अभय मिश्रा, मऊगंज। भगवान के घर में आस्था की आड़ में लूट का एक और घिनौना चेहरा सामने आया है। अयोध्या के बाद अब मऊगंज जिले के सुप्रसिद्ध देवतालाब शिव मंदिर में दान के पैसों पर डाका डालने का मामला प्रकाश में आया है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत लोक सूचना अधिकारी एवं तहसीलदार कार्यालय मऊगंज से प्राप्त 11 पन्नों के आधिकारिक दस्तावेजों ने प्रबंध समिति के दावों के परखच्चे उड़ा दिए हैं।  दस्तावेजों से साफ है कि कैसे महाशिवरात्रि मेले की आड़ में बिना किसी वैध प्रस्ताव और बिना किसी सरकारी टेंडर (निविदा) के महज 48 घंटे के भीतर 5,63,500 का चूना सरकारी खजाने और श्रद्धालुओं की आस्था को लगाया गया।

 48 घंटे का ‘चमत्कार’: न प्रस्ताव, न टेंडर और पास हो गए लाखों के बिल और चल पड़ी नोट शीट

दस्तावेजों के मुताबिक, महाशिवरात्रि के ठीक दो दिन पहले 13 फरवरी 2026 को पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व वर्तमान विधायक गिरीश गौतम की अध्यक्षता में प्रबंध समिति की बैठक होती है। बैठक में एसडीएम, तहसीलदार, नायब तहसीलदार और सीईओ मौजूद रहते हैं। इस बैठक में केवल चार बिंदुओं पर सहमति बनती है (जिसमें वाहन पूजा शुल्क, वीआईपी दर्शन शुल्क, शहनाई वादन और हर सोमवार ध्वजा बदलना शामिल था)।

हैरानी की बात यह है कि इस बैठक में मंदिर की सजावट, महाप्रसाद या टेंट के लिए भारी-भरकम खर्च का कोई प्रस्ताव पास ही नहीं हुआ। लेकिन 13 फरवरी को बैठक होती है और 15 फरवरी को महाशिवरात्रि मेले के शुरू होते ही, सुबह श्रद्धालुओं के आने से पहले ही ₹5.63 लाख के देयक (बिल) तैयार कर भुगतान के लिए नस्ती (नोटशीट) भी चला दी जाती है।

 टेंट वाले से बजवाई शहनाई, कागजों पर सजे 5000 फूलों के हार

कागजी फूलों की सजावट: देयक क्रमांक 40 (दिनांक 15/02/2026) के तहत ‘राजेश कुमार सिंह इवेंट आर्गेनाइजर फूडिंग एंड कैटरर’ को 1,50,000 फूलों की माला (5000 मालाएं 30 के भाव से) और 50,000 अतिरिक्त सजावट के नाम पर यानी कुल ₹2,000,000 का भुगतान कर दिया गया। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि मंदिर के केवल मुख्य द्वार पर कुछ गिने-चुने फूल-पत्ते लटके थे और लाइटिंग का नामोनिशान तक नहीं था।

बिना निविदा का महाप्रसाद: देयक क्रमांक 41 के जरिए ₹2,50,000 का भुगतान देसी घी के पेड़े, पूड़ी और महाप्रसाद के नाम पर ₹50 प्रति पैकेट के हिसाब से कर दिया गया। सवाल यह है कि बिना किसी टेंडर के 24 घंटे में यह प्रसाद किसने बनाया और किसे बांटा?

अजब-गजब टेंट हाउस: ‘गंगा टेंट हाउस’ के देयक क्रमांक 96 के तहत ₹20,000 टेंट-कुर्सी के लिए और ₹40,000 शहनाई बजवाने के नाम पर दे दिए गए। यानी टेंट वाले से ही शहनाई बजवा ली गई और बिना किसी प्रस्ताव के भुगतान भी कर दिया गया।

घोटाले में ‘टाइम ट्रैवल’: 2026 के भुगतान में 2025 के फर्जी बिल खपाए

भ्रष्टाचार की हद तो तब हो गई जब इस पूरी बंदरबांट में साल भर पुराने बिलों को भी शामिल कर लिया गया।

‘महाराजा प्लाईवुड हार्डवेयर’ के बिल क्रमांक 30 (दिनांक 01/03/2025) के जरिए 20 लीटर इमल्शन और दो ब्रश के नाम पर 23,700 का भुगतान किया गया। जिस पेंट और ब्रश की बाजार कीमत अधिकतम 7,000 है, उसके लिए 16,600 अतिरिक्त वसूले गए। इसी तरह ‘चंदेल स्टील फेब्रिकेशन’ को देयक क्रमांक 134 (दिनांक 10/07/2025) के तहत 22,000 का पुराना भुगतान भी इसी मेले के खाते में डाल दिया गया।

तहसीलदार की चेतावनी दरकिनार, एसडीएम के इशारे पर हुआ खेल?

इस पूरे खेल में सबसे गंभीर पहलू प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका का है। मऊगंज तहसीलदार (जो प्रबंध समिति के सचिव भी हैं) ने बकायदा नोटशीट पर लिखा था कि “शिव मंदिर प्रबंध समिति के अनुमोदन के पश्चात ही भुगतान किया जाना उचित होगा।” इसके बावजूद, बिना किसी समिति के अनुमोदन के, नियमों को ताक पर रखकर अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) मऊगंज द्वारा 18 मार्च 2026 को इस भुगतान को हरी झंडी दे दी गई। नोटशीट में यह तक दर्ज नहीं है कि यह राशि किस बैंक खाते में ट्रांसफर की गई।

जिस मंदिर में लाखों श्रद्धालु अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा भगवान के चरणों में चढ़ाते हैं, वहां आज तक एक ढंग का सार्वजनिक शौचालय नहीं बन सका है। लेकिन कागजों पर 48 घंटे के भीतर लाखों रुपये स्वाहा कर दिए गए। बिना किसी वैध प्रस्ताव, बिना निविदा प्रक्रिया के चहेते ठेकेदारों और वेंडरों को उपकृत करने का यह खेल सीधे तौर पर उच्चाधिकारियों और सफेदपोशों के संरक्षण की ओर इशारा करता है। जनता अब सवाल पूछ रही है कि आस्था के नाम पर डकैती डालने वाले इन जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी?

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