रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बार फिर दिलचस्प और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। साय सरकार में कैबिनेट मंत्री गुरु खुशवंत साहेब के बड़े भाई गुरु ढाल दास साहेब ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मौजूदगी में कांग्रेस का दामन थाम लिया है। पोला-तीजा पर्व के अवसर पर हुए इस राजनीतिक उलटफेर ने प्रदेश के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है।
एक ही परिवार के दो प्रमुख सदस्यों का अलग-अलग राजनीतिक दलों में होना वह भी तब जब एक सत्ता पक्ष में मंत्री हो और दूसरा मुख्य विपक्षी दल में शामिल हो जाए, राज्य में नए राजनीतिक समीकरणों के संकेत दे रहा है। इस घटनाक्रम को महज एक दल बदल के रूप में नहीं देखा जा सकता बल्कि इसके तार छत्तीसगढ़ के सबसे प्रभावशाली सतनामी समाज और ‘गुरु परिवार’ के उस राजनीतिक इतिहास से जुड़े हैं, जिसने पिछले एक दशक में राज्य की सत्ता की दिशा तय की है। यह राजनीति में एक नए शक्ति संघर्ष और आगामी 2028 के विधानसभा चुनावों के लिए बिछाई जा रही दीर्घकालिक बिसात का स्पष्ट संकेत है। एक ही छत के नीचे पले-बढ़े दो भाइयों का सत्ता और विपक्ष के दो ध्रुवों पर खड़ा होना, इस बात की तस्दीक करता है कि सूबे में दलित वोट बैंक को लेकर खींचतान अब एक नए मुहाने पर पहुंच चुकी है।

छत्तीसगढ़ के चुनावी इतिहास का विश्लेषण करें तो एक बात शीशे की तरह साफ नजर आती है कि राज्य में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 सीटें सत्ता के सिंहासन को प्रभावित करती रही हैं। इस पूरे गणित के केंद्र में धर्मगुरु बालदास साहेब और उनका परिवार एक धुरी की तरह कार्य करता रहा है। साल 2013 के विधानसभा चुनावों को याद करें तो उस समय कांग्रेस सत्ता में वापसी की प्रबल दावेदार मानी जा रही थी। ऐन वक्त पर गुरु बालदास साहेब ने सतनाम सेना के नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई। इस तीसरे मोर्चे ने रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग संभाग के दलित बाहुल्य क्षेत्रों में ऐसा तूफान खड़ा किया कि कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक छिन्न-भिन्न हो गया। नतीजा यह हुआ कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 में से 9 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और डॉ. रमन सिंह लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे।समय का पहिया घूमा और 2018 के चुनाव से पहले राजनीतिक परिस्थितियों ने करवट ली। गुरु बालदास साहेब कांग्रेस के पाले में आ खड़े हुए। इसका परिणाम 2013 के ठीक उलट रहा। कांग्रेस ने आरक्षित 10 में से 7 सीटें अपनी झोली में डालकर भाजपा के किले को ढहा दिया और राज्य में 68 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ 15 साल बाद सत्ता का वनवास खत्म किया।
चुनावी रणनीतियों की यह रस्साकशी 2023 में एक बार फिर देखने को मिली। चुनाव से ठीक पहले गुरु बालदास ने कांग्रेस का ‘हाथ’ छोड़कर भाजपा का ‘कमल’ थाम लिया। भाजपा ने इस राजनीतिक लाभ को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और गुरू बालदास के छोटे बेटे गुरु खुशवंत सिंह को राजधानी रायपुर से सटी आरंग विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा। खुशवंत सिंह ने कांग्रेस सरकार के कद्दावर मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया को बड़े अंतर से पराजित किया। भाजपा ने उन्हें साय मंत्रिमंडल में शामिल कर यह स्पष्ट संदेश दिया कि पार्टी में सतनामी समाज और गुरु परंपरा का सम्मान सर्वोच्च है।
केवल 10 सीटें नहीं, 30 सीटों का व्यापक गणित
छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 13 से 14 प्रतिशत है, लेकिन इसका राजनीतिक प्रभाव केवल 10 आरक्षित सीटों (आरंग, नवागढ़, मस्तुरी, पामगढ़, सरायपाली, बिलाईगढ़, कसडोल, अहिवारा, डोंगरगढ़ और मुंगेली) तक सीमित नहीं है। रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग संभाग की करीब 20 से 25 सामान्य सीटों पर भी सतनामी मतदाता 15 से लेकर 35 प्रतिशत तक की निर्णायक स्थिति में हैं। बलौदाबाजार, भाटापारा, तखतपुर, बेलतरा, जांजगीर-चांपा, चंद्रपुर और कवर्धा जैसी सीटों पर यह वर्ग किसी भी उम्मीदवार की जीत-हार का फैसला करने की क्षमता रखता है। ऐतिहासिक रूप से इस अंचल में बहुजन समाज पार्टी का भी एक मजबूत कैडर आधारित जनाधार रहा है, जो जांजगीर-चांपा और बिलासपुर बेल्ट में कांग्रेस और भाजपा के वोटों में सेंध लगाता रहा है। हाल के वर्षों में बसपा के कमजोर पड़ने के बाद यह पूरा दलित वोट बैंक सीधे तौर पर कांग्रेस और भाजपा के बीच दो-ध्रुवीय मुकाबले में तब्दील हो चुका है। ऐसे में गुरु परिवार का प्रभाव दोनों दलों के लिए जीवन रेखा की तरह बन जाता है।
पारिवारिक संतुलन या गहराता सामाजिक असंतोष?
गुरु ढाल दास का कांग्रेस में जाना राजनीतिक विश्लेषकों के बीच दो तरह की व्याख्याओं को जन्म दे रहा है। पहली व्याख्या राजनीतिक संतुलन की है। रसूखदार सियासी परिवार का दोनों प्रमुख दलों में प्रतिनिधि रखना कोई नई बात नहीं है। इससे सत्ता परिवर्तन की स्थिति में भी परिवार का राजनीतिक दबदबा, प्रशासनिक पहुंच और सामाजिक रसूख जस का तस बना रहता है। चाहे भाजपा सत्ता में रहे या कांग्रेस दोनों ही दलों को अपनी रणनीति में इस परिवार को प्राथमिकता देनी पड़ती है। दूसरी व्याख्या समाज के भीतर पनप रहे असंतोष और नए वैचारिक टकराव की है। पिछले कुछ समय में प्रदेश में घटित सामाजिक घटनाओं विशेषकर गिरौदपुरी धाम के अमर गुफा मामले और उसके बाद बलौदाबाजार में भड़की हिंसा, आगजनी तथा उसके बाद समाज के युवाओं पर हुई कानूनी कार्रवाइयों ने सतनामी समाज के एक बड़े तबके में बेचैनी पैदा की है। ढाल दास का यह बयान कि मौजूदा सरकार में समाज के हितों का ध्यान नहीं रखा जा रहा है, यह सीधे तौर पर सरकार के भीतर बैठे अपने ही भाई खुशवंत साहेब की कार्यप्रणाली और भाजपा की नीतियों पर सवालिया निशान लगाता है। भूपेश बघेल के साथ मंच साझा कर उन्होंने इस असंतोष को एक संगठित राजनीतिक मंच देने की कोशिश की है।
2028 में होने वाले चुनाव को लेकर दोनों दलों के सामने खड़ी चुनौतियां
2028 के विधानसभा चुनाव में अभी वक्त जरूर है, लेकिन ढाल दास के कांग्रेस प्रवेश ने दोनों प्रमुख दलों के सामने अभी से असहज करने वाले सवाल खड़े कर दिए हैं। 2023 की हार के बाद कांग्रेस के लिए मैदानी इलाकों का यह वोट बैंक दोबारा हासिल करना अस्तित्व की लड़ाई जैसा है। ढाल दास को पार्टी में लाकर कांग्रेस ने 2018 वाला फॉर्मूला फिर से जिंदा करने का दांव चला है। यदि कांग्रेस समाज के भीतर उपजी शिकायतों को भुनाने में सफल रहती है, तो 2028 में वह मध्य छत्तीसगढ़ के अपने पुराने गढ़ को पुनः हासिल कर सकती है। हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौती यह होगी कि वह ढाल दास के जरिए समाज के निचले कैडर और युवाओं को जमीन पर कितना सक्रिय कर पाती है।
वहीं भाजपा के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती पेश करती है। सरकार को यह संदेश जाने से रोकना होगा कि सत्ता में कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद परिवार और समाज का एक धड़ा असंतुष्ट है। मंत्री गुरु खुशवंत सिंह के कंधों पर अब केवल अपने विधानसभा क्षेत्र की जिम्मेदारी नहीं होगी, बल्कि 2028 तक उन्हें पूरे प्रदेश में घूम-घूम कर यह साबित करना होगा कि गुरु परिवार का असली जनसमर्थन आज भी भाजपा के साथ है। गुरु ढाल दास साहेब का कांग्रेस प्रवेश इस बात का साफ प्रमाण है कि 2028 के विधानसभा चुनाव की जंग किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि सीधे उन पारंपरिक वोट बैंकों में लड़ी जाएगी जो दशकों से सत्ता का फैसला करते आए हैं। यदि गुरु परिवार का यह आंतरिक राजनीतिक विभाजन समाज के भीतर भी वोटों के ध्रुवीकरण में बदलता है, तो 2028 का मुकाबला छत्तीसगढ़ के इतिहास का सबसे दिलचस्प और अप्रत्याशित चुनावी संग्राम साबित हो सकता है।
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