दिल्ली में गरीब परिवारों के बच्चों को स्कूल यूनिफॉर्म के बदले नकद राशि देने की नीति को लेकर दिल्ली सरकार (Delhi government) को हाईकोर्ट (High Court ) से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यूनिफॉर्म के बदले पैसे देने की नीति को मनमाना नहीं कहा जा सकता। इसके साथ ही इस नीति को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई। यह फैसला जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और जस्टिस रेणु भटनागर की खंडपीठ ने सुनाया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अदालत ने 12 अक्टूबर को आदेश पारित किया था।
जस्टिस फॉर ऑल ने दायर की थी याचिका
इस मामले में संगठन ‘जस्टिस फॉर ऑल’ ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। संगठन ने दिल्ली हाईकोर्ट के 23 जनवरी 2026 के फैसले को चुनौती देते हुए स्कूल यूनिफॉर्म के बदले नकद राशि देने की नीति पर दोबारा विचार करने की मांग की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही दिल्ली सरकार की इस नीति को लेकर कानूनी चुनौती में सरकार को राहत मिली है।
क्या था पूरा मामला?
दिल्ली में गरीब बच्चों को स्कूल यूनिफॉर्म के बदले नकद सहायता देने का मामला शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून, 2009 को लागू कराने की मांग से जुड़ा है। मूल याचिका में मांग की गई थी कि निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित वर्ग (DG) के कोटे के तहत दाखिला पाने वाले बच्चों को मुफ्त किताबें, स्कूल यूनिफॉर्म और पढ़ाई के लिए जरूरी अन्य सामग्री उपलब्ध कराई जाए। इसमें सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त, दोनों तरह के मान्यता प्राप्त स्कूल शामिल थे।
विवाद तब शुरू हुआ, जब दिल्ली सरकार ने 10 जून 2025 को नई नीति लागू की। इसके तहत बच्चों को स्कूल यूनिफॉर्म सीधे वितरित करने के बजाय उन्हें खरीदने के लिए आर्थिक सहायता देने का फैसला किया गया। इस व्यवस्था में परिवारों को सहायता राशि दी जाती है, जिससे वे अपनी जरूरत के अनुसार बच्चों के लिए यूनिफॉर्म खरीद सकें। इस नीति को लेकर संगठन ‘जस्टिस फॉर ऑल’ ने अदालत में आपत्ति जताई और मामले में पुनर्विचार की मांग की। संगठन का पक्ष था कि बच्चों को मुफ्त शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने के उद्देश्य को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, सरकार की नीति में यूनिफॉर्म के बदले आर्थिक सहायता देने की व्यवस्था अपनाई गई। मामला आगे बढ़ने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 जनवरी 2026 को सरकार की नीति को लेकर फैसला सुनाया। इसके बाद संगठन ने पुनर्विचार याचिका दायर की, जिसे 12 अक्टूबर 2026 को अदालत ने खारिज कर दिया।
सरकार ने क्या दलील दी?
दिल्ली सरकार ने हाईकोर्ट में दलील दी कि स्कूल यूनिफॉर्म की खरीद और वितरण की प्रक्रिया काफी जटिल है। इससे शिक्षा विभाग और स्कूलों पर अतिरिक्त प्रशासनिक बोझ पड़ता है। सरकार के मुताबिक, गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) के जरिए टेंडर जारी करने और खरीद प्रक्रिया पूरी करने में आमतौर पर करीब छह महीने लग जाते हैं। सरकार ने यह भी बताया कि प्रत्येक स्कूल की यूनिफॉर्म का रंग, डिजाइन और माप अलग-अलग होता है। ऐसे में सभी पात्र विद्यार्थियों के लिए समय पर सही यूनिफॉर्म खरीदना और वितरित करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसी समस्या को देखते हुए सरकार ने सीधे यूनिफॉर्म बांटने के बजाय बच्चों के परिवारों को आर्थिक सहायता देने की नीति अपनाई। हाईकोर्ट ने सरकार की दलीलों पर विचार करते हुए जनवरी 2026 में अपने 13 अप्रैल 2023 के आदेश में बदलाव किया था। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया था कि पात्र बच्चों को यूनिफॉर्म खरीदने के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
पुनर्विचार याचिका में क्या कहा गया?
संगठन ‘जस्टिस फॉर ऑल’ ने हाईकोर्ट के जनवरी 2026 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए कहा कि उसे अपना जवाब दाखिल करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। संगठन ने यह भी तर्क दिया कि यूनिफॉर्म के बदले नकद राशि देने की नीति शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून, 2009 की भावना के अनुरूप नहीं है। हालांकि, हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुनवाई का उचित अवसर नहीं मिलने संबंधी दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि याचिका दायर होने के बाद याचिकाकर्ता को पर्याप्त समय दिया गया था। संगठन के वकील सुनवाई के दौरान पेश हुए और उन्होंने मामले में अपनी दलीलें भी रखीं। अदालत के मुताबिक, याचिकाकर्ता की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग भी नहीं की गई थी। इसी आधार पर अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि सुनवाई का पर्याप्त अवसर नहीं मिलने का तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके बाद पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई, जिससे दिल्ली सरकार की नकद सहायता नीति को लेकर पहले दिए गए फैसले पर कोई बदलाव नहीं हुआ।
कानून की दूसरी दलील पर अदालत की राय
यूनिफॉर्म के बदले नकद सहायता देने की नीति को शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून की भावना के खिलाफ बताए जाने पर हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के प्रावधानों और सरकार की नीति पर पहले ही विचार किया जा चुका है। अदालत के मुताबिक, पुनर्विचार याचिका में पहले उठाए गए तर्कों को दोबारा पेश किया गया, जबकि पुनर्विचार का दायरा सीमित होता है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पुनर्विचार याचिका अपील का विकल्प नहीं है। इसे केवल कुछ निर्धारित परिस्थितियों में स्वीकार किया जा सकता है। इनमें ऐसा नया और महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आना शामिल है, जिसे पूरी कोशिश के बावजूद पहले पेश नहीं किया जा सका हो। इसके अलावा, रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाली ऐसी गलती भी पुनर्विचार का आधार बन सकती है, जिसे पहचानने के लिए लंबी बहस या विस्तृत तर्क की जरूरत न पड़े। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पुनर्विचार के जरिए पहले दिए गए निर्णय पर दोबारा पूरी सुनवाई नहीं की जा सकती। बेंच के अनुसार, याचिकाकर्ता की दलीलें मूल फैसले में हस्तक्षेप करने के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं करती थीं।
अदालत का अंतिम रुख क्या रहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतें सामान्यतः सरकार की नीतिगत फैसलों में हस्तक्षेप नहीं करतीं। हस्तक्षेप तभी उचित होता है, जब नीति स्पष्ट रूप से मनमानी या अनुचित हो और न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पैदा करे। इस मामले में अदालत को पिछले फैसले में ऐसी कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं मिली, जिसके आधार पर पुनर्विचार किया जाना जरूरी होता। साथ ही, याचिकाकर्ता यह भी साबित नहीं कर सका कि फैसले के दौरान किसी महत्वपूर्ण सामग्री की अनदेखी हुई थी। इन आधारों पर खंडपीठ ने पुनर्विचार याचिका और उससे जुड़ी सभी लंबित अर्जियों को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता संगठन ‘जस्टिस फॉर ऑल’ की ओर से अधिवक्ता खगेश बी. झा पेश हुए थे।
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