प्रदीप मालवीय, उज्जैन। धर्मनगरी उज्जैन में जहां कण-कण में महादेव की महिमा और प्राचीन परंपराओं की झलक देखने को मिलती है। इसी नगरी में स्थित है भगवान शनिदेव का प्रसिद्ध मंदिर, जहां शनिचरी अमावस्या के अवसर पर श्रद्धालुओं की आस्था उमड़ती है। इसके साथ ही सर्वपितृ अमावस्या का भी विशेष संयोग है। मान्यता है कि शनिचरी अमावस्या पर शनिदेव के दर्शन, पूजा-अर्चना और दान-पुण्य करने से शनि देव की कृपा प्राप्त होती है। वहीं सर्वपितृ अमावस्या पर अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने, तर्पण और दान करने की परंपरा निभाई जाती है।

तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और भोजन कराने की परंपरा

सर्वपितृ अमावस्या पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर मानी जाती है । इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और जरूरतमंदों को भोजन कराने की परंपरा है। जिन लोगों को पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने का अवसर नहीं मिल पाता, वे भी इस दिन श्राद्ध कर्म कर सकते हैं। आज शनिचरी अमावस्या और सर्वपितृ अमावस्या का विशेष संयोग बना है। इस संयोग के चलते शनिदेव की आराधना और पितरों के स्मरण का महत्व श्रद्धालुओं के लिए और बढ़ गया है।

सुबह से ही भक्तों का तांता लगा

उज्जैन की धार्मिक परंपराओं में शिप्रा नदी, त्रिवेणी संगम और नवग्रह शनि मंदिर का विशेष स्थान है। यहां आने वाले श्रद्धालु पूजा-अर्चना के साथ अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और परिवार की सुख-शांति की कामना करते है। इंदौर रोड स्थित शनि नवग्रह मंदिर में सुबह से ही भक्तों का तांता लगा हुआ है बड़ी संख्या में ग्रामीण अंचलों से श्रद्धालु शिप्रा में आस्था की दीप की लगाने एवं शनिदेव की पूजा आराधना करने पहुंचे हैं।

पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता बनाए रखने का संदेश

प्रशासन ने अपनी चाक चौबंद व्यवस्था रख रखी है। शिप्रा नदी में पानी की कमी को देखते हुए प्रशासन ने नर्मदा के पानी को शिप्रा में छोड़कर श्रद्धालुओं को स्नान के इंतजाम किए है। शनिचरी अमावस्या और पितृ अमावस्या का यह संगम हमें एक ओर अपने कर्मों के प्रति सजग रहने, तो दूसरी ओर अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता बनाए रखने का संदेश देता है ।

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