Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

सरकारी मोक्ष

लंबी खामोशी के बाद मंत्री जी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। चर्चा कथा में दान और शादी में योगदान की है। मंत्री जी धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। पूजा-पाठ में उनकी गहरी रुचि है। हाल ही में उन्होंने अपने इलाके में कथा का एक भव्य आयोजन कराया। भजन-कीर्तन, आरती और प्रवचन से पूरा इलाका भक्ति मय माहौल में डूबा रहा, लेकिन कथा खत्म होने के बाद लोगों के बीच ‘भगवान’ से ज्यादा ‘भुगतान’ की चर्चा सुनाई देने लगी। धीरे-धीरे कानाफूसी शुरू हुई। पता चला कि मंत्री जी जिस विभाग से आते हैं, उस विभाग की हर जिले की इकाई को 11-11 लाख रुपए का चढ़ावा कथा में चढ़ाने का फरमान जारी किया गया था। जाहिर है, इतनी बड़ी रकम सिर्फ सरकारी अफसरों की जेब से नहीं निकली होगी। दबाव अफसरों से कारोबारियों तक पहुंचा होगा और फिर कथा के नाम पर चढ़ावा इकट्ठा किया गया होगा। मंत्री जी के विभाग में एक निर्माण इकाई भी है। सुना है कि इस इकाई में काम करने वाले इंजीनियरों से कहा गया था कि अगर भगवान के नाम पर 5-5 लाख रुपए दान नहीं करोगे, तो तुम लोगों पर पाप चढ़ जाएगा। इंजीनियरों ने पाप से बचने के लिए ठेकेदारों पर बोझ डाल दिया। कथा खत्म हुई तब मंत्री जी के एक मातहत अफसर ने यह सब ब्यौरा दिया और कहा कि ‘सरकारी मोक्ष’ पाना भी अब बहुत महंगा सौदा हो गया है।खैर, कथा के पहले माननीय मंत्री जी के परिवार में शादी का भव्य समारोह हुआ था। कथा में धर्म था और शादी में वैभव। शादी ऐसी हुई मानो पूरा प्रदेश रिश्तेदार हो और अफसर-कारोबारी घराती। मंत्री के घर की शादी में अफसर और कारोबारियों को शगुन देते वक्त लिफाफे का बोझ ही भारी नहीं लग रहा था, उनका मन भी बहुत भारी था। मगर क्या करते। बे मन से मन को मनाया था। कथा में दान हो या शादी में शगुन रूपी योगदान वास्तव में थी तो यह रिश्वत ही। रिश्वत सत्ता की नींव से निकाला गया एक पत्थर है। पत्थर निकलने की रफ्तार अगर यूं ही बनी रहेगी, तो सत्ता का किला भरभराकर एक दिन ढह जाएगा। सुशासन सरकार को समय रहते कमजोर होती नींव की मरम्मत कर लेनी चाहिए। 

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धुनाई

राजनीति बड़ी अजीब चीज है। यह विरोधियों से कम और अपनों से ज़्यादा रिश्ते बिगाड़ती है। हाल ही में एक विभाग में सैकड़ों लोगों का तबादला हुआ। तबादले के पहले सत्ता पक्ष के एक युवा तुर्क नेता अपने एक करीबी का मनपसंद तबादला कराने की जुगत में थे। तभी खबर लगी कि मंत्री जी का पीए तबादला शुल्क वसूल रहा है। युवा नेता ने अपने परिचित का नाम आगे बढ़ाया। सत्ता पक्ष का नेता होने के बावजूद सिस्टम ने उसे अपना नहीं माना। पीए ने उसे तबादला शुल्क की सूची सौंप दी। युवा नेता ने हाथ मिलाया और शुल्क की रकम तय हुई। इसके बाद पीए घुमाता रहा और युवा नेता घूमता रहा, फिर हर मुलाकात में रकम बढ़ती चली गई। युवा नेता ने पहले संयम रखा, फिर समझाया और फिर एक दिन फट पड़ा। गुस्से में आकर उसने मंत्री के पीए की जमकर धुनाई कर दी। घटना बाहर चर्चा में नहीं आ पाई। एक दिन यह बात घूमते-घूमते भाजपा नेताओं की एक बैठक तक पहुंची। बैठक में एक पूर्व मंत्री भड़क उठे। उन्होंने मंत्री जी की तरफ देखते हुए कहा, यह सुशासन की सरकार है मंत्री जी। अपना विभाग ठीक से संभाल लीजिए। हमारे सामने आपका पूरा कच्चा चिट्ठा है। दूसरों को सुशासन का पाठ पढ़ाने से पहले अपने पीए का चरित्र प्रमाण पत्र तो देख लीजिए। इतना सुनते ही मंत्री जी का चेहरा उतर गया। पीए की पिटाई से पहले ही दुख में डूबे मंत्री जी यह सुनकर ठंडे पड़ गए। बैठक खत्म हो गई थी, लेकिन मंत्री जी के चेहरे पर उतर आया सन्नाटा बहुत कुछ बोल रहा था। उन्हें यह बात समझनी चाहिए कि राजनीति में कई बार विरोधी उतना नुकसान नहीं करते, जितना पीए कर जाते हैं।

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स्पेशल विजिट

बस्तर में इन दिनों सेल्फ हेल्प ग्रुप की महिलाओं की ट्रेनिंग से ज्यादा चर्चा उस ग्लैमरस एंट्री की हो रही है, जिसने पूरे महकमे को हैरान कर दिया है। आमतौर पर ऐसे कार्यक्रमों में कृषि, वनोपज या आजीविका से जुड़े एक्सपर्ट नजर आते हैं, लेकिन इस बार मंच पर मॉडल की मौजूदगी ने अफसरों से लेकर कर्मचारियों तक सबको सोचने पर मजबूर कर दिया है। गलियारे में एक ही सवाल घूम रहा है कि आखिर इस ट्रेनिंग में मॉडल क्या सिखाएंगी? जंगल से निकलने वाले उत्पादों के प्रमोशन के लिए उन्हें ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया है। बात ठीक भी है, आज के दौर में पैकेजिंग और प्रचार जरूरी है, लेकिन महकमे के भीतर कुछ लोग तंज कसते हुए कह रहे हैं कि वनोपज का रिश्ता जंगल की मिट्टी से होता है, रैंप की रोशनी से नहीं होता। जिन महिलाओं ने सालों जंगलों में मेहनत कर महुआ, तेंदूपत्ता और दूसरी वनोपज को पहचान दिलाई, क्या उन्हें अब ग्लैमर गाइडेंस की जरूरत पड़ गई है? चर्चा यह भी है कि इस पूरी कवायद के पीछे एक बड़े साहब की खास दिलचस्पी है। साहब खुद मॉडल की अगुवाई करते हुए बस्तर पहुंचे हैं। अफसरों के बीच यह जिज्ञासा बनी हुई है कि आखिर इस स्पेशल विजिट की असली वजह क्या है? अंदरखाने यह चर्चा भी खूब है कि मॉडल के दौरे और दूसरी सभी व्यवस्थाओं का खर्च ट्रेनिंग दे रहे एनजीओ पर डालने की कोशिश की गई, लेकिन एनजीओ ने साफ कह दिया कि हमारा एमओयू नॉन-फाइनेंशियल है। हम सेवा दे सकते हैं, सेलिब्रिटी मैनेजमेंट नहीं कर सकते। बहरहाल मॉडल फिलहाल बस्तर में है। ट्रेनिंग में उनका योगदान कितना रहेगा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इतना जरूर है कि अगर बस्तर पर्यटन विभाग को प्रचार की जरूरत हो, तो इस दौरे का इस्तेमाल किया जा सकता है। महकमे के लोग भी मजाक में कह रहे हैं, जब मॉडल आ ही गई हैं, तो कम से कम बस्तर के झरनों, जंगलों और वॉटर फॉल्स के दो-चार रील ही बनवा लेनी चाहिए। प्रचार के साथ-साथ दौरे का औचित्य भी पूरा हो जाएगा। 

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चर्चा में ‘घर’

सूबे के एक बड़े नेता जी के रिश्तेदार का बनाया घर खूब चर्चा में है। रिश्तेदार ने शहर के सबसे महंगे इलाके में 30 हज़ार वर्गफीट पर आलीशान घर बनाया है। कुल ज़मीन 3 एकड़ तक फैली हुई है। नेता जी की जब तूती बोलती थी, तब उनके रिश्तेदार ने इस ज़मीन का सौदा किया था। ज़मीन विवादित थी। रिश्तेदार ने रसूख का इस्तेमाल कर विवाद खत्म कराया था। सुना है कि बदले में उन्हें यही 3 एकड़ ज़मीन मिल गई थी। स्वीमिंग पूल, जिम, लग्ज़री इंटीरियर और आधुनिक सुविधाओं से लैस इस घर को देखने वाले दंग हो रहे हैं। गृह प्रवेश में पहुंचे चुनिंदा मेहमानों की आंखें भी इसकी चमक-दमक देखकर चौंधिया गईं। सियासी गलियारों में कानाफूसी यह भी है कि बड़े नेता जी के जिस रिश्तेदार ने यह सपनों का घर खड़ा किया है, उसकी पुश्तैनी हैसियत इतनी मजबूत कभी नहीं रही कि वह इतनी बड़ी संपत्ति खड़ी कर सके। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर इस चमकदार इमारत की नींव में कौन-सी कहानी दबी है?

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टकराव

कांग्रेस में इन दिनों लड़ाई सिर्फ विचारों की नहीं रह गई है, पीढ़ियों की भी दिखने लगी है। एक तरफ प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज हैं, जिन्होंने टीएस सिंहदेव यानी बाबा को नसीहत दे डाली कि अब उन्हें दिल्ली की राजनीति पर ध्यान देना चाहिए। जवाब में बाबा ने भी बिना लाग-लपेट साफ कह दिया कि मेरे भीतर का युवा अभी ज़िंदा है और ऊर्जा भी कम नहीं हुई है। उनका बयान छोटा है, लेकिन उसके राजनीतिक मायने बड़े हैं। दीपक और बाबा के बीच उम्र का फासला एक पीढ़ी का है और शायद यही दूरी अब राजनीति में भी दिखाई देने लगी है। वैसे भी कांग्रेस में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा हो, ऐसा दावा अब पार्टी के लोग भी नहीं कर पा रहे हैं। संगठन खेमों में बंटा नजर आता है। हर खेमा अपने किले को मजबूत करने में जुटा है। कोई संगठन पर पकड़ बढ़ा रहा है, तो कोई विधायकों और नेताओं की गोलबंदी में लगा है। इन सबके बीच पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपनी राजनीतिक ज़मीन मजबूत करते दिख रहे हैं। बिना शोर-शराबे के वे दूसरे खेमों के नेताओं और विधायकों को अपने करीब ला रहे हैं। दिलचस्प यह है कि जिस दीपक बैज से कभी उनका सीधा टकराव माना जाता था, वही अब उनके साथ कदमताल करते दिखाई दे रहे हैं। दूसरी तरफ महंत और बाबा की जुगलबंदी अलग सियासी संदेश दे रही है। कुल मिलाकर प्रदेश कांग्रेस एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। भीतर खींचतान जारी है। नेताओं के चेहरे अलग-अलग दिशाओं में देख रहे हैं और हर नेता अपने असर का दायरा बढ़ाने में लगा है। मगर सवाल वही पुराना है कि कांग्रेस लड़ किससे रही है? कांग्रेस के बारे में पुरानी कहावत यूं ही नहीं कही जाती, ‘कांग्रेस को कोई और नहीं हराता, कांग्रेस अक्सर खुद को हराती है’।

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