Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

अंधश्रद्धा

बाबा बड़े प्रतापी बताए जाते थे। मुट्ठी भर चावल के दाने हथेली पर रखकर आंखें मूंदते और सामने बैठे व्यक्ति का अतीत, वर्तमान और भविष्य ऐसे बांचते मानो समय की पूरी किताब उनके सामने खुली पड़ी हो। लोग स्तब्ध रह जाते। उन्हें लगता कि जहां विज्ञान की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं, वहां से बाबा की सिद्धि शुरू होती है। तर्क के जो सवाल खड़े होते, उन्हें आस्था की आंधी उड़ा ले जाती। चमत्कार के आगे विवेक नतमस्तक हो जाता। कुछ दिन पहले ही बाबा ने सूबे के मुख्यमंत्री के बदले जाने की भविष्यवाणी की थी, लेकिन विडंबना देखिए, जो बाबा दूसरों के भविष्य का लेखा-जोखा सुनाते थे, वे खुद अपने वर्तमान को ही नहीं पढ़ पाए। अपने जीवन का एक पन्ना भी उलट-पलट लिया होता तो शायद आज जेल में बैठकर जमानत के दिन न गिन रहे होते। दरअसल दुष्कर्म के मामले में बाबा की जेल यात्रा शुरू हो चुकी है। ग्रह-नक्षत्रों का हाल बताने वाले बाबा आज खुद कानून के शिकंजे में फंस गए हैं। बाबा के दरबार में सत्ता का वैभव भी मौजूद रहता था। बड़े-बड़े नेताओं, बड़े-बड़े अफसरों से लेकर बड़े-बड़े उद्योगपतियों तक की मौजूदगी उनके प्रभाव का प्रमाण मानी जाती थी। धीरे-धीरे यह भ्रम गहराता गया कि जिसके चरणों में इतने प्रभावशाली लोग झुक रहे हो उसके भीतर कोई अलौकिक शक्ति अवश्य होगी। लोगों की सबसे बड़ी भूल यही थी। उन्होंने प्रभाव को सत्य मान लिया और इसी कथित सत्य ने एक ढोंगी पंडित को लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया। गोस्वामी तुलसीदास की एक प्रसिद्ध पंक्ति है, ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं’। हमारे समय में यह पंक्ति मानो सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन गई है। प्रभावशाली लोगों के दोष दिखाई नहीं देते और दिखाई भी दें तो लोग आंखें फेर लेते हैं। उनके चारों ओर कथित श्रद्धा और आडंबर का कवच खड़ा कर दिया जाता है। कोई बाबा यूं ही प्रभावशाली नहीं बनता। उसे प्रभावशाली बनाती है लोगों की अंधश्रद्धा। लोगों की प्रश्न हीन भक्ति। चमत्कारों के प्रति लोगों का आकर्षण। जब तक तर्क की जगह चमत्कार को महत्व मिलता रहेगा, तब तक एक बाबा के गिरने पर दूसरा बाबा खड़ा होता रहेगा। पाखंड की आड़ में ढोंगी बाबा बेटियों की अस्मत लूटते रहेंगे। लोग श्रद्धा के नाम पर आंखें मूंदे बैठे रहेंगे। चावल के कुछ दाने विवेक के हजारों सवालों पर भारी पड़ते रहेंगे। दुष्कर्म करने वाले बाबा पर जिन लोगों की आस्था अब भी बरकरार है, वह जोर से बोले पंडित शास्त्री की…..

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प्लेसीबो इफेक्ट

वैसे बाबा उस दौर में सबसे ज्यादा सुर्खियों में आए जब प्रदेश में कोयला, शराब और महादेव सट्टा जैसे कथित घोटालों को लेकर जांच एजेंसियां लगातार छापेमारी कर रही थीं। सत्ता के गलियारों से लेकर नौकरशाही के ऊंचे पदों तक बेचैनी का माहौल था। ऐसे समय में कई नेताओं और अफसरों ने बाबा के दरबार में आस्था का सहारा तलाश लिया था। कहा जाता है कि वे मुट्ठी भर चावल लेकर बाबा के पास पहुंचते और बाबा उन्हीं चावल के दानों में उनके संकट का समाधान खोजने का दावा करते। बाबा के दरबार में हाजिरी बढ़ती चली गई। दिलचस्प पहलू यह रहा कि जब कई नेता और कई अफसर तत्काल संकट से बच निकले तब बाबा के प्रति उनकी श्रद्धा गहरी होती गई। धीरे-धीरे यह श्रद्धा इतनी मजबूत हो गई कि कईयों को लगने लगा मानो बाबा के पास कोई अलौकिक शक्ति है, जो आने वाले संकट को टाल देती है। सच भी यही है कि संकट की घड़ी में अक्सर इंसान किसी ऐसे सहारे की तलाश करता है, जो उसे मानसिक मजबूती दे सके। अफसरों के लिए बाबा वही सहारा बन गए थे। मनोविज्ञान में इस प्रकृति को प्लेसीबो इफेक्ट कहते हैं। प्लेसीबो इफेक्ट वह स्थिति है, जहां वास्तविक समाधान से अधिक, समाधान का विश्वास व्यक्ति को राहत देता है। यानी ऐसे मामलों में दवा राहत नहीं देती, बल्कि दवा पर किया गया भरोसा राहत देता है। मगर समय का अपना न्याय होता है। वह न आस्था देखती है, ना प्रभाव, ना प्रतिष्ठा। आज बाबा खुद दुष्कर्म के गंभीर आरोप में जेल की सलाखों के पीछे हैं। जिस बाबा के दरबार में बड़े-बड़े नेता, बड़े-बड़े अफसर, बड़े-बड़े उद्योगपतियों की गाड़ियों की लंबी कतारें खड़ी दिखाई पड़ती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। हर किसी ने चुप्पी ओढ़ ली है। कुछ लोग हैं, जो अब भी पर्दे के पीछे रहकर बाबा का एहसान चुकाने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन वह भी क्या कर सकते हैं? कानून की धाऱाएं आस्था से प्रभावित नहीं होती। शायद बाबा को भी यह बात समझ आ गई होगी। 

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सुशासन?

सरकारी व्यवस्था कैसे काम करती है, इसे एक उदाहरण से समझिए। एक विभाग ने किसी काम के लिए टेंडर जारी किया। ठेका एक फर्म को मिल गया। जमीन पर एक ढेला तक नहीं हिला, लेकिन सरकारी खजाने से पूरी राशि निकल गई। पैसा फर्म तक पहुंचा या किसी और जेब में यह अलग सवाल है। कुछ महीनों बाद मामला उजागर हुआ तो संबंधित अधिकारी की भूमिका भी सामने आ गई। विभाग ने नोटिस जारी किया। पैसे वापस मांगे गए और अधिकारी ने रकम सरकारी खाते में जमा कर दी।इसके बाद विभागीय जांच बैठी। जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला कि चूंकि सरकारी खाते में राशि वापस आ गई है, इसलिए कोई आर्थिक क्षति नहीं हुई। जब आर्थिक क्षति नहीं हुई तो ऐसे में भला दोषी कौन? अधिकारी बच निकला।  मुद्दा यही है। इस घटना ने प्रशासनिक नैतिकता और जवाबदेही की पूरी अवधारणा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। लोक प्रशासन का एक प्रसिद्ध सिद्धांत कहता है, ‘Accountability is the soul of governance’ मतलब जवाबदेही ही सुशासन की आत्मा है, लेकिन लगता है कि सूबे की प्रशासनिक बिरादरी ने नया सिद्धांत रच दिया है। खैर, दुनिया भर में सुशासन के लिए जिस नोलन सिद्धांत को प्रशासन की आधारशिला मानी गई है, वह सात मूल्यों पर आधारित है- निःस्वार्थता, सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, जवाबदेही, पारदर्शिता, ईमानदारी और नेतृत्व। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था भी इन्हीं मूल्यों को आदर्श मानती है। ऐसे में सवाल यह है कि यदि किसी टेंडर में अनियमितता हुई, बिना काम के भुगतान हुआ, नियमों का उल्लंघन हुआ और बाद में मामला उजागर होने पर पैसा वापस कर दिया गया, तो क्या केवल पैसे की वापसी से जवाबदेही का प्रश्न समाप्त हो जाता है? अगर ऐसा है, तो फिर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक कदाचार के बीच की रेखा ही मिट जाएगी। हैरत की बात यह है कि यह सब उस राज्य में हो रहा है जहां सुशासन के नाम पर एक अलग विभाग मौजूद है। ऐसे में यह पूछना स्वाभाविक है कि किसी आर्थिक गड़बड़ी के उजागर होने के बाद केवल इसलिए जिम्मेदार व्यक्ति को बख्श देना कि उसने रकम लौटा दी है, आखिर यह किस परिभाषा के तहत सुशासन कहलाएगा? क्योंकि सुशासन की कसौटी यह नहीं है कि पैसा वापस आया या नहीं, बल्कि यह है कि गलती हुई क्यों? जिम्मेदार कौन था और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई।

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एमडी साहब 

राज्य में लघु वनोपज के प्रबंधन और वनवासियों की आजीविका से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण महकमों में से एक इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। हाल ही में आयोजित एक समीक्षा बैठक में फेडरेशन (संघ) के प्रबंध संचालक (एमडी) मंत्री की मौजूदगी में सवालों के घेरे में आ गए। बैठक के दौरान राजनीतिक नियुक्ति पर पदस्थ उपाध्यक्ष ने अपने जमीनी अनुभव और विषय की गहरी समझ के आधार पर कुछ ऐसे सवाल उठा दिए, जिनका संतोषजनक जवाब एमडी साहब नहीं दे सके। नतीजा यह हुआ कि बैठक का एजेंडा पीछे छूट गया और चर्चा का केंद्र फेडरेशन (संघ) का कामकाज बन गया। दरअसल यह महकमा राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम माना जाता है। लघु वनोपज से जुड़े कार्यक्रमों का असर राज्य की लगभग 79 विधानसभा सीटों तक महसूस किया जाता है। हर विधानसभा में औसतन 50 हजार परिवार सीधे इस व्यवस्था का हिस्सा है। पूरे राज्य में करीब 14 लाख लोगों की आजीविका इस व्यवस्था से जुड़ी है। ऐसे में इस महकमे का कामकाज राजनीतिक नब्ज को भी टटोलता है। खैर, चर्चा इस बात की ज्यादा है कि संघ की गाड़ी आखिर किस रफ्तार से चल रही है और चालक की निगाह सड़क पर है भी या नहीं। कहा जा रहा है कि सेवानिवृत्ति की चौखट पर खड़े एमडी साहब मौजूद तो हैं, मगर ज्यादा सक्रिय नहीं दिखते। उनकी सक्रियता कहीं और नजर आती है। दिलचस्प बात यह भी है कि फेडरेशन कोई साधारण सरकारी विभाग भी नहीं है। यह एक पंजीकृत सहकारी संस्था है, जिसका अपना स्वतंत्र कानूनी अस्तित्व है। सरकार इसे मनमर्जी से नहीं चला सकती। संस्था के संचालन के लिए बोर्ड को व्यापक अधिकार हासिल है। फिलहाल हालात कुछ ऐसे बताए जाते हैं कि बोर्ड और निर्णय सबका केंद्र एक ही व्यक्ति हैं। इसलिए फेडरेशन (संघ) में जो कुछ भी हो रहा है, वह सही ही माना जाएगा। कोई तल्खी काम न आएगी। 

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कुर्सी की पेटी बांध लीजिए

राजनीति में हवा का रुख बदलने से पहले ही हलचल शुरू हो जाती है। भाजपा में हलचल तेज होती दिख रही है। अभी अधिक मास चल रहा है। यह 16 जून को समाप्त हो रहा है। माना जाता है कि इस अवधि में नए एवं महत्वपूर्ण निर्णयों से परहेज किया जाता है। भाजपा भी परंपराओं और शुभ मुहूर्तों को महत्व देने वाली पार्टी रही है। ऐसे में कई बड़े राजनीतिक फैसले इस वजह से ही रुके हुए बताए जा रहे थे। सियासी गलियारों में चर्चा है कि 16 जून के बाद भाजपा के केंद्रीय संगठन में महत्वपूर्ण बदलावों का दौर शुरू हो सकता है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम का गठन होना है और कयास लगाए जा रहे हैं कि उनकी टीम में छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं को भी जगह मिल सकती है। राज्य को नया प्रभारी मिलने की भी चर्चा है। केंद्रीय संगठन के बाद निगाहें केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार पर टिकेगी और फिर बारी आएगी छत्तीसगढ़ की राजनीति में अहम बदलाव की। इस बदलाव की आहट के साथ ही सत्ता गलियारों में बेचैनी बढ़ने लगी है। संभावित मंत्रिमंडल फेरबदल की अटकलों ने कई नेताओं की दिनचर्या बदल दी है। कोई दिल्ली के चक्कर लगा रहा है, तो कोई अपने पुराने राजनीतिक रिश्तों को फिर से चमकाने में जुटा है। कुछ नेता सामाजिक समीकरण साध रहे हैं, तो कुछ संगठन में अपनी उपयोगिता साबित करने की कोशिश में हैं। हर किसी को लग रहा है कि अगर बदलाव की बयार चली, तो शायद इस बार उसकी नाव भी किनारे लग जाए। वैसे भी राजनीति में उम्मीद कभी बूढ़ी नहीं होती। जिन नेताओं के पास आज कोई जिम्मेदारी नहीं है, वे भी संभावनाओं के गणित में खुद को फिट पा रहे हैं। वहीं जिनके पास सत्ता का सुख है, वे अपनी कुर्सी बचाने के लिए समीकरणों का नया गणित गढ़ रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है कि संभावित फेरबदल में कम से कम पांच चेहरों की विदाई हो सकती है। हालांकि राजनीति में चर्चाएं अक्सर उड़ती हैं, लेकिन कई बार यही चर्चाएं भविष्य की खबर भी बन जाती हैं। फिलहाल स्थिति यह है कि सत्ता के गलियारों में हर कोई सतर्क है। अब निगाहें दिल्ली पर टिकी हैं, क्योंकि वहीं से आने वाला एक संकेत किसी के राजनीतिक सपनों को नई उड़ान दे सकता है, तो किसी की महत्वाकांक्षाओं को अचानक जमीन पर भी ला सकता है। सियासत के इस मौसम में फिलहाल एक ही संदेश सबसे ज्यादा प्रासंगिक लगता है- ‘कुर्सी की पेटी बांध लीजिए, आगे राजनीतिक उथल-पुथल शुरू होने वाला है’।

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तबादला

सुशासन तिहार खत्म होने के बाद एक चर्चा जोर की उठी है कि जल्द ही कई जिलों के कलेक्टर-एसपी बदल दिए जाएंगे। पिछली सूची जब जारी हुई थी, तब कुछ को राहत दे दी गई थी। नई सूची में उनका नंबर लग सकता है। करीब आधा दर्जन जिले प्रभावित होंगे। कुछ कलेक्टर-एसपी ऐसे भी हैं, जो सरकार की निगाह में चढ़ गए हैं, लिहाजा उन्हें बदलने के लिए कलम चल गई है। कई ऐसे हैं, जिनके जिले की अदला-बदली होगी। संकेत तो यही है कि जल्द ही तबादला आदेश जारी होगा। 

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