अमित पाण्डेय, डोंगरगढ़। मां बम्लेश्वरी के नामकरण को लेकर कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा के एक कथित कथा-प्रसंग के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा तेज हो गई है। इस प्रसंग में माता पार्वती की शिव-प्राप्ति की साधना, उनकी सखी विजया और भगवान शिव के डमरू से निकले ‘बम’ नाद को जोड़ते हुए यह बताया गया कि इसी साधना से देवी का नाम ‘बम्लेश्वरी’ पड़ा। दावा रोचक है, लेकिन जब इसे उपलब्ध पौराणिक संदर्भों और डोंगरगढ़ की स्थानीय परंपराओं से मिलाकर देखा गया तो कहानी के कई पहलू अलग नजर आते हैं।

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शिव पुराण में माता पार्वती के भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या करने का प्रसंग मिलता है। इसमें उनकी तपस्या, शिव की परीक्षा और पार्वती की दृढ़ भक्ति का विस्तार से वर्णन है। पार्वती की सखियों का भी प्रसंग आता है। लेकिन उपलब्ध शिव पुराण के जिन पाठों की पड़ताल की गई, उनमें भगवान शिव के डमरू से ‘बम’ शब्द निकलने, माता पार्वती द्वारा इसी ‘बम’ नाद के साथ साधना करने और इसी वजह से उनका नाम ‘बम्लेश्वरी’ पड़ने की कथा नहीं मिलती। ऐसे में माता पार्वती की तपस्या को तो पुराणिक कथा कहा जा सकता है, लेकिन उससे सीधे माँ‘बम्लेश्वरी’ नाम की कथा जोड़ना उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों से प्रमाणित नहीं होता।

डोंगरगढ़ की स्थानीय परंपरा इस मामले में एक अलग कहानी बताती है। यहां मां बम्लेश्वरी को कई जगहों पर बमलाई दाई और मां बगलामुखी से जोड़ा जाता है। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में देवी के नाम के बंगलामुखी से बमलाई और फिर बम्लेश्वरी तक पहुंचने की कहानी बताई जाती है।

डोंगरगढ़ की प्रसिद्ध लोककथा में राजा कामसेन, माधवानल और कामकंदला की भी कहानी आती है। इसी कथा में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के डोंगरगढ़ पहुंचने, देवी की साधना करने और देवी को यहां विराजमान होने के लिए मनाने की मान्यता सुनाई जाती है।

हालांकि, यह पूरी परंपरा धार्मिक और लोकस्मृति का हिस्सा है, इसलिए इसके हर विवरण को ऐतिहासिक तथ्य मानने के लिए स्वतंत्र अभिलेखीय या पुरातात्विक प्रमाण जरूरी होंगे। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर भी डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी से जुड़ी वीरसेन, मदनसेन और विक्रमादित्य की कथा का उल्लेख मिलता है।

वहीं सरकारी Incredible India की साइट में देवी को बंगलामुखी से जोड़ते हुए बमलाई और बम्लेश्वरी नाम की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इससे इतना जरूर स्पष्ट होता है कि डोंगरगढ़ में मां के नाम और स्वरूप को लेकर एक से अधिक लोकपरंपराएं प्रचलित रही हैं।

यही वजह है कि इस पूरे मामले को केवल किसी एक कथा के सही या गलत होने के सवाल तक सीमित करना ठीक नहीं होगा। पंडित प्रदीप मिश्रा के बताए जा रहे प्रसंग में माँ पार्वती की तपस्या और शिव-आराधना जैसे तत्व पौराणिक साहित्य से जुड़े हैं, लेकिन ‘डमरू के बम नाद से बम्लेश्वरी नाम पड़ा’ वाली विशिष्ट कड़ी का प्रमाण उपलब्ध प्रमुख शिव पुराण पाठ में नहीं मिला है। दूसरी ओर बगलामुखी-बमलाई-बम्लेश्वरी वाली परंपरा डोंगरगढ़ की स्थानीय धार्मिक स्मृति में पहले से दिखाई देती है।

इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि ‘बम’ नाद से ‘बम्लेश्वरी’ नाम पड़ने वाली कथा का मूल स्रोत क्या है? क्या यह किसी दूसरे प्राचीन ग्रंथ में दर्ज है, किसी स्थानीय धार्मिक ग्रंथ से आई है या फिर मौखिक कथा परंपरा के जरिए विकसित हुई है? जब तक इसका मूल स्रोत सामने नहीं आता, इसे सीधे पुराण में वर्णित प्रमाणित कथा कहना उचित नहीं होगा। हालांकि, इस पड़ताल का अर्थ मां बम्लेश्वरी की आस्था पर सवाल उठाना कतई नहीं है।

डोंगरगढ़ की मां लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं और उनकी धार्मिक पहचान कई सदियों की लोकस्मृति, देवी-पूजा, शाक्त परंपरा और स्थानीय सांस्कृतिक मान्यताओं से बनी है। सवाल केवल इतना है कि आस्था के साथ जुड़ी किसी कथा को जब ऐतिहासिक या पुराणिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो उसका स्रोत भी सामने होना चाहिए।

फिलहाल, उपलब्ध स्रोतों के आधार पर इतना कहा जा सकता है कि पार्वती की शिव-प्राप्ति की तपस्या पुराणिक कथा है, लेकिन ‘शिव के डमरू के बम नाद से बम्लेश्वरी नाम पड़ा’ वाली विशिष्ट कहानी का प्रमाण उपलब्ध प्रमुख शिव पुराण पाठ में नहीं मिलता। वहीं डोंगरगढ़ की स्थानीय परंपरा देवी को बगलामुखी, बमलाई और बम्लेश्वरी के रूप में जोड़ती है। इसलिए इस कथा का अंतिम सच जानने के लिए अब जरूरत भावनाओं की नहीं, बल्कि उस मूल स्रोत की तलाश की है, जहां से ‘बम’ से ‘बम्लेश्वरी’ बनने की यह कहानी निकली।

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