
नैतिक-अनैतिक
सरकारी सिस्टम में पहले भ्रष्टाचार की एक ही स्पष्ट परिभाषा होती थी। अब बदल गई है। अब दो परिभाषाएं हो गई है। एक होता है, ‘नैतिक भ्रष्टाचार’ और दूसरा होता है, ‘अनैतिक भ्रष्टाचार’। इसे सीधी भाषा में समझिए- ‘नैतिक भ्रष्टाचार’ वह है, जहां कोई अफसर नियमों के भीतर रहकर बेईमानी करता है और ‘अनैतिक भ्रष्टाचार’ वह है, जहां नैतिकता नाम की कोई जगह नहीं होती। अगर कुछ होती है, तो खुली बेशर्मी, जिसे सरकार भी गैरकानूनी मानती है। खैर, मध्यप्रदेश के भोपाल में 50 से ज्यादा आईएएस-आईपीएस अफसरों के जमीन खरीदने का मामला देशभर में खूब गूंज रहा है। 5 करोड़ की जमीन देखते ही देखते 65 करोड़ रुपए की हो गई। इत्तेफाक देखिए कि अफसरों ने जहां जमीन खरीदी उस जमीन के करीब से ही 3200 करोड़ रुपए की बाईपास सड़क की योजना बन गई। अब इसमें दो संभावनाएं हैं- पहली यह कि दस्तावेजों में यह योजना अफसरों के जमीन खरीदने से पहले बन गई थी और दूसरी यह कि अफसरों ने जमीन पहले खरीदी और प्रस्तावित सड़क को अपनी जमीन के रास्ते पर मोड़ दिया। अब लोग इसे लेकर कह रहे हैं कि यह रिश्वत वाला भ्रष्टाचार नहीं है, लेकिन रूतबे वाला जरूर है। सरकारी गोपनीयता अफसरों की निजी संपत्ति बढ़ाने का जरिया बन गई हैं। यह भ्रष्टाचार का सफेदपोश संस्करण है, जहां सब कुछ वैध सा दिखता है, सिवाय नीयत के। इस मामले में जमीन खरीदने वाले अफसर जरूर नियमों के भीतर थे, मगर बेईमानी उनके मन में थी। इधर छत्तीसगढ़ में भी कम करिश्माई अफसर नहीं हैं। अकेले भारत माला प्रोजेक्ट की ही बाल की खाल निकाल लेंगे, तो यह मालूम चल जाएगा कि किन-किन अफसरों ने प्रोजेक्ट के जमीन पर उतरने से पहले ही खेत के खेत खरीद लिए थे। कौड़ियों के दाम पर खरीदी गई उनकी जमीन ने आखिर कैसे उन्हें चार गुना ज्यादा मुआवजा दिलाया ! एक पूर्व मुख्य सचिव से लेकर महिला आईएएस तक कई नाम मुआवजा पाने वालों की सूची में दर्ज हैं। अफसरों के इन कारनामों पर सूबे के ही एक वरिष्ठ आईएएस अफसर ने अपनी टिप्पणी में गहरी बात कह दी। उन्होंने कहा कि कुछ भ्रष्टाचार कानून की आड़ में पलते हैं। उनकी यह टिप्पणी कम शब्दों में बहुत कुछ समझने के लिए पर्याप्त थी।
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वीआईपी पास
सरकार इन दिनों सुशासन तिहार मना रही है। सुशासन का मतलब यह सुनिश्चित करना होता है कि व्यवस्था की हर कुर्सी जिम्मेदार और जवाबदेह बने। सरकार की कोशिश भी यही दिखाई देती है। मगर अफसोस सत्ता की कुछ कुर्सियों तक यह संदेश अब भी पहुंच नहीं पाया है। कुछ दिन पहले एक जिले की पुलिस ने शराब के नशे में धुत एक शख्स को पकड़ा। वह सड़क पर बेतरतीब ढंग से गाड़ी चला रहा था। यानी सिर्फ खुद की नहीं, दूसरों की जान के लिए भी खतरा बना हुआ था, लेकिन यहां मामला कानून का कम और पहचान का ज्यादा निकल गया। शराबी मंत्री का करीबी आदमी था। मंत्री जी ने सीधे एसपी को फोन घुमा दिया। मंत्री की भाषा में निवेदन कम और आदेश ज्यादा था। उन्होंने आदेशात्मक लहजे में कहा, शराबी मेरा आदमी है, उसे तुरंत छोड़ दो। एसपी ने मंत्री को बताया कि शराब के नशे में गाड़ी चलाने वाला यह व्यक्ति किसी बड़े हादसे की वजह बन सकता है, लेकिन कानून और जिम्मेदारी की यह दलील मंत्री को नागवार गुजर गई। मंत्री भड़क गए। उन्होंने समय सीमा तय कर दी और कहा कि 5 मिनट में नहीं छोड़ा तो मैं खुद थाने आकर छुड़ा लूंगा। यह कितनी अजीब बात है कि एक शराबी को छुड़ाने मंत्री थाना तक पहुंचने की धमकी दे रहे हैं। एक तरफ सरकार सुशासन का उत्सव मना रही है, दूसरी तरफ सत्ता का एक चेहरा कानून को वीआईपी पास समझ रहा है।
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ढांचा बदलने की तैयारी
चर्चा बड़ी तेज है कि सरकार में बड़ा बदलाव होगा। सरकार का ढांचा बदल दिया जाएगा। आंतरिक संरचना में कम से कम चार खंभे गिराकर नए खंभे खड़े किए जाएंगे। सरकार की जमीन पर पकड़ बनी रहे इसलिए यह जरूरी समझा जा रहा है। ढाई साल गुजर गए हैं और ढाई सालों में दरारें खूब उभर आई हैं। दरारों को वक्त पर नहीं भरा गया, तो धराशायी होना तय है। यह बात सरकार का निर्माण करने वाले बखूबी समझ रहे हैं। कौन-कौन से खंभे ढहाए जाएंगे? यह उन पर उभरी हुई दरारों को देखकर समझा जा सकता है। फिलहाल दरारों की मोटाई और चौड़ाई मापी जा रही है। कारीगरों को इस काम में लगा दिया गया है। आंतरिक जांच रिपोर्ट तैयार करने वाली इकाई ने ढाई साल का ब्यौरा तैयार कर लिया है। यह ब्यौरा निर्माण इकाई तक पहुंचाए जाने की खबर है। जरूरी सामग्री जुटाई जा रही है। सामग्री के जुटने के बाद नया ढांचा खड़ा कर दिया जाएगा। फिलहाल इस प्रक्रिया में और कितना वक्त लग सकता है, यह कोई नहीं जानता। मगर संकेत हैं कि जल्द ही नए खंभे खड़े किए जाएंगे।
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टिप्पणी
सूबे के वन महकमे को लेकर पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश से एक बेहद गंभीर टिप्पणी सामने आई। मध्यप्रदेश के पीसीसीएफ स्तर के एक वरिष्ठ आईएफएस अफसर ने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि छत्तीसगढ़ के वन अफसरों से बात कीजिए। बातचीत की सातवीं-आठवीं लाइन तक आते-आते चर्चा पैसे पर पहुंच जाती है। जंगलों के लिए काम करने का समर्पण अफसरों में दिखाई नहीं देता। अफसर यहीं नहीं रुके। उन्होंने यह तक कहा कि कई अधिकारी सरकारी दौरों पर भी ऐसे जाते हैं, मानो वह निरीक्षण नहीं, पिकनिक मनाने निकले हों। उनके शब्दों में छत्तीसगढ़ के वन महकमे को लेकर गहरी निराशा और नाराजगी साफ झलक रही थी। सवाल यह है कि उनकी यह नाराजगी सिर्फ धारणा है या फिर इसके पीछे ठोस वजहें भी हैं? अगर दोनों राज्यों के वन प्रबंधन का तुलनात्मक आकलन किया जाए तो तस्वीर असहज करने वाली दिखती है। जंगल संरक्षण हो, वन्यजीव सुरक्षा हो या प्राकृतिक आवरण बचाने की प्रतिबद्धता कई मामलों में मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ से आगे दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ में स्थिति चिंताजनक है। राज्य गठन के समय यहां लगभग 59,800 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र था, जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का करीब 44 प्रतिशत था। बाद के सालों में जंगलों पर लगातार दबाव बढ़ा। हसदेव अरण्य, बस्तर और सरगुजा जैसे इलाकों में कोयला खनन, रेल कॉरिडोर, उद्योग और सड़क परियोजनाओं ने जंगलों पर गहरा असर डाला है। हाथी-मानव संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। तेंदुए और भालू आबादी इलाकों में पहुंच रहे हैं। जंगल सिकुड़ रहे हैं और जानवरों का प्राकृतिक गलियारा टूटता जा रहा है। सूबे में दिसंबर 2023 से जनवरी 2026 के बीच 38 हाथियों की मौत दर्ज हुई। इसी अवधि में 9 बाघ भी मारे गए। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक कुल 562 जंगली जानवरों की मौत हुई है। अब इन आंकड़ों को सामने रखिए और फिर मध्यप्रदेश के वरिष्ठ अफसर की तीखी टिप्पणी सुनिए। तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगती है। छत्तीसगढ़ में जंगल संसाधन तो है, लेकिन जिम्मेदारी नहीं।
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पांडेय पर मुहर !
जंगल महकमे की बागडोर नए कंधों पर सौंपने की तैयारी पूरी हो गई है। पीसीसीएफ और हाफ (हेड आफ़ फारेस्ट) श्रीनिवास राव रिटायर हो रहे हैं। उनके एक्सटेंशन की चर्चा थम गई है। पिछले हफ्ते नए हाफ के लिए डीपीसी बुलाई गई थी, लेकिन आईएएस ट्रांसफर लिस्ट में एसीएस की जिम्मेदारी बदल दिए जाने से उन्होंने अपने आप को इस बैठक से अलग कर लिया। बैठक टल गई और डीपीसी रूक गई। अब नई तारीख तय की जा रही है। सूत्र तस्दीक करते हैं कि अरुण पांडेय के नाम पर मुहर लगना तय है। पांडेय फिलहाल चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन हैं। सत्ता में उनकी गहरी पैठ बन गई है और आसपास कोई दूसरा प्रतिद्वंदी नहीं है, सो उनका हाफ बनना तय है।
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आईपीएस तबादला?
आईएएस अफसरों के बाद अब आईपीएस अफसरों के तबादले की सुगबुगाहट तेज हो गई है। चर्चा है कि क़रीब दर्जन भर जिले के एसपी इसकी जद में आएंगे। कुछ अफसरों को इधर से उधर किया जाएगा और कुछ बाबूगिरी के काम में लगाए जाएंगे। मतलब मैदानी तैनाती से हटा दिए जाएंगे। अब तक जिन जिलों को लेकर चर्चा है उनमें बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, कोरबा, बिलासपुर, दुर्ग, सारंगढ़, कवर्धा, सूरजपुर, महासमुंद, मोहला-मानपुर और धमतरी का नाम शामिल है। चर्चा यह भी है कि बिलासपुर-दुर्ग जिले के एसएसपी की अदला बदली हो सकती है। सारंगढ़ एसपी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं, लिहाजा उनकी जगह नए अफसर की पोस्टिंग होगी।]

