Dharm Desk – चातुर्मास का संत, महात्मा से लेकर आम भक्तों में विशेष महत्व है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तक चलने वाले इन चार महीनों को धर्म, साधना, जप और संयम का काल कहा जाता है। इस पूरी अवधि में साधु-संत व संन्यासी पदयात्रा रोककर एक ही स्थान पर प्रवास करते है । यह परंपरा केवल एक धार्मिक मान्यता नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक कारण छिपे हुए हैं। इस बार चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई से हो चुकी है। चातुर्मास का समापन देव उठानी एकादशी 20 नवंबर के दिन होगा।

चार महीने एक जगह रहने की वजह
- सूक्ष्म जीवों की रक्षा
चातुर्मास का समय मुख्यतः वर्षा ऋतु का होता है । बारिश के मौसम में धरती पर असंख्य कीट-पतंगे, चींटियां और सूक्ष्म जीव-जंतु अत्य अधिक सक्रिय हो जाते हैं। साधु-संत अहिंसा के परम सिद्धांत का पालन करते है, पैदल यात्रा करने पर अजानने में भी किसी सूक्ष्म जीव की हत्या न हो। इसलिए वे यात्रा स्थगित कर एक स्थान पर ठहरते है।
- साधना, ध्यान और आत्मचिंतन का श्रेष्ठ समय
वर्ष भर संत-महात्मा धर्म प्रचार के लिए पदयात्राएं करते हैं। जिससे उनका समय यात्रा में बीतता है। चातुर्मास का समय बाहरी व्यस्तता को रोक कर अंतर्मुखी होने और आत्मचिंतन का समय होता है। इन 4 महीनों में वे कठिन जप, तप, ध्यान, ग्रंथ-अध्ययन और स्वाध्याय में लीन रहकर अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को पुष्ट करते है l
- संतों के सान्निध्य में रहने का सुअवसर
एक स्थान पर 4 महीने रहने से स्थानीय भक्तों और आम जनता को संतों के सान्निध्य में रहने का सुअवसर मिलता है। इस दौरान गांवों व नगरों में रामकथा, भागवत कथा, प्रवचन और सत्संग के आयोजन होते है। जिससे समाज में नैतिक मूल्यों, धार्मिक संस्कारों और लोक-कल्याण की भावना का विस्तार होता है।
- स्वास्थ्य के लिहाज से भी ठहराव जरूरी
वर्षा काल में नदियां उफान पर होती हैं। रास्ता कच्चे व सुगम नहीं रहते तथा संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे वाता वरण में पदयात्रा करना शारीरिक दृष्टि से भी जोखिम भरा होता है। स्वास्थ्य रक्षा और सुरक्षा के लिहाज से भी ठहराव आवश्यक माना गया है।
इस अवधि में कौन-कौन से कार्य रहते हैं वर्जित
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इसलिए इस समय सृष्टि का संचालन भगवान शिव संभालते हैं। इस अवधि में सभी प्रकार के मांगलिक और शुभ संस्कार स्थगित वर्जित माने जाते हैं जिसमें…
- विवाह व सगाई संस्कार: चातुर्मास में शादी-ब्याह और तिलक जैसे मांगलिक कार्य पूरी तरह वर्जित रहते हैं।
- गृह प्रवेश: नए मकान में प्रवेश या नए भवन की नींव रखना इस दौरान शुभ नहीं माना जाता।
- मुंडन और यज्ञोपवीत संस्कार: बच्चों का मुंडन (चूड़ाकरण) और जनेऊ (यज्ञोपवीत) संस्कार इस काल में नहीं किए जाते।
- नया व्यापार व बड़े कार्यों का शुभारंभ: नए व्यवसाय, प्रतिष्ठान का उद्घाटन या किसी नए बड़े प्रोजेक्ट की शुरुआत देवउठनी एकादशी तक टाल दी जाती है।
भोजन और जीवनशैली से जुड़े नियम का पालन
चातुर्मास में तामसिक भोजन, प्याज-लहसुन, मांसाहार और मदिरा का पूर्ण त्याग करना चाहिए। चातुर्मास के चारों महीनों में खान-पान के विशेष परहेज बताए गए है । सावन में हरी पत्तेदार सब्जियां, भाद्रपद (भादो) में दही, आश्विन (क्वार) में दूध और कार्तिक में दालें व बैंगन खाना वर्जित माना जाता है।


