दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने दिल्ली सरकार के उस फैसले पर गंभीर टिप्पणी की है, जिसमें आपात स्थिति में पेड़ों को हटाने के लिए ट्री ऑफिसर की पूर्व अनुमति की आवश्यकता को हटाया गया था। अदालत ने इस फैसले को प्रथम दृष्टया (prima facie) अदालत की अवमानना जैसा मामला माना है। मामला एक अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि इमरजेंसी प्रावधानों का दुरुपयोग कर राजधानी में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जा रही है।

पिछले वर्ष जून में जारी एक अधिसूचना के तहत वन विभाग ने यह प्रावधान किया था कि जान, संपत्ति या यातायात के लिए तत्काल खतरा पैदा करने वाले पेड़ों को बिना पूर्व अनुमति हटाया जा सकता है, बशर्ते 24 घंटे के भीतर संबंधित ट्री ऑफिसर को इसकी सूचना दे दी जाए। याचिका में दावा किया गया है कि इसी छूट का उपयोग कर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है।

जस्टिस जसमीत सिंह ने जून 2025 के नोटिस पर रोक लगा दी

यह आदेश जस्टिस जसमीत सिंह की बेंच ने दिया। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हाई कोर्ट के पूर्व आदेशों और ‘दिल्ली प्रिजर्वेशन ऑफ ट्रीज एक्ट, 2023’ के तहत संबंधित अधिकारियों का यह दायित्व है कि वे हर पेड़ की सुरक्षा सुनिश्चित करें। अदालत ने स्पष्ट किया कि नागरिकों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे अधिकारियों को सूचना दें या उनकी ओर से निगरानी का काम करें। कोर्ट ने कहा कि पेड़ों की सुरक्षा के लिए प्रभावी और जिम्मेदार प्रणाली प्रशासन द्वारा ही लागू की जानी चाहिए।

अदालत ने कहा कि इस नोटिफिकेशन से यह प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारियों को विकास कार्यों में बाधा बनने वाले पेड़ों को हटाने की अनुमति दी गई है, जिससे पर्यावरण संरक्षण पर सवाल खड़े होते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस व्यवस्था में पेड़ काटने से पहले किसी प्रकार के सुरक्षा उपायों या विकल्पों पर विचार करने की स्पष्ट आवश्यकता नहीं दिखाई देती है। अदालत ने चिंता जताई कि इससे पेड़ों के संरक्षण के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंच सकता है।

याचिकाकर्ता लक्ष्य मंगला की ओर से पेश वकील आदित्य एन. प्रसाद ने अदालत में कहा कि बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद संबंधित विभाग नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं और हाई कोर्ट के आदेशों की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने इस स्थिति को उदासीनता और चिंताजनक बताया। सुनवाई के दौरान जस्टिस जसमीत सिंह ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी विभाग केवल नोटिफिकेशन जारी करके अदालत के आदेशों का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं ले सकते। अदालत ने संकेत दिया कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में नियमों का पालन सख्ती से होना चाहिए।

प्रथम दृष्टया (prima facie) प्रतिवादी अदालत की अवमानना के दोषी प्रतीत होते हैं। अदालत ने इस मामले में दिल्ली सरकार से विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पिछले वर्ष दिल्ली सरकार ने ट्री ऑफिसर्स के लिए दिल्ली प्रिजर्वेशन ऑफ ट्रीज एक्ट (DPTA), 1994 की कुछ धाराओं को लागू करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे। इसके साथ ही, आपातकालीन परिस्थितियों में जैसे किसी पेड़ के खतरा उत्पन्न करने की स्थिति में आरडब्ल्यूए, भूमि स्वामी एजेंसियों, व्यक्तियों या संबंधित एजेंसियों को बिना पूर्व अनुमति पेड़ हटाने की अनुमति भी दी गई थी।

सरकार ने वन विभाग से क्या कहा

दिल्ली के वन विभाग ने पेड़ों की छंटाई और हटाने से जुड़े नियमों को लेकर स्पष्टता दी है। विभाग के अनुसार, कुछ विशेष परिस्थितियों में तुरंत कार्रवाई की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। विभाग ने बताया कि पेड़ों की तुरंत छंटाई या उन्हें हटाने की अनुमति उन मामलों में दी जा सकती है, जहां पेड़ सड़क, पुल, नालियों या सीवर लाइनों में बाधा डाल रहे हों, या इमारतों एवं हेरिटेज संरचनाओं को नुकसान पहुंचा रहे हों। इसके अलावा मेट्रो या रेलवे के बुनियादी ढांचे में बाधा, तथा ऐसे पेड़ जो सूख चुके हों, मर चुके हों या खतरनाक ढंग से झुके हुए हों और गिरने का खतरा पैदा करते हों, ऐसी स्थितियों में भी कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि विभाग ने स्पष्ट किया कि ऐसी किसी भी कार्रवाई के बाद संबंधित एजेंसी, व्यक्ति या आरडब्ल्यूए को 24 घंटे के भीतर DPTA ई-फॉरेस्ट पोर्टल पर विवरण अपलोड करना अनिवार्य होगा। इसमें कम से कम तीन अलग-अलग कोणों से ली गई तस्वीरें, जियो-कोऑर्डिनेट, कार्रवाई का कारण और बाद की स्थिति की तस्वीरें शामिल करनी होंगी।

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