़ से दूर और फरार चल रहा था। उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस प्रशासन द्वारा 50,000 रुपये का इनाम भी घोषित किया गया था। लंबी सुरागकसी के बाद आखिरकार पुलिस ने उत्तर प्रदेश के बनारस से दीपक सिंह को दबोचने में सफलता हासिल की, जिसके बाद से वह लगातार सलाखों के पीछे है। इस मामले में पारू प्रखंड के सरमस्त गांव के रहने वाले दीपक सिंह के खिलाफ जुलाई 1997 में ही हत्या और आर्म्स एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

​अदालत का फैसला: आजीवन कारावास और जुर्माना

​विभिन्न अदालतों से गुजरते हुए यह मामला अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-10 की अदालत में पहुंचा, जहां सुनवाई पूरी होने के बाद सजा का यह अहम आदेश सुनाया गया। अदालत ने दीपक सिंह को दो अलग-अलग मामलों में सजा सुनाई है:

  • ​हत्या का मामला: धारा के तहत आजीवन कारावास और 10,000 रुपये का जुर्माना। जुर्माना राशि अदा न करने पर 6 महीने का अतिरिक्त सश्रम कारावास भुगतना होगा।
  • ​आर्म्स एक्ट मामला: अधिनियम के तहत 3 वर्ष का सश्रम कारावास और 5,000 रुपये का जुर्माना। जुर्माना न देने पर 3 माह की अतिरिक्त सजा बढ़ जाएगी।
  • ​इस फैसले से एक तरफ जहां पीड़ित परिवार को लंबे इंतजार के बाद न्याय की आस पूरी हुई है, वहीं कानून के लंबे हाथों से अपराधी का बचना नामुमकिन साबित हुआ है।