
…और बढ़ गई बेचैनी
मंत्रियों के मोबाइल नंबर पर सीएम हाउस से आया काल जैसे ही घनघनाया कुछ मंत्रियों की बेचैनी बढ़ गई। इन दिनों सत्ता के गलियारों में आजकल ऐसी घंटियों के साथ आशंकाएं भी साथ आती हैं। बदलाव की आहट फ़ोन की एक घंटी ही तो है। हालांकि इस बार वह घंटी बदलाव की नहीं थी, लेकिन इतना भरोसा किसी को नहीं था कि बेफ्रिक रहा जाए। मंत्री आनन-फ़ानन में सीएम हाउस की ओर दौड़ पड़े। जो मंत्री राजधानी में नहीं थे, उन्हें हवाई मार्ग से बुलाया गया। कुछ सड़क मार्ग से भागते हुए राजधानी पहुंचे। पता नहीं उनकी गाड़ियों के स्पीडोमीटर किस रफ़्तार से दौड़ रहे थे, लेकिन उनके दिलों की रफ़्तार जरूर सामान्य से ज्यादा थी। ढाई साल की सरकार में पहली मर्तबा सीएम हाउस का ऐसा रवैया था। मंत्रियों को बिना एजेंडा बताए तलब किया गया था। सिर्फ एक ही फरमान था, सब कुछ छोड़िए और तुरंत पहुंचिए। इस एक फ़ोन काल ने सीएम हाउस के रूतबे को थोड़ा और ऊंचा कर दिया। सभी मंत्रियों को एक सीधी लकीर पर लाकर खड़ा कर दिया गया था। जो अब तक थोड़ा आड़े-तिरछे चल रहे थे, वे भी उसी क़तार का हिस्सा बन गए। बैठक ऐसे समय बुलाई गई थी जब मंत्रिमंडल में बदलाव की अटकलें पहले से हवा में तैर रही थी। जाहिर है, कई मंत्रियों की धड़कनें सामान्य नहीं थी। कुछ की बेचैनी इतनी साफ थी कि बगल में बैठे मंत्री भी उसे महसूस कर सकते थे। मंत्रियों को यह बात मालूम है कि उनकी असल ताकत उनकी कुर्सी है। कुर्सी है, तो काफिला है, भीड़ है, सम्मान है, अफसर हैं और प्रभाव है। कुर्सी नहीं होगी तब वह अचानक आम कार्यकर्ताओं की क़तार में दिखाई देने लगेंगे। कई मंत्रियों के दिल में यही डर घर कर गया था। कुर्सी छिन लिए जाने का डर उन्हें गहरे अवसाद में डाल सकता था। खैर, सीएम हाउस की बैठक का असल मुद्दा मंत्रिमंडल फेरबदल को लेकर नहीं था। मुद्दा संगठन नेताओं की सरकार के मंत्रियों से पनपी नाराजगी थी। मामला संगठन और सरकार के बीच बढ़ती दूरी का था। संगठन की शिकायत थी कि उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं को मंत्री अपेक्षित महत्व नहीं दे रहे हैं। सत्ता और संगठन के बीच तालमेल की गाड़ी कुछ डगमगाने लगी थी। इस तालमेल को दोबारा पटरी पर लाने की कवायद के तौर पर यह बैठक बुलाई गई थी। संगठन ने इस बैठक के ज़रिए अपनी ताक़त दिखाने की कोशिश की है। यह बताया है कि सरकार हमसे है, हम सरकार से नहीं है। बैठक में मंत्रियों को कई तरह की नसीहतें दी गईं। प्रधानमंत्री के 12 वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रमों की समीक्षा, सुशासन तिहार की रिपोर्ट, प्रभार वाले जिलों के दौरे, कोर ग्रुप नेताओं से समन्वय, सांसदों से संवाद, कार्यकर्ताओं से नियमित मेल-मुलाकात, प्रशिक्षण शिविरों में सक्रिय भागीदारी और अफसरशाही पर नियंत्रण जैसे विषयों पर लंबी चर्चा हुई। चर्चा के आधिकारिक एजेंडे के अलावा भी कई मुद्दे कमरे में मौजूद रहे। पार्टी फंड से लेकर राजनीतिक समन्वय तक की बातें फुसफुसाहटों में घूमती रहीं। कुल जमा लब्बोलुआब यह है कि सत्ता के दो पहिए होते हैं, एक सरकार और दूसरा संगठन। पिछले कुछ समय से ऐसा लगने लगा था कि एक पहिया दूसरे से बड़ा होने की कोशिश कर रहा है। सीएम हाउस की यह बैठक उसी असंतुलन को ठीक करने का प्रयास थी।
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बकरे की बलि !
सीएम हाउस में उस रात बैठक जितनी महत्वपूर्ण थी, उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प उसका माहौल था। अचानक आए बुलावे ने कई मंत्रियों की भूख-प्यास पहले ही छीन ली थी। फोन आने के बाद से कुछ मंत्री मन ही मन पिछले ढाई साल का अपना बही-खाता खंगालने में जुट गए थे। भविष्य की अनिश्चितताओं से जुड़े ढेरों सवाल मंत्रियों के ज़ेहन में दौड़ रहे थे। सीएम हाउस में बैठक शुरू होने तक कई चेहरों पर तनाव साफ पढ़ा जा सकता था, लेकिन जैसे-जैसे यह स्पष्ट हुआ कि मामला मंत्रिमंडल फेरबदल का नहीं, बल्कि संगठन और सरकार के बीच समन्वय का है, वैसे-वैसे मंत्रियों के चेहरों पर रौनक लौटती दिखाई देने लगी। इसी बीच भोजन का न्यौता आया। खाने की मेज की ओर बढ़ते हुए एक वरिष्ठ मंत्री ने मुस्कुराकर कहा, लगता है बकरे को हलाल करने से पहले चारा दिया जा रहा है। यह सुनकर वहां मौजूद लोग ठहाका लगाकर हंस पड़े। खैर, उस रात न कोई बकरा हलाल हुआ, न किसी कुर्सी की बलि चढ़ी। मंत्री भोजन कर आधी रात के बाद अपने घर लौट गए। मगर जाते-जाते यह संदेश ज़रूर ले गए कि सत्ता की थाली कुर्सी की स्थिरता से नसीब होती है। जिस दिन कुर्सी डगमगाने लगेगी, समझो उस दिन लज़ीज़ दावत भी गले से नीचे नहीं उतरेगी।
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योगः आयोजने कौशलम्
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा था, ‘योगः कर्मसु कौशलम्’। अर्थात् कर्म में कुशलता ही योग है। बात सीधी थी। आदमी अपना कर्म ईमानदारी, दक्षता और संतुलन के साथ करे। न फल की चिंता करे, न मोह में फंसे, लेकिन गीता लिखे हुए पांच हजार साल से ज्यादा बीत चुके हैं। इस दौरान बहुत कुछ बदल गया है। राजनीति बदल गई है। प्राथमिकताएं बदल गई हैं। बदलते समय में योग का अर्थ भी थोड़ा विकसित हो गया है। अब योग केवल शरीर को मोड़ने या मन को साधने की विद्या बस नहीं है। अब यह आयोजन की कला भी है। इसलिए आधुनिक काल का संशोधित सूत्र कुछ यूं है, ‘योगः आयोजने कौशलम्’। अर्थात् आयोजन में कुशलता ही योग है। योग दिवस के अवसर पर यह सूत्र जीवंत होता दिखाई दिया। योग की खूबी यह है कि वह आदमी को भीतर ले जाता है, मगर आयोजन की खूबी यह है कि वह लोगों का ध्यान बाहर लगाए रखता है। योग आंखें बंद करवाता है, आयोजन आंखें चौंधिया देता है। योग कहता है कम में काम चल सकता है, आयोजन कहता है कि कम में बात नहीं बनेगी। यही कारण है कि योग दिवस पर चर्चा योग के आसनों और प्राणायामों की नहीं है। अबकी बार योग दिवस को लेकर चर्चा है, मंच की। टेंट की। कुर्सियों की और उन सबके पीछे खड़े बजट की। योग में शीर्षासन, वृक्षासन, चक्रासन जैसे कठिन आसन हैं, लेकिन सरकारी आयोजनों की दुनिया में सबसे कठिन आसन है, बजटासन। इस आसन में शरीर को संतुलित नहीं किया जाता है। यहां आकड़ें संतुलित किए जाते हैं। कहते हैं कि इस आसन में सिद्धि प्राप्त करना हर किसी के बस की बात नहीं। इसके लिए वर्षों की प्रशासनिक-राजनीतिक तपस्या की ज़रूरत पड़ती है। परिस्थितियों की अनुकंपा भी चाहिए होती है। फ़िलहाल योग दिवस के आयोजन को लेकर सबको पता है कि क्या हुआ, कैसे हुआ और किसके कहने पर हुआ, लेकिन सवाल उठने की स्थिति में पूरा तंत्र ध्यान मुद्रा में लीन है। मजे की बात यह है कि योग का मूल दर्शन वासनाओं से मुक्ति का है। मगर मौजूदा समय में वासनाओं से मुक्ति की बजाए उसके प्रबंधन को ही दक्षता मान लिया गया है। यही नई योग साधना है। खैर, आयोजन हो गया। योग भी हो गया। तस्वीरें भी छप गईं। भाषण भी हो गए, लेकिन चर्चा अब भी योग की नहीं है। योग दिवस पर हुए आयोजन की है। द्वापर से निकल कलयुग तक योग के सूत्र बदल दिए गए हैं। नए सूत्र का नया श्लोक यह है- योगः आयोजने कौशलम्, व्ययस्य विस्तारः सिद्धिः, प्रश्नानां मौनमेव उत्तरम्। संस्कृत के ये श्लोक इतने भी कठिन नहीं है कि इसे समझा न जा सके। अगर कुछ समझना है तो यह समझने में दिमाग़ लगाइए कि बिलासपुर से 220 किलोमीटर दूर गए टेंट वाले की आख़िर परेशानी क्या है? और 50 लाख रुपए का रहस्य क्या है?
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रिपोर्ट
किस्सा थोड़ा पुराना है, लेकिन इसकी गूंज अब तक सार्वजनिक गलियारों में सुनाई नहीं पड़ी है। इसलिए आज इस पर पड़े पर्दे को थोड़ा सरकाते हैं। बात कुछ यूं है कि सत्तारूढ़ दल के एक प्रभावशाली नेता ने अपनी ही सरकार के मंत्रियों और विधायकों का एक बेहद गोपनीय रिपोर्ट कार्ड तैयार कराया था। यह रिपोर्ट कार्ड मंत्रियों और विधायकों के राजनीतिक प्रदर्शन का मूल्यांकन नहीं करती थी, बल्कि यह बताती थी कि सत्ता के शुरूआती दो -ढाई साल में किसकी आर्थिक सेहत कितनी मज़बूत हुई और किसकी संपत्ति ने कितनी ऊंची छलांग लगाई ! बताया जाता है कि इस काम के लिए एक निजी एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपी गई थी। कहा जाता है कि यह एजेंसी ही प्रभावशाली नेता की अगुवाई में काम कर रही थी। एजेंसी के लोगों ने महीनों तक नेताओं की गतिविधियों, उनके कारोबारी रिश्तों, जमीन-जायदाद और बढ़ती आर्थिक ताकत को खंगाला था। बड़ी मेहनत से इस रिपोर्ट को अमली जामा पहनाया गया था। कुछ वक्त पहले सत्ता और संगठन के बीच रिश्तों में आई कुछ हल्की खटास के दौरान यह दस्तावेज़ चुनिंदा हाथों तक पहुंचा दिया गया। उस समय यह माना जा रहा था कि रिपोर्ट कभी भी राजनीतिक विस्फोट का कारण बन सकती है। कई लोगों को उम्मीद थी कि इसके कुछ पन्ने सार्वजनिक होंगे और सत्ता के भीतर छिपे कई राज सामने आएंगे, लेकिन राजनीति में हर सच का अपना समय होता है। जिन लोगों तक यह रिपोर्ट पहुंची, उन्होंने इसकी अहमियत को समझा और शायद इसके संभावित परिणामों को भी। नतीजा यह हुआ कि रिपोर्ट चर्चा का विषय बनने से पहले ही खामोशी के अंधेरे में कहीं दफन हो गई। फिलहाल रिपोर्ट कहां है ? किसके पास है और उसका भविष्य क्या है? यह कोई नहीं जानता। लेकिन राजनीति के जानकार कहते हैं कि ऐसी रिपोर्ट कभी मरती नहीं हैं।
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रेत की अर्थव्यवस्था
सत्ता की इमारत सिर्फ विचारधारा की ईंटों से ही नहीं बनती। ईटों के बीच रेत भी लगी होती है। सत्ता में रेत का अपना अर्थशास्त्र रहा है। इस अर्थशास्त्र की ही देन है कोरिया जिले के नौगई गांव की घटना, जहां सत्तारूढ़ दल के एक नेता समेत तीन लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई। मौत के घाट उतारने वाले भी सत्तारूढ़ दल के चेहरे थे। रेत पर कब्जे और कमाई की अंधी दौड़ ने राज्य को हिंसा के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। रेत की अर्थव्यवस्था का यही घिनौना और भयावह चेहरा है। नदियों पर लालच का सैलाब बह रहा है। सूबे में रेत एक ऐसी ताकत बन गई है, जिसके इर्द-गिर्द राजनीति और प्रशासन का पूरा तंत्र घूमता दिखता है। जिस रेत से शहर के शहर खड़े हो रहे हैं, उसी रेत से राजनीति और प्रशासनिक तंत्र हर दिन ढह रहा है। रेत के इस अवैध कारोबार की खासियत यह है कि यह सरकार की आंखों के सामने होता है, लेकिन दिखाई नहीं देता। दिन-रात चलने वाले ट्रक, नदी में उतरती मशीनें, घाटों पर लगी कतारें और सड़कों पर उड़ती धूल सबको दिखती है, बस व्यवस्था को छोड़कर। अगर प्रशासनिक व्यवस्था सचमुच रेत माफिया से हार रही है, तो यह चिंता की बात है, लेकिन अगर हार नहीं रही फिर भी रेत माफिया जीत रहा है, तो चिंता उससे भी बड़ी है। राजनीति में रेत के महत्व को इस तरह समझिए कि ज़्यादातर विधायक और मंत्रियों की आंखें इस सुनहरी धूल की चमक से चौंधिया गई है। रेत उनकी आर्थिक ताक़त का सबसे बड़ा जरिया बन गई है। रेत के कण छोटे जरूर हैं, लेकिन सूबे की राजनीति का वजन उन्हीं पर टिका है और यह बात भी भला किससे छिपी है कि इसकी आड़ में कलेक्टर-एसपी भी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं।
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अनोखी कांग्रेस
छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने हाल ही में सात मुख्य प्रवक्ताओं की नियुक्ति कर एक ऐसा प्रयोग किया है, जिसकी मिसाल पार्टी के इतिहास में शायद ही किसी अन्य राज्य में देखने को मिली हो। आमतौर पर कांग्रेस में एक मुख्य प्रवक्ता होता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह संख्या सीधे सात तक पहुंच गई है। राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर चर्चा भी है और चुटकियां भी। वैसे संगठनात्मक प्रयोगों के मामले में छत्तीसगढ़ कांग्रेस पहले भी अलग राह चुनती रही है। याद कीजिए वह दौर, जब शैलेष नितिन त्रिवेदी पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष रहते हुए मीडिया विभाग के चेयरमैन की जिम्मेदारी भी संभाल रहे थे। उसी समय वर्तमान मीडिया विभाग अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला को मुख्य प्रवक्ता की भूमिका दी गई थी। यानी परंपराओं से हटकर व्यवस्था बनाने का ट्रैक रिकॉर्ड कांग्रेस के पास पहले से मौजूद है। इस बार मुख्य प्रवक्ताओं की सूची तैयार हुई तो शुरुआत में पांच नाम तय किए गए- आर.पी. सिंह, धनंजय सिंह ठाकुर, अमित श्रीवास्तव, सुरेंद्र वर्मा और वंदना राजपूत। लेकिन सूची सामने आने के बाद सवाल भी उठे। नेता प्रतिपक्ष के करीबी माने जाने वाले घनश्याम राजू तिवारी का नाम इसमें नहीं था। वरिष्ठ प्रवक्ता सुरेंद्र शर्मा भी सूची से बाहर थे। बताया जाता है कि संगठन के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने इस पर आपत्ति जताई और हस्तक्षेप के बाद दोनों नाम जोड़ दिए गए। इस तरह पांच की सूची सात तक पहुंच गई। लेकिन असली चर्चा अब समाजिक प्रतिनिधित्व की है। कांग्रेस लंबे समय से सामाजिक संतुलन और सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति की पक्षधर होने का दावा करती रही है। ऐसे में मुख्य प्रवक्ताओं की अंतिम सूची पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। सात मुख्य प्रवक्ताओं में तीन ठाकुर, दो ब्राह्मण, एक ओबीसी और एक कायस्थ हैं। हैरानी की बात यह है कि सूची में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय से एक भी चेहरा शामिल नहीं है। यही वह बिंदु है, जिस पर पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चा शुरू हो गई है। खासकर उस राज्य में, जहां आदिवासी और अनुसूचित जाति वर्ग कांग्रेस की राजनीति के महत्वपूर्ण आधार माने जाते हैं। पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि सामाजिक प्रतिनिधित्व का संदेश देने वाली कांग्रेस की यह सूची उसके अपने राजनीतिक विमर्श से मेल नहीं खाती। कांग्रेस के भीतर यह नाराजगी अब बंद कमरों की चर्चा तक सीमित नहीं बताई जा रही। खबर है कि मामला दिल्ली तक पहुंच चुका है और पार्टी नेतृत्व ने भी इस पर असहजता जताई है। यदि ऐसा है तो आने वाले दिनों में संगठनात्मक ढांचे में कोई नया संतुलन साधने की कोशिश दिखाई दे, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
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