हेमंत शर्मा, इंदौर। साइबर ठगी को लेकर लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। पुलिस लोगों को बार-बार समझा रही है कि अनजान लिंक, एप, नंबर और निवेश योजनाओं से सावधान रहें। इसके बावजूद साइबर ठग हर दिन ठगी के नए तरीके खोज रहे हैं। इंदौर में सामने आए दो मामलों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि साइबर अपराधी सिर्फ तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर रहे, बल्कि लोगों के लालच, भरोसे और जल्दबाजी को हथियार बना रहे हैं।
हीरानगर और लसूड़िया थाना क्षेत्र में सामने आए मामलों में लाखों रुपए की ठगी हुई। एक मामले में सॉफ्टवेयर इंजीनियर को ऑनलाइन ट्रेडिंग में मुनाफे का सपना दिखाकर 5.65 लाख रुपए गंवा दिए गए, जबकि दूसरे मामले में डॉक्टर का अपॉइंटमेंट लेने के लिए गूगल पर नंबर तलाशना एक रिटायर्ड अधिकारी को भारी पड़ गया और उनके खाते से 49 हजार रुपए निकल गए।
ट्रेडिंग एप ने पहले दिखाया मुनाफा, फिर खाली कर दिया भरोसा
हीरानगर थाना क्षेत्र में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर साइबर ठगों के ऐसे जाल में फंसा, जिसमें शुरुआत भरोसा जीतने से हुई। फरियादी ने ट्रेडिंग के नाम पर एक एप डाउनलोड किया। शुरुआत में उसने करीब 10 हजार रुपए निवेश किए। एप पर उसे निवेश के बदले मुनाफा दिखाई देने लगा। स्क्रीन पर बढ़ती रकम देखकर उसे लगा कि प्लेटफॉर्म वास्तविक है और यहां निवेश कर अच्छा पैसा कमाया जा सकता है। यहीं से साइबर ठगों की रणनीति कामयाब होने लगी।
मुनाफे का भरोसा बढ़ने के बाद फरियादी ने अलग-अलग चरणों में एप पर और रकम लगानी शुरू कर दी। धीरे-धीरे निवेश की राशि करीब 5 लाख 65 हजार रुपए तक पहुंच गई। लेकिन जब उसने अपनी रकम निकालने की कोशिश की तो परेशानी शुरू हो गई। पैसे निकालने में अड़चन आने लगी और इसके बाद उसे समझ आया कि एप पर दिखाई जा रही कमाई शायद सिर्फ उसे ज्यादा पैसा लगाने के लिए दिखाई जा रही थी। जब तक ठगी की हकीकत सामने आई, तब तक बड़ी रकम साइबर ठगों के हाथों में जा चुकी थी। मामले में पुलिस जांच कर रही है।
20 रुपए का अपॉइंटमेंट, खाते से गायब हो गए 49 हजार
दूसरा मामला लसूड़िया थाना क्षेत्र का है और यह बताता है कि साइबर ठगी के लिए ठगों को हमेशा बड़े लालच की जरूरत नहीं पड़ती। 66 वर्षीय रिटायर्ड अधिकारी विनोद शर्मा को पेट के डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लेना था। उन्होंने डॉक्टर का मोबाइल नंबर जानने के लिए गूगल पर सर्च किया। सर्च के दौरान मिले एक नंबर पर उन्होंने संपर्क किया। दूसरी तरफ मौजूद महिला ने खुद को अपॉइंटमेंट बुक करने वाली कर्मचारी बताया और अपॉइंटमेंट के लिए ऑनलाइन सिर्फ 20 रुपए जमा करने की बात कही।
लेन-देन की प्रक्रिया के दौरान महिला ने आधार नंबर जैसी जानकारी मांगी। इस पर विनोद शर्मा को संदेह हुआ और उन्होंने कॉल काट दिया। उन्हें लगा कि समय रहते उन्होंने खतरा भांप लिया है। लेकिन इसके कुछ देर बाद बैंक खाते से एक रुपए डेबिट होने का मैसेज आया। इसके बाद जब खाते की जांच की गई तो मामला और गंभीर निकला। दो ट्रांजेक्शन के जरिए खाते से कुल 49 हजार रुपए निकाले जा चुके थे। यानी कॉल काट देने के बावजूद साइबर ठग अपना काम कर चुके थे। विनोद शर्मा ने तत्काल बैंक खाते को ब्लॉक कराया और साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत की। मामले में पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
सवाल बड़ा है: जागरूकता के बाद भी लोग क्यों फंस रहे?
इन दोनों मामलों में ठगी का तरीका अलग है, लेकिन साइबर अपराधियों की रणनीति लगभग एक जैसी नजर आती है। पहले भरोसा पैदा करो, फिर जानकारी हासिल करो और आखिर में खाते तक पहुंच बनाओ। ट्रेडिंग वाले मामले में मुनाफे का लालच भरोसा बनाने का जरिया बना। वहीं डॉक्टर के अपॉइंटमेंट वाले मामले में गूगल सर्च से मिले नंबर और छोटी रकम के भुगतान का बहाना इस्तेमाल किया गया। साइबर ठग लगातार अपने तरीकों में बदलाव कर रहे हैं। यही वजह है कि सिर्फ सामान्य जागरूकता काफी नहीं है। लोगों को यह समझना होगा कि ऑनलाइन दुनिया में दिखाई देने वाली हर जानकारी सही नहीं होती।
गूगल पर दिखा नंबर भी फर्जी हो सकता है
डॉक्टर, अस्पताल, बैंक, कस्टमर केयर या किसी कंपनी का नंबर खोजते समय लोग अक्सर गूगल के सबसे ऊपर दिखाई देने वाले नंबर पर भरोसा कर लेते हैं। यही लापरवाही साइबर ठगों के लिए मौका बन सकती है। किसी भी नंबर पर कॉल करने से पहले आधिकारिक वेबसाइट या अधिकृत प्लेटफॉर्म से नंबर की पुष्टि करना जरूरी है। खासकर बैंकिंग, आधार, यूपीआई या भुगतान से जुड़ी जानकारी किसी अनजान व्यक्ति को नहीं देनी चाहिए।
ट्रेडिंग में दिख रहा मुनाफा हमेशा असली नहीं होता
ऑनलाइन ट्रेडिंग और निवेश के नाम पर होने वाली ठगी में साइबर अपराधी शुरुआत में छोटी रकम लगवाकर भरोसा जीत सकते हैं। कई बार फर्जी एप या वेबसाइट पर नकली मुनाफा भी दिखाया जाता है। लोग स्क्रीन पर बढ़ती रकम देखकर और पैसा लगाते चले जाते हैं। लेकिन असली परीक्षा तब शुरू होती है, जब वे अपनी रकम निकालना चाहते हैं। इसलिए किसी भी ऑनलाइन निवेश से पहले प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता, कंपनी की जानकारी और संबंधित वित्तीय नियामकीय स्थिति की जांच करना बेहद जरूरी है।
साइबर ठगी से बचने के लिए याद रखें ये बातें
- अनजान व्यक्ति के कहने पर कोई एप डाउनलोड न करें।
- ऑनलाइन ट्रेडिंग या निवेश में पैसा लगाने से पहले प्लेटफॉर्म की पूरी जानकारी जांचें।
- गूगल सर्च से मिले किसी नंबर को आधिकारिक नंबर मानकर भरोसा न करें।
- ओटीपी, यूपीआई पिन, पासवर्ड, बैंक डिटेल और आधार जैसी संवेदनशील जानकारी किसी अनजान व्यक्ति से साझा न करें।
- किसी अनजान लिंक पर क्लिक करने से बचें।
- अगर खाते से संदिग्ध ट्रांजेक्शन हो जाए तो तुरंत बैंक से संपर्क कर खाता या संबंधित सेवा ब्लॉक कराएं और साइबर अपराध की शिकायत करें।
एक गलती और महीनों की कमाई साफ
साइबर ठगी का सबसे खतरनाक पहलू यही है कि अपराधी सामने दिखाई नहीं देता। न कोई हथियार, न कोई जबरदस्ती- सिर्फ एक कॉल, एक लिंक, एक एप या कुछ भरोसेमंद शब्द और लोगों की मेहनत की कमाई मिनटों में गायब हो सकती है। इंदौर में सामने आए ये दोनों मामले सिर्फ दो लोगों की ठगी की कहानी नहीं हैं, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए चेतावनी हैं जो ऑनलाइन दुनिया में छोटी सी सुविधा के लिए सुरक्षा से समझौता कर देते हैं।
साइबर ठग तकनीक से ज्यादा इंसानी कमजोरी का फायदा उठाते हैं। इसलिए सावधानी सिर्फ विकल्प नहीं, ऑनलाइन सुरक्षा की पहली शर्त है। लालच से बचिए, जल्दबाजी से बचिए और किसी अनजान नंबर पर आंख मूंदकर भरोसा मत कीजिए- क्योंकि साइबर ठगी में एक छोटी सी चूक आपकी बड़ी जमा-पूंजी पर भारी पड़ सकती है।
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