Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

चक्रवृद्धि ब्याज

अर्थशास्त्र को बखूबी समझने वाले रूलिंग पार्टी के एक सीनियर नेता हाल ही में टकरा गए। उन्होंने बताया कि चक्रवृद्धि ब्याज का सामान्य सूत्र है :  A=P(1+NR)NT, जहां A का मतलब कुल राशि (Amount), P का मतलब मूलधन (Principal), R का मतलब ब्याज दर (Interest rate), N का मतलब एक साल में ब्याज जुड़ने की संख्या और T का मतलब कुल समय है। उन्होंने इसी सूत्र के सहारे मंत्री-विधायकों की बढ़ती आय का पूरा गणित समझा दिया। उन्होंने बताया कि P यानी मूलधन दरअसल एंट्री फीस है। R यानी ब्याज दर उनके संपर्कों की ताकत और पद की ऊंचाई है। N साल भर में मिलने वाले मौके हैं। मसलन हर फाइल, हर टेंडर पर होने वाली डील और T उनका कार्यकाल है। इस तरह राजनीति में कमाई का यह चक्रवृद्धि सूत्र बन जाता है। चुनाव जीतने के बाद शुरू हुई कमाई शुरुआत में मामूली लगती है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है और मौके बढ़ते हैं, वही कमाई चक्रवृद्धि ब्याज की तरह तेजी से फलने फूलने लगती है। कुछ साल बाद नतीजे इतने साफ दिखते हैं कि किसी गणित की जरूरत ही नहीं पड़ती। रहन-सहन ही पूरा हिसाब-किताब बता देता है। अर्थशास्त्र के जानकार नेताजी यहीं नहीं रुके। उन्होंने इसी सूत्र में थोड़ा संशोधन करके लोकप्रियता का भी हिसाब लगा दिया। नया सूत्र था: V=P(1−NG)NT, जहां V मतलब वोट, P मतलब शुरुआती जनसमर्थन और G मतलब कमीशनखोरी की दर है। मतलब साफ है, हर घपले-घोटाले और कमीशनखोरी के साथ वोटरों का भरोसा थोड़ा-थोड़ा घटता है। शुरुआत में यह गिरावट महसूस नहीं होती, लेकिन समय के साथ यह भी चक्रवृद्धि असर दिखाती है। धीरे-धीरे भरोसा सिमटता जाता है और नाराजगी बढ़ती जाती है। यानी एक तरफ कमाई चक्रवृद्धि ब्याज की तरह ऊपर जाती है, तो दूसरी तरफ लोकप्रियता उसी सिद्धांत पर नीचे आती जाती है। चुनाव आते-आते अक्सर यह गणित साफ हो जाता है कि खाते में पैसा कितना बढ़ा और वोट कितना घटा। सूबे में रूलिंग पार्टी के अधिकांश विधायक बेलगाम हैं। उन पर लगाम लगाने वाला कोई नहीं दिखता। ना सत्ता और ना ही संगठन। मानो खुली ढील दे दी गई हो। सरकार को ढाई साल होने को है। सत्ता और संगठन विधायकों के रिपोर्ट कार्ड पर ही अगर एक नजर फेर लें, तो जमीनी हकीकत से रूबरू होते वक्त नही लगेगा। अगर इतना भी वक्त नहीं है, तो लल्लूराम.काम के राजनीतिक संपादक वैभव शिव पांडेय के शो ‘विधायक का रिपोर्ट कार्ड’ देख लें। सच्चाई करीब से दिख जाएगी। 

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हाल-ए- विधायक

‘पॉवर सेंटर’ में हमने पहले भी लिखा था कि सत्ताधारी दल के अधिकांश विधायक “ओटीपी विधायक” हैं। यानी वन टाइम पासवर्ड की तरह। एक बार उन्हें टिकट मिल गई और पार्टी की ताकत से चुनाव भी जीत गए, मगर अगले चुनाव में उनकी वापसी तय नहीं मानी जा सकती। इनमें से कई ऐसे हैं, जिन्होंने ना तो कभी पार्टी का झंडा उठाया है और ना ही जमीनी स्तर पर संगठन के लिए काम किया है। पार्टी के कार्यक्रमों में दरी तक नहीं बिछाई है। परिस्थितियां उनके अनुकूल रही। पार्टी से जुड़ गए। टिकट मिला और सिर पर जीत का सेहरा सज गया। मगर राजनीति में हर बार किस्मत मेहरबान रहे, यह जरूरी नहीं। अब इन्हीं विधायकों के अलग-अलग किस्से सामने आने लगे हैं। पिछले दिनों रायपुर संभाग के एक विधायक काफी चर्चा में रहे। जानकारी मिली कि उनके क्षेत्र की एक सड़क का टेंडर साल भर पहले हो चुका था, लेकिन साल भर बीतने के बाद भी गड्ढे भर नहीं पा रहे थे। स्थानीय लोग हैरान थे कि टेंडर के बावजूद आखिर सड़क क्यों नहीं बन रही है? जब थोड़ी गहराई से पड़ताल हुई तब जाकर मामला खुला। विधायक खुद ठेकेदार के काम में बाधा डाल रहे थे। बात 10 प्रतिशत कमीशन पर अटक गई थी। ठेकेदार ने पहले ही कम दर पर टेंडर लिया था और पूर्व प्रचलित सभी तरह की मान्य परंपराओं का पालन भी किया था, लेकिन विधायक इससे संतुष्ट नहीं थे और अतिरिक्त हिस्सेदारी पर अड़ गए थे। आखिरकार ठेकेदार ने वरिष्ठ नेताओं से गुहार लगाई, तब कहीं जाकर समझौता हुआ और अधूरी सड़क पर डामर बिछ पाया। एक अन्य विधायक की स्थिति तो और भी चिंताजनक बताई जा रही है। चर्चा है कि उन्होंने भू-माफियाओं से गठजोड़ कर लिया है। जमीन से जुड़े विभाग के अधिकारी भी दबाव में उनकी गतिविधियों में अनिच्छा के बावजूद सहयोग करने को मजबूर हैं। तबादले की धमकी उनके लिए हथियार बन चुकी है। ऐसी चर्चाओं के बीच सरकार को समय रहते संज्ञान लेने की जरूरत है। जमीन पर भरोसा और साख बनी रहेगी, तभी सियासत का परचम बुलंद रहेगा। यदि विधायकों की नाजायज गतिविधियों को नजरअंदाज किया गया, तो हालात ऐसे बिगड़ेंगे कि संभालना मुश्किल हो जाएगा।

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जिम, लड़की और अफसर

राजधानी के एक जिम में हाईप्रोफाइल लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। इस जिम में हाईप्रोफाइल लोगों की मुस्कान के पीछे अक्सर लो प्रोफाइल समझौते होते रहते हैं। खैर, जब एक ही जगह पर तमाम हाई प्रोफाइल लोग एक साथ जुटते हो, तब वहां किस्सों के बादल छा ही जाते हैं। उमड़ते-घुमड़ते बादलों से कहानियां बरसने लगती है। इस दफे जिम से एक नई कहानी निकली है। हुआ कुछ यूं कि वहां आने वाली एक लड़की और एक कारोबारी एक-दूसरे के करीब आ ही रहे थे कि उनके बीच एक जांच एजेंसी के अफसर कबाब में हड्डी बनकर आ खडे़ हुए। अफसर जिस जांच एजेंसी से आते हैं, उस एजेंसी ने पूर्ववर्ती सरकार के चर्चित घोटालों में लिप्त कई कारोबारियों, अफसरों और नेताओं को जेल की हवा खिलाई है। सो अफसर पूरे फार्म में थे। अफसर को जब कारोबारी के मिजाज की भनक लगी, तब उन्होंने कारोबारी को जेल भेजे गए चेहरों की सूची पढ़कर सुना दी। पहले पहल कारोबारी कुछ समझ ना सके। कारोबारी को माजरा तब समझ आया, जब जांच एजेंसी के अफसर ने यह जताने में थोड़ी भी देरी नहीं कि अगर उनकी भावनाओं का वजन हल्का नहीं हुआ, तो इतिहास में दर्ज नामों में एक नाम उनका भी जोड़ दिया जाएगा। कारोबारी के इश्क की कहानी का पहला पन्ना लिखना अभी शुरू ही हुआ था कि जांच एजेंसी के अफसर की नसीहत भर से कलम की स्याही खुद ब खुद सूख गई। कहानी का पहला पन्ना भी अधूरा ही रह गया। कारोबारी ने अपनी भावनाओं को सीने में दफ्न कर लिया। जिम में आने वाली लड़की भी होशियार निकली। उसने ‘पैसे’ से ज्यादा ‘प्रभाव’ को महत्व दिया। सुना है कि अफसर और लड़की इन दिनों उत्तर भारत के एक हिल स्टेशन में छुट्टी मना रहे हैं। इधर कारोबारी यदा-कदा जिम में पसीना बहाते दिख जाते हैं। जिम में जुटने वाले हाईप्रोफाइल तबके के लोग अब सांत्वना के गुलदस्ते देकर उनके मुरझाए चेहरे में थोड़ी मुस्कुराहट लाने की कोशिश कर रहे हैं। भावनात्मक गुलदस्ता देने वाले एक सज्जन ने जब यह पूरा माजरा बताया तो उनके चेहरे पर सुख और दुख दोनों भाव एक साथ उमड़ रहे थे। कारोबारी उनका दोस्त था। 

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FA9LA

एक पूर्व नौकरशाह अपने दिलफेंक अंदाज और जिंदादिली के लिए मशहूर हैं। 70 बसंत पार कर चुके इस व्यक्तित्व में आज भी वही ऊर्जा बरकरार है, जो उनकी जवानी के दिनों में थी। नई पीढ़ी के युवा भी जिम में कसरत करने के उनके अंदाज भर से रोमांचित हो उठते हैं। जिम में उनकी खूब पूछपरख है। एक दिन जिम में उनके डांस ने उन्हें खूब चर्चा में ला दिया। वह फिल्म धुरंधर के किरदार रहमान डकैत से खासे प्रभावित दिखे। फिल्म के बेहद चर्चित गाने FA9LA पर वह ऐसे थिरके कि अगर रहमान डकैत का किरदार निभाने वाले अक्षय खन्ना वहां मौजूद होते तो उन्हें भी अपने परफार्मेंस पर शर्म आ जाती। पूर्व नौकरशाह ने क्या खूब डांस किया था ! कई और अफसर भी इस जिम में कसरत करते देखे जा सकते हैं। जाहिर है, पूरी जिंदगी का हासिल किया हुआ पूर्व नौकरशाह का कुल जमा तर्जुबा नसीहत की शक्ल में अब उन अफसरों के हिस्से जा रहा होगा। जिम की कसरत ने पूर्व नौकरशाह के चेहरे से उम्र के निशान हल्के कर दिए हैं, मगर ब्यूरोक्रेसी का सालों का अनुभव आज भी उनके माथे पर उभरने वाली सलवटों से साफ झलकता नजर आता है। खैर, यह भी अजीब इत्तेफाक है कि जिस घोटाले की चार्जशीट में उन्हें किंगपिन बताया गया है, उस घोटाले की जांच कर रही एजेंसी के एक बड़े अफसर भी उस जिम में ही अपनी सेहत दुरुस्त करने के इरादे से खूब पसीना बहाते दिखाई देते हैं। यह आम सवाल रहा है कि पूर्व नौकरशाह के पास वह कौन सा तिलिस्म है कि घोटाले के किंगपिन ठहराए जाने के बाद भी जांच की आंच उन तक पहुंचते-पहुंचते बार-बार धीमी पड़ जाती है। 

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बादाम

बादाम में कई पोषक तत्व होते हैं, जो दिमाग को सपोर्ट करते हैं। थोड़ा गूगल करने पर पता चलता है कि इनमें सबसे अहम है विटामिन E, जो एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है और दिमाग की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में मदद करता है। इसके अलावा बादाम में मौजूद हेल्दी फैट्स दिमाग की कोशिकाओं की संरचना और उनके बीच सिग्नल ट्रांसमिशन को बेहतर बनाए रखता है। साथ ही इसमें मैग्नीशियम और कुछ मात्रा में प्रोटीन व अमीनो एसिड्स भी पाए जाते हैं, जो नर्व सिस्टम की कार्यक्षमता और न्यूरोट्रांसमीटर के संतुलन में भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि बादाम को लंबे समय से ब्रेन-फ्रेंडली फूड माना जाता है। सीधी बात यह है कि सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें एक युवक हाउसिंग बोर्ड की एक महिला अधिकारी के टेबल पर आधा किलो बादाम पटकते हुए नजर आता है। युवक कह रहा है कि शायद बादाम खाकर अधिकारी अपना दिमाग दुरुस्त कर लेंगी और सालभर से खोई हुई उसकी फाइल का पता लगा लेंगी कि आखिर वह कहां है? दरअसल इस घटना में बात सिर्फ एक फाइल की नहीं है, यह उस टूटते हुए धैर्य की है, जो सिस्टम की धीमी गति के सामने आखिरकार जवाब दे जाता है। युवक का धैर्य टूट चुका था और उसने बादाम को एक प्रतीक बना डाला। अब यह तो मालूम नहीं कि उस युवक के काम से संबंधित फाइल मिली या नहीं? मगर बादाम ने सिस्टम चलाने वालों तक उसकी बात जरूर पहुंचा दी। महिला अधिकारी समेत कई दूसरे जिम्मेदारों को मुख्यालय बिठा दिया गया है। इस मामले में कम से कम बादाम का असर होता दिखता है। क्या पता आने वाले समय में सरकार सचमुच ब्रेन फॉग से जूझ रहे सिस्टम के लिए बादाम आधारित कोई योजना शुरू कर दे। सरकार अपने अफसरों से कहे कि बादाम खाइए और दिमाग दुरुस्त कीजिए। 

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तबादले पर ब्रेक !

तबादला सूची ना जाने कहां अटक गई है? मंत्रालय से लेकर फील्ड में तैनात कलेक्टर-एसपी तक की सांस अटकी पड़ी है। बार-बार कैलेंडर की तारीखों की ओर ध्यान जा रहा है। जिन्हें बदला जाना है, उन्हें यह मालूम है कि उनकी मौजूदा कुर्सी से उनका साथ ज्यादा दिनों का है नहीं। इसलिए कामकाज पर असर पड़ने लगा है। जिम्मेदारी बदलेगी, इसलिए कुर्सी से ज्यादा जुड़ाव ठीक नहीं, यह सोचकर अफसरों का काम थोड़ा धीमा पड़ गया है। मंत्रालय में ज़्यादातर सचिवों को दो साल से ज्यादा का वक्त हो गया है। कुछ को छोड़कर ज़्यादातर सचिवों के विभाग भी बदले जाने हैं। कई जिलों के कलेक्टर-एसपी की तैनाती तब से है, जब से साय सरकार सत्ता में क़ाबिज़ हुई थी। ज़ाहिर है, उन्हें हटाया जाना है। उनकी जगह नए चेहरों को मौका मिलेगा। यह मुमकिन है कि कुछ कलेक्टर-एसपी इधर से उधर कर दिए जाए। इस बीच सरकार ने सुशासन तिहार की तारीख का ऐलान भी कर दिया है। अब तक की चर्चा यही थी कि दिगर राज्यों में चुनावी ड्यूटी पर गए अफसरों के लौटने के बाद तबादला सूची जारी कर दी जाएगी, मगर अब जब सरकार सुशासन तिहार मनाने का इरादा कर चुकी है, तब ऐसे में बड़े बदलाव की अटकलें थोड़ी क्षीण होती दिखती हैं। 

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