30 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट से 13 करोड़ से ज़्यादा नाम हटाने के बाद दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसले से नाराज हैं. चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने नए वोटरों को जोड़ने और नाम हटाने से लेकर जानकारी छिपाने पर सवाल उठाए हैं. अब सवाल यह उठता है, क्या मुख्य चुनाव आयुक्त की इन सब मामलों में अंतिम होती है?
जानकारी के लिए बता दे कि चुनाव आयोग के बड़े फैसले में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ, दो अन्य चुनाव आयुक्तों का पैनल लेता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक SIR प्रोसेस के दौरान कई मसलों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी आपत्तियां जताई.
मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसले पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों का पैनल अगर अपनी असहमति जाहिर करता है तो ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त दोनों की असहमति को खारिज कर सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट और संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के चेयरमैन हैं, मगर फैसले सामूहिक रूप से होते हैं और मतभेद की स्थिति में बहुमत निर्णायक होता है.
संविधान के अनुसार CEC आयोग का तो अध्यक्ष है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हर मुद्दे पर उनका फैसला अंतिम होगा. सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कहा था कि जब चुनाव आयोग बहुसदस्यीय होता है तो चुनाव आयुक्त भी आयोग का अभिन्न हिस्सा होते हैं और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में अपनी राय रखने का अधिकार है.
यह कानून बताता है कि आयोग का काम जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए. लेकिन अगर CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद हो जाए तो मामला बहुमत की राय के आधार पर तय होगा. यानी तीन सदस्यीय आयोग में अगर दो चुनाव आयुक्त एक राय पर हैं और CEC उनसे अलग राय रखते हैं, तो केवल CEC होने के कारण उनकी फैसले को अंतिम नहीं माना जा सकता.
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि CEC और बाकी चुनाव आयुक्तों के पद हर मायने में बिल्कुल समान हैं. अगर CEC को पद से हटाना है तो, इसकी पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही सम्पन्न होगी. जबकि किसी अन्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए CEC की सिफारिश जरूरी है.
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