वीरेंद्र कुमार, नालंदा। जिले के ऐतिहासिक शहर बिहारशरीफ में स्थित प्रसिद्ध बाबा मनीराम अखाड़े पर शनिवार को वार्षिक लंगोट अर्पण मेले का आयोजन किया गया। इस धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन में देश-विदेश और आसपास के क्षेत्रों से भारी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। इस अवसर पर बिहार सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार और नालंदा के लोकसभा सांसद कौशलेन्द्र कुमार ने भी विशेष रूप से शिरकत की। दोनों दिग्गज नेताओं ने बाबा मनीराम की समाधि पर पारंपरिक रूप से लंगोट अर्पित कर पूजा-अर्चना की और पूरे राज्य की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की।
नेताओं के क्या रहे मुख्य संदेश और प्रार्थनाएं?
पूजा-अर्चना के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने अपनी आस्था व्यक्त करते हुए कहा कि वे हमेशा की तरह बाबा का आशीर्वाद लेने आए हैं। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तथा राज्य के अन्य सभी जनप्रतिनिधियों को प्रदेश के विकास के लिए निरंतर कार्य करने की शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त हो। इसके अलावा, उन्होंने पूरे बिहार में अमन-चैन आपसी प्रेम भाईचारा और आम जनता की खुशहाली बनाए रखने का भी आशीर्वाद मांगा।
वहीं नालंदा सांसद कौशलेन्द्र कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि हर साल की भांति इस बार भी वे देश और बिहार की खुशहाली की मंगलकामना लेकर इस पावन दरबार में पहुंचे हैं। उन्होंने विशेष रूप से नालंदा जिले के किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रार्थना की। सांसद ने कहा कि क्षेत्र में पानी की समस्या का स्थाई समाधान हो किसानों की फसलें बेहतर हों और जिले का प्रत्येक नागरिक समृद्ध व खुशहाल जीवन व्यतीत करे।


क्यों चढ़ाया जाता है प्रसाद में लंगोट?
बिहारशरीफ का यह ऐतिहासिक बाबा मनीराम अखाड़ा अपनी अनूठी और निराली परंपरा के कारण पूरे देश में विशेष पहचान रखता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान या संत को पारंपरिक मिठाइयों, फलों या अन्य प्रकार के भोग की जगह शुद्ध रूप से लंगोट अर्पित किया जाता है।
पौराणिक मान्यताओं और जनश्रुतियों के अनुसार बाबा मनीराम ने प्राचीन काल में कुश्ती और अखाड़े को अपनी कठोर साधना का मुख्य माध्यम बनाया था। उन्होंने समाज को स्वच्छ मन और स्वस्थ तन का संदेश दिया था जो शारीरिक और मानसिक बल दोनों का प्रतीक है। कुश्ती और अखाड़े की इस प्राचीन संस्कृति से जुड़े होने के कारण ही यहां लंगोट चढ़ाने की प्रथा शुरू हुई थी जिसे आज भी लाखों श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ निभाते आ रहे हैं।


