Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

दाम बिना काम नहीं

सूबे के एक मंत्री जी की साख का आलम यह है कि 40 फीसदी कमीशन वाली उनकी गाथा सूबे के बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ी हुई है. अब कमीशन के इस पुराने बहते झरने से जब प्यास नहीं बुझी, तो हुजूर ने तबादला उद्योग का कारखाना खोल लिया. हाल ही में तबादले की एक सूची जारी हुई. सालों से एक ही कुर्सी पर कुंडली मारे बैठे एक साहब का तबादला किसी सुदूर इलाके में कर दिया गया. साहब का कलेजा मुंह को आ गया. वह शहर छोड़ना नहीं चाहते थे, सो जुगाड़ की सीढ़ी तलाशने लगे. जल्द ही सीढ़ी मिल गई और साहब सीधे मंत्री जी के दरबार जा पहुंचे. गिड़गिड़ाकर बोले, हुजूर, मेरा तबादला रुकवा दीजिए. यह सुनते ही मंत्री जी की तो जैसे मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई, अंधा क्या चाहे, दो आंख. सौदा तय हुआ. इधर साहब की जेब से 10 लाख रुपये की हरी-हरी पत्तियां निकली, उधर तबादला आदेश तुरंत रद्दी की टोकरी में समा गया. अभी यह लेन-देन का पावन प्रसंग चल ही रहा था कि मंत्री जी के ओएसडी ने कमरे में कदम रखा. ओएसडी के हाथ सूबे के एक शक्तिशाली मंत्री का सिफारिशी पत्र था, जो उनके किसी चहेते के तबादले से जुड़ा था. मंत्री ने लिफाफे की तरफ तिरछी नजर से देखा और पहला सवाल दागा, सिर्फ सिफारिश की चिट्ठी आई है या लिफाफे में कुछ वजन भी आया है? ओएसडी मासूमियत से बोला, हुजूर, फिलहाल तो सिर्फ चिट्ठी ही आई है. यह सुनते ही मंत्री जी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उनके माथे पर बल पड़ गया और ओएसडी को झाड़ते हुए वह बोले, ऐसी सिफारिशी चिट्ठियों से बाबा जी का ठुल्लू भी नहीं मिलता. ऐसी बे-वजन चिट्ठियों की सही जगह रद्दी की टोकरी है. जाओ उसे वहीं फेंक दो. पैरवी की ऐसी सूखी चिट्ठियां तो रोज सुबह-शाम आती-जाती रहती हैं. अब तक कमरे में मौजूद साहब यह सब देख सुन रहे थे. उनके मन में यह ख्याल आया कि चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए वाले तो बहुत देखे थे, पर हमारे मंत्री जी तो दाम बिना काम नहीं और बिना दक्षिणा के राम नहीं के सिद्धांत पर सूबे की व्यवस्था चला रहे हैं. 

इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : लाइजनर… सांसद वर्सेस अफसर… कड़वी सच्चाई… साख… जीरो पेंडिंग केस !… वन-विवाद… – आशीष तिवारी

सरकारी दामाद

सरकार में हुकूमतें बदलती हैं, नीतियां बदलती हैं और तो और आला अफसर भी बदल जाते हैं, लेकिन दामाद बने सरकारी बाबू अपनी मलाईदार कुर्सी पर फेविकोल का ऐसा जोड़ लगाकर बैठते हैं कि पूरा तंत्र उनके आगे पनाह मांगता नजर आता है. यह किस्सा पीने-पिलाने वाले महकमे का है, जहां बरसो से एक बाबू एक ही जगह खूंटा गाड़े बैठा है. किस्सा बेहद रोचक है. करीब छह महीने पहले जब एक अफसर की शिकायत पर उसका तबादला हुआ, तो बाबू के तन-बदन में आग लग गई. वह सीधे विभाग की कमान संभाल रहीं कड़क और तेजतर्रार सचिव के केबिन में जा धमका. बाबू ने अपना तबादला रुकवाने उनके आगे खूब मिन्नते की, लेकिन सचिव की कड़क मिजाजी के आगे उसकी दाल नहीं गली. उन्होंने बाबू को डांटकर भगाना चाहा, पर बाबू तो बाबू था. उसने ऐसे कई सचिवों की नाप ले रखी थी. उसने केबिन में ही ड्रामा शुरू कर दिया और खुली धमकी दे डाली. बाबू ने कहा, मैडम अगर मेरा तबादला नहीं रुका, तो इसी केबिन के पंखे से लटककर जान दे दूंगा. यह सुनते ही घबराई सचिव ने मातहतों से कहा कि इसे उठाकर बाहर फेंक दो. मालूम नहीं कि इसके बाद बाबू ने पर्दे के पीछे से ऐसी कौन सी चाबी घुमाई कि चंद दिनों में ही उसका तबादला आदेश रद्द हो गया. खैर यह बात पुरानी हुई. मगर अब जब हाल ही में बड़े स्तर पर प्रशासनिक समन्वय से उसका फिर तबादला किया गया, तो इस बार बाबू ने सीधे कोर्ट की चौखट पकड़ ली और स्टे ऑर्डर लाकर सरकार की आंखों में आंखें डाल दी. सवाल उठता है कि क्या सरकार के पास ऐसे जिद्दी और अड़ियल बाबुओं का कोई पक्का इलाज नहीं है? इलाज तो बिल्कुल अचूक है, बस नीयत की जरूरत है. सरकार चाहे तो रूल 56 (जे) की कैंची चलाकर ऐसे बाबुओं को जबरन रिटायरमेंट दे सकती है या संविधान के अनुच्छेद 311 (2) का इस्तेमाल कर बिना किसी लंबी जांच के सीधे नौकरी से बर्खास्त कर सकती है. इसके अलावा आय से अधिक संपत्ति की विजिलेंस जांच करा सकती है. सरकार तो फिर सरकार है, लेकिन इस बाबू के मामले में सरकार बार-बार पानी पी रही है. 

इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : रसूख… रिश्वत… सब्र किसे है?… बकाया… ‘मोक्ष’ के रास्ते… नकेल… डेपुटेशन… लेट रिस्पांस… – आशीष तिवारी

दांव पेंच

पुलिस मुख्यालय के मौजूदा हालात देखकर तो यही लगता है कि यहां का ग्रह-नक्षत्र पूरी तरह से खराब चल रहा है. अफसरों के बीच तालमेल का नामो-निशान नहीं है और इसे सुधारने की जरा भी कोशिश दिखाई नहीं पड़ती. लगता है कि अफसर पुलिस मुख्यालय को अखाड़ा समझ बैठे हैं. पुलिस मुख्यालय में अदृश्य तख्ती टंगी है, जिस पर लिखा है कि सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक अखाड़ा खुला है. आइए अपने-अपने दांवपेंच आजमा लीजिए. इस अखाड़े से कभी-कभी आवाज भी सुनाई देती है कि इधर से फलाने की टांग खींच, उधर से ढेकाने की गर्दन दबा. कभी कोई चिल्लाता सुनाई देता है, लगा धोबी पछाड़-धोबी पछाड़. फिर धड़ाम से आवाज आती है, लेकिन यह मालूम नहीं चलता कि दाव किसका था. पुलिस मुख्यालय में जंग सब लड़ रहे हैं, लेकिन किसे किससे निपटना है, किसी को खबर नहीं. इन आला अफसरों के बीच अगर कोई चीज सबसे ज़्यादा मजबूत है, तो वह है उनका ‘ईगो’. डीजीपी साहब का अपना राग है, तो उनके मातहत अफसरों की अपनी अलग तान. ऐसा लगता है कि व्यवस्था में सुधार लाना अब किसी की प्राथमिकता में शामिल नहीं है. कार्य-विभाजन की ही मिसाल लीजिए. जब डीजीपी साहब कार्यवाहक थे, तब होमगार्ड्स और लोक अभियोजन उनकी मूल पोस्टिंग थी. अब जब वे पूर्णकालिक प्रमुख बन चुके हैं, तब भी ये प्रभार उन्हीं की जेब में हैं. दूसरी तरफ कई ऐसे वरिष्ठ अफसर हैं, जिनके पास काम के नाम पर मक्खी मारने तक की ज़िम्मेदारी नहीं है. कुल मिलाकर पुलिस मुख्यालय का प्रबंधन आपसी खींचतान और अविश्वास के चक्रव्यूह में उलझकर रह गया है. यहां हर अफसर को दूसरे में सौतन नजर आ रही है. भरोसा पूरी तरह गायब है. अब तो बस सरकार-ए-हुजूर की नज़र-ए-इनायत होने का इंतज़ार है, शायद वही आकर इस प्रशासनिक गतिरोध को दूर कर सकें.

इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : चाय चर्चा… मुकर गए… करतूत… कलई… सीबीआई जांच !… अभयदान !… – आशीष तिवारी

अदालत की चौखट 

यकीनन ऐसा पहली बार नहीं हो रहा, लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह बार-बार अदालतें चीफ सेक्रेटरी, सेक्रेटरी, डीजीपी समेत सरकार के शीर्ष अफसरों को तलब कर रही हैं, यह जरूर गंभीर सवाल खड़े करता है. अवमानना याचिकाओं से लेकर पुलिस जांच में देरी, प्रशासनिक निर्देशों के पालन में लापरवाही और अदालत के आदेशों पर समय पर जवाब नहीं देने जैसे मामलों में अफसरों को सीधे नोटिस मिल रहे हैं. कई मामलों में तो अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का फरमान भी जारी हो रहा है. मामला सिर्फ नोटिस और पेशी का नहीं है, सवाल उस संदेश का है जो शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहा है. अदालतों में शीर्ष अफसरों की मौजूदगी और उन्हें सार्वजनिक तौर पर फटकार लगाए जाने की तस्वीरें अब असामान्य नहीं रह गई हैं. सवाल उठता है कि आखिर ऐसी नौबत बार-बार क्यों आ रही है? क्या सरकारी मशीनरी अदालतों के आदेशों को गंभीरता से नहीं ले रही? क्या निचले स्तर पर आदेशों के क्रियान्वयन और उसकी मॉनिटरिंग में चूक हो रही है?आखिर अदालत को बार-बार अफसरों को याद क्यों दिलाना पड़ रहा है कि आदेश का पालन करना विकल्प भर नहीं है, यह जिम्मेदारी है. अदालत के आदेश के पालन में लगातार देरी या लापरवाही की स्थिति सामान्य नहीं मानी जा सकती. खासकर तब जब मामला सरकार के शीर्ष अधिकारियों तक पहुंच रहा हो. अदालत की फटकार किसी एक अफसर की व्यक्तिगत किरकिरी भर नहीं होती है. यह पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यशैली पर सवालिया निशान बन जाती है. सरकार के शीर्ष अफसरों के हिस्से अगर बार-बार अदालती लताड़ आए, तो यह किसी भी सरकार के लिए अच्छा संदेश नहीं है. इससे यह धारणा बन सकती है कि शासन की मशीनरी आदेशों के पालन को लेकर उतनी गंभीर नहीं है, जितनी उससे अपेक्षा की जाती है.इसलिए यह सिर्फ अदालत बनाम अफसरशाही का मुद्दा नहीं है. यह गुड गवर्नेंस की कसौटी से जुड़ा सवाल है. सरकार को भी शायद इस पर आत्ममंथन करना चाहिए कि अदालतों तक बात पहुंचने से पहले प्रशासनिक स्तर पर ऐसी शिकायतों का समाधान क्यों नहीं हो पा रहा है? लोकतंत्र में अदालत की चौखट तक मामला पहुंचना समस्या का हिस्सा है, लेकिन आदेश के बाद भी उसका पालन न होना उससे कहीं बड़ी समस्या है. सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि अगर सरकार के शीर्ष अफसरों को ही बार-बार अदालत की चौखट पर खड़ा होना पड़े, तो फिर नीचे तक कानून और आदेश की गंभीरता का संदेश कैसे पहुंचेगा? 

इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : रसूख… कन्फ्यूज कौन?… बिजली तंत्र… प्रिविलेज !… बाबा के हाथों कमान?… – आशीष तिवारी

मीटिंग प्वाइंट

शहर के वीआईपी रोड तिराहे के पास स्थित एक कैफे इन दिनों राजनीतिक हलचल का नया केंद्र बन गया है. पूर्ववर्ती सरकार के दौरान कई चर्चित घोटालों के आरोपियों के लिए अब यह कैफे उनका पसंदीदा मीटिंग प्वाइंट है, जहां बेधड़क रणनीतियां बन रही हैं. हाल ही में कोर्ट में पेशी के बाद आरोपी सीधे इसी कैफे पहुंचे और घंटों लंबी बैठकी की. चौंकाने वाली बात यह रही कि इस महफिल में सत्ताधारी भाजपा के वे चेहरे भी मौजूद थे, जिनकी सत्ता के केंद्र में तगड़ी घुसपैठ मानी जाती है. लगता है कि अदालत में फैसले बाद में होंगे, फिलहाल तो सरकार और सियासत के सारे पन्ने कैफे की कॉफी टेबल पर ही पलटे जा रहे हैं. वैसे विपक्ष के कुछ बड़े नेता घोटाले की जांच की आंच सत्ता के प्रमुख केंद्रों तक पहुंचने का जिक्र करते रहे हैं, लेकिन यहां उसी आंच पर साथ बैठकर काफी सुड़की जा रही है.

इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : रुतबा और रुआब… गृहयुद्ध… सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट… गड्ढों में फंसा विकास… जब X को चढ़ा भूपेश का बुखार… एक सूची और… – आशीष तिवारी

बेरूखी

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने अपनी नई टीम का ऐलान कर दिया है. टीम में छत्तीसगढ़ से तीन चेहरों को जगह मिली है. इनमें दो नाम जाने-पहचाने हैं, जबकि तीसरा चेहरा ऐसा है, जिसकी मौजूदगी ने सूबे की सियासत में सवाल खड़े किए हैं. सांसद रूपकुमारी चौधरी को महिला मोर्चा की कमान सौंपी गई है, वहीं दीपक म्हस्के को आईटी सेल का संयोजक बनाया गया है. दोनों को मिली जिम्मेदारियां संगठन की दृष्टि से अहम हैं और इन नियुक्तियों को छत्तीसगढ़ भाजपा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन चर्चा उस तीसरे नाम की ज्यादा है, जिसे छत्तीसगढ़ के कोटे से राष्ट्रीय टीम में जगह मिली है. वह नाम है संदीप पाठक. दिलचस्प बात यह है कि आम आदमी पार्टी के प्रभारी बनकर जब संदीप पाठक छत्तीसगढ़ आए थे, तब उन्होंने खुद को छत्तीसगढ़ की सियासत से जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. स्थानीय मुद्दों से लेकर राजनीतिक संवाद तक, उनका अंदाज ऐसा था मानो वे सूबे की सियासत के ही किरदार हो, लेकिन आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में आने के बाद तस्वीर कुछ बदली-बदली नजर आ रही है. अब वही पाठक छत्तीसगढ़ से ज्यादा दिल्ली के नेता नजर आते हैं. संगठन की जमीन पर उनकी स्वीकार्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ़ भाजपा के कई दिग्गज नेताओं के सोशल मीडिया हैंडल पर उनकी नियुक्ति को लेकर बधाई तो दूर, उनका जिक्र तक नजर नहीं आया. यह उस राजनीतिक दूरी का संकेत माना जा रहा है, जो पाठक और प्रदेश भाजपा के नेताओं के बीच दिखाई देती है. ऐसे में राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारी मिलने के बावजूद छत्तीसगढ़ भाजपा के भीतर उनकी स्वीकार्यता कितनी है, यह सवाल अभी अनुत्तरित ही है. फिलहाल तस्वीर यही कहती है कि दिल्ली ने संदीप पाठक पर भरोसा जताया है, लेकिन छत्तीसगढ़ ने अभी उन्हें दिल से स्वीकार नहीं किया है. हालांकि राजनीति में आज की दूरी कल की नजदीकी भी बन सकती है. 

इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : मंत्रियों की पाठशाला (1)… कथनी-करनी (2)… किसकी कटी नाक?… जमीनी समझ… मुखौटा… ग्रहण… – आशीष तिवारी

Lalluram.Com के व्हाट्सएप चैनल को Follow करना न भूलें.
https://whatsapp.com/channel/0029Va9ikmL6RGJ8hkYEFC2H