
रसूख
जब सूबे की सत्ता और शहर की सरकार एक ही रंग में रंगी हो, तो सारे नियम-कायदे रसूख की वेदी पर चढ़ा दिए जाते हैं। इस नगरीय निकाय को ही देख लीजिए, जहां लोकतांत्रिक मर्यादाओं का अनोखा तमाशा चल रहा है। मां महापौर की कुर्सी पर हैं और शहर की सत्ता की असली चाबी बेटे की मुट्ठी में है। वह भी तब जब बेटा सत्ताधारी दल का कार्यकर्ता नहीं, बल्कि एक खाकीधारी यानी पुलिसवाला है। पहले तैनाती दूरदराज के इलाके में थी। दूरी की वजह से लॉजिस्टिक्स की दिक्कत आ रही थी। सो स्वहित में दूरी ही घटा ली। मां महापौर थी ही सो राजनीतिक रसूख ने इस दूरी को घटाने का काम किया। अब नई पोस्टिंग वाले इलाके में साहबजादे की उपस्थिति का जिक्र उनकी ड्यूटी से ज्यादा वर्दी को खूंटी पर टांगने की उनकी कला के लिए होता है। तर्क बड़ा सीधा है, जब पूरा शहर चलाने की जिम्मेदारी सिर पर हो तब कानून व्यवस्था में वक्त कौन जाया करे? वैसे यह ठीक बात है। पूरी जिंदगी खाकी की सेवा में जो हासिल न होगा, वह चंद सालों में मिल जाएगा। खैर, सुना है कि नगर निगम के भीतर होने वाले हर छोटे-बड़े ठेके का रास्ता महापौर के इसी खाकीधारी बेटे से होकर गुजरता है। महापौर के इस खाकीधारी बेटे को उगाही का ज्ञान मिलता है, महापौर के पर्सनल असिस्टेंट यानी पीए से। पीए पिछली सरकार में कांग्रेस के एक विधायक का सारथी रह चुका था। यानी पीए की मैनेजमेंट स्किल पुरानी है, बस उसकी लोकेशन बदल गई है। बहरहाल इस पूरे तमाशे का सबसे दिलचस्प चेहरा इस इलाके से आने वाले कैबिनेट मंत्री हैं। खुली आंखों से वह सब देख-समझ रहे हैं। भ्रष्टाचार की पूरी क्रोनोलॉजी उनके सामने है, लेकिन सियासी मजबूरियों के आगे वह इतने लाचार हैं कि सिर्फ मन मसोसकर रह जाते हैं। व्यवस्था के भीतर लगा दीमक धीरे-धीरे सत्ता की कुर्सी चट कर रहा है। फिलहाल रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है।
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कन्फ्यूज कौन?
दुनिया के तमाम गणितज्ञों और सांख्यिकीविदों को चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए। महतारी वंदन योजना में पात्र-अपात्र हितग्राहियों को लेकर सदन में मंत्री जी ने जो ब्रह्म ज्ञान प्रकट किया है, उसने सांख्यिकी के सारे सिद्धांतों को धता बता दिया है। सदन में वह दृश्य वाकई विस्मयकारी था। पहले जब योजना के शुरुआती और मौजूदा लाभार्थियों के आंकड़ों के बीच 1 लाख 55 हजार 655 का एक बड़ा मिसमैच सामने आया, तब बड़ी खूबसूरती से उस पर ई-केवाईसी पेंडिंग होने की दलील दे दी गई। मोटे तौर पर यह समझाया गया कि घबराइए मत, ये वो लोग हैं जिनका अंगूठा मशीन से मैच नहीं कर रहा है, लेकिन जब विपक्षी सदस्य ने सवालों का पहाड़ खड़ा किया, तो शायद मंत्री जी का संतुलन डगमगा गया। उन्होंने ऑन-रिकॉर्ड, सीना ठोक कर कह दिया, इनमें से ज्यादातर वो लोग हैं जो मृत हो चुके हैं। यानी मंत्री जी के मुताबिक करीब 1 लाख 23 हजार 700 महिलाएं अब इस दुनिया में नहीं हैं, जो महतारी वंदन योजना का लाभ ले रही थीं। इसका सीधा मतलब तो यह हुआ कि महज ढाई साल के भीतर सूबे में इस कल्याणकारी योजना का लाभ ले रहीं करीब सवा लाख महिलाएं काल के गाल में समा गईं! जब खुद मंत्री विधानसभा में यह हैरतअंगेज आंकड़ा रख रही हों, तब फिर क्या ही कहा जाए? अब जरा पिछले तकनीकी तर्क की धज्जियां उड़ते हुए देखिए। मंत्री जी ने पहले कहा था कि जिनका ई-केवाईसी लंबित है, उन्हें वेरिफिकेशन के बाद पिछला रुका हुआ पैसा भी दे दिया जाएगा। अब अगर मंत्री जी के इसी दावे को परलोक सिधार चुकी महिलाओं के आंकड़ों से जोड़कर देखा जाए, तो बड़ा दिलचस्प सवाल खड़ा होता है, वो महिलाएं यमलोक में कौन सा पहचान पत्र अपडेट सेंटर ढूंढेंगी? क्या वे स्वर्ग या नरक के किसी क्लाउड कंप्यूटिंग नेटवर्क पर अपना अंगूठा स्कैन करके यह साबित करेंगी कि हम यमलोक पहुंच चुके हैं। कृपया हमारा पिछला एरियर हमारे खाते में ट्रांसफर कर दीजिए? अब समझ नहीं आ रहा है कि महतारी वंदन योजना के इन आंकड़ों को लेकर आखिर कन्फ्यूज कौन है? माननीय मंत्री जी या खुद सरकारी आंकड़े?
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बिजली तंत्र
हमारे घरों के बाहर टंगे वो चमचमाते स्मार्ट मीटर बिजली कंपनी के सबसे मुस्तैद सिपाही हैं। उनकी कर्तव्यनिष्ठा इतनी कड़क है कि इधर आपकी जेब से बिल के चंद रुपए लेट हुए नहीं कि उधर पलक झपकते ही घर की बत्ती गुल हो जाती है। यह वह करंट है, जो सिर्फ आम आदमी की नसों में दौड़ता है, लेकिन बिजली कंपनी की छाती पर जब 42 सरकारी महकमों का 3 हजार करोड़ रुपए का बिजली बिल अजगर की तरह कुंडली मारकर बैठता है, तब बिजली कंपनी का करंट प्रशासनिक लाचारी में बदल जाता है। सोचिए व्यवस्था का इससे क्रूर मजाक क्या होगा कि 1525 करोड़ रुपए का बिजली बिल दबाकर बैठा नगरीय प्रशासन विभाग स्मार्ट सिटी का ब्लूप्रिंट बना रहा है और 1057 करोड़ रुपए का बिजली बिल डकार चुका पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग कागजों पर गांवों को रोशन करने का दावा कर रहा है। बचे हुए 40 सरकारी विभागों का हाल भी कुछ इस तरह का ही है। इन सरकारी दफ्तरों में बिजली का बिल चुकाना एक स्वैच्छिक दान जैसा है। मन हुआ तो थोड़ा बहुत दे दिया वरना बजट का रोना रोकर फाइल आगे सरका दी। इन्हें पता है कि कोई इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बिजली कंपनी की लाठी सिर्फ उस लाचार नागरिक पर चलती है जो दिन-रात पसीना बहाकर टैक्स भी भरता है और अपने हिस्से की बिजली का एक-एक पैसा चुकाता है। खैर, सरकारी विभागों की इस मुफ्तखोरी से बिजली कंपनी की कमर टूट जाती है, बावजूद इसके कोई कड़ा फैसला लेने से कंपनी परहेज करती है। बिजली कंपनी सरकारी विभागों का हुक्का-पानी बंद करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। बिजली कंपनी का पूरा जोर आम उपभोक्ताओं पर चलता है। यानी सरकारी विभागों के निकम्मेपन का हर्जाना भी आम उपभोक्ताओं को ही भुगतना है जो पहले से ही महंगाई की चक्की में पिस रही है। यह सीधे-सीधे जनता की जेब पर डाका है, जिसे घाटे की भरपाई का सरकारी नाम दे दिया गया है। बिजली कंपनी को सफेद हाथी बने सरकारी विभागों में लगे स्मार्ट मीटर भी उसी बेरहमी से डाउन किए जाने चाहिए जैसे एक आम उपभोक्ता के किए जाते हैं, लेकिन ऐसा होगा नहीं, क्योंकि हमारी व्यवस्था का शाश्वत नियम यही है कि जब आम उपभोक्ता बिल न चुकाए तो वह डिफाल्टर है और जब सरकारी विभाग तीन हजार करोड़ डकार जाए तो वह अपरिहार्य प्रशासनिक परिस्थिति है।
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प्रिविलेज !
सरकार सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लाख जतन कर रही है। हर घर बिजली बनाने के नारे गूंज रहे हैं, लेकिन असल सवाल यह है कि नया रायपुर में रह रहे कितने मंत्रियों के बंगलों में सोलर पैनल लगाया गया है? नया रायपुर की सड़कों से गुजरने पर ज्यादातर मंत्रियों के बंगलों की छतों पर सोलर पैनल टंगे क्यों दिखाई नहीं देते? क्या उन्हें कोई प्रिविलेज हासिल है। या वे लोग अब आम नागरिक नहीं रहे। वह सरकारी विभाग हो गए हैं। ठीक वैसे ही जैसे 42 सरकारी विभाग हैं, जो बिजली कंपनी के बड़े बकायेदारों में शामिल हैं। खैर, सरकार कुछ तो सोच रही होगी। उम्मीद है कि जल्द ही मंत्रियों के सरकारी बंगलों की छतों पर टंगे सोलर पैनल बंगलों को रोशन करते दिखेंगे।
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बाबा के हाथों कमान?
इन दिनों मौसम भले ही बारिश का हो, लेकिन छत्तीसगढ़ की सियासत में कांग्रेस के भीतर गर्मी बढ़ गई है। इस पूरी तपन के केंद्र में है प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की वो कुर्सी, जिस पर फिलहाल दीपक बैज बैठे हैं, लेकिन उनका कार्यकाल एक्सपायर हो रहा है। अब तक दिल्ली दरबार ने उनके लिए रिन्यूअल का कोई मैसेज नहीं भेजा है, जाहिर है कि दूसरे दावेदारों के दिलों की धड़कनें और उम्मीदें दोनों ही हॉर्स-पावर की रफ्तार से दौड़ रही है। इस बीच बाबा यानी टीएस सिंहदेव सुपर-एक्टिव मोड में आ गए हैं। वे सरगुजा से लेकर बस्तर तक ऐसे दौरे कर रहे हैं मानो चुनाव कल सुबह ही होने वाले हो। वरिष्ठ नेताओं के घर जाकर चाय-पानी का दौर चल रहा है और मुलाकातों के सिलसिले बढ़ गए हैं। पिछले दिनों बाबा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य के जन्मदिन की बधाई देने पहुंच गए। इस दौरान पूर्व मुख्यमंत्री के साथ हुई उनकी गुफ्तगू पूरी कांग्रेस में चर्चा के केंद्र में है। हालांकि एक सूचना ये भी आई कि बाबा मोतीलाल वोरा और तीजन बाई के परिवार से मिलने दुर्ग के दौरे पर पहुंचे थे। इस दौरान उनकी गाड़ी पूर्व मुख्यमंत्री के घर की ओर भी घूमा ली गई। खैर, राजनीतिक पंडितों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि हाल के दिनों में सिंहदेव ने दिल्ली में अपनी स्थिति को बेहद मजबूत कर लिया है। छत्तीसगढ़ के सियासी गलियारों में यही कयास लगाए जा रहे हैं कि जल्द ही प्रदेश कांग्रेस की कमान बाबा के हाथों सौंपी जा सकती है, लेकिन कहानी में ट्विस्ट यहीं खत्म नहीं होता। अगर बाबा दूल्हा बनते हैं, तो मौजूदा दूल्हे यानी दीपक बैज का क्या होगा? उन्हें बिना किसी जिम्मेदारी के घर बैठा देना आसान नहीं। बैज राहुल गांधी की आंखों में चढ़े हुए नेता हैं। भूपेश बघेल का समर्थन है। बस्तर से दो बार के विधायक और एक बार के सांसद रह चुके हैं। आदिवासी समाज के युवा चेहरा है, जिन्हें हटाने से पहले उचित व्यवस्थापन करना हाईकमान की मजबूरी है। आदिवासी वोट बैंक को नाराज करके सूबे में सियासी जमीन मजबूत करना अंगारों पर नंगे पैर चलने जैसा है। कुल मिलाकर कांग्रेस की यह सियासी खिचड़ी दिल्ली की हांडी में पक रही है, जहां अगस्त से पहले तड़का लगने की पूरी उम्मीद है।
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