कुंदन कुमार, पटना। बिहार की राजनीति में औद्योगिक निवेश को लेकर एक बार फिर घमासान मच गया है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने राज्य सरकार द्वारा हाल ही में साइन किए गए एमओयू (MoU) पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। सरकार का दावा है कि विभिन्न औद्योगिक समूहों के साथ लगभग 51,500 करोड़ रुपये के निवेश समझौते किए गए हैं। हालांकि, विपक्ष ने इन दावों की सत्यता और पारदर्शिता पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है।
कागजी कंपनियों और भारी-भरकम निवेश के दावों पर सवाल
तेजस्वी यादव का मुख्य आरोप है कि परमाणु क्षेत्र में 22,500 करोड़ रुपये का निवेश करने वाली जिस कंपनी के साथ समझौता हुआ है, उसकी स्थापना महज पांच महीने पहले फरवरी 2026 में हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार, इस कंपनी की कुल पंजीकृत पूंजी मात्र 11 लाख रुपये बताई जा रही है।
विपक्ष का तर्क है कि इतनी कम पूंजी वाली कंपनी द्वारा इतने बड़े स्तर पर न्यूक्लियर या ऊर्जा क्षेत्र में निवेश का दावा करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। सवाल यह उठाया गया है कि क्या इस तरह की कागजी कंपनियों के जरिए राज्य के संसाधनों और सरकारी सब्सिडी का दुरुपयोग करने की योजना बनाई जा रही है।
पुराने समझौतों और धरातल पर प्रगति की मांग
विपक्ष ने सरकार से यह भी पूछा है कि पिछले वर्षों में हुए दो लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश समझौतों की प्रगति रिपोर्ट क्या है। जनता के सामने यह स्पष्ट होना चाहिए कि उन पुराने एमओयू का धरातल पर क्या असर हुआ और कितने उद्योग असल में स्थापित हुए।
तेजस्वी यादव ने स्पष्ट किया कि वे बिहार में बड़े निवेशकों और उद्योगों का स्वागत करते हैं, बशर्ते निवेश वास्तविक हो और स्थानीय विकास में मददगार साबित हो। लेकिन सिर्फ कागजी दावों और विज्ञापनों के सहारे जनता को गुमराह नहीं किया जाना चाहिए।


