
प्रतीक
तस्वीरें सिर्फ तस्वीरें नहीं होती। वह समय का चरित्र भी दर्ज करती हैं। बीते दिनों कुछ तस्वीरों ने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे समय में विकास के प्रतीक बदल गए हैं? एक दौर था जब गांव में स्कूल खुलता था तब लोग उत्सव मनाते थे। स्कूल ग्रामीणों के सपनों को नया आकार देते थे। गांव में सड़क पहुंचती थी, तो उसे तरक्की का रास्ता कहा जाता था। यही सड़क गांव की उम्मीदों को शहर की संभावनाओं से जोड़ती थी। बिजली ने गांवों की रातों को छोटा और ग्रामीणों के सपनों को बड़ा कर दिया था और जब गांवों में अस्पताल बनते थे, तब उसे जिंदगी का नया पता बताया जाता था। स्कूल, सड़क, बिजली, अस्पताल जैसी सुविधाएं विकास की पहचान थी, लेकिन अब ऐसा लगता है कि विकास के प्रतीकों की सूची में एक नया नाम जुड़ गया है- सरकारी शराब दुकान। यह बात किसके गले उतरती है कि ग्रामीण शराब दुकान की मांग कर रहे हैं? इस दलील के साथ की इससे अवैध शराब की बिक्री पर रोक लगाई जा सकेगी। लाख टके का सवाल तो यही है कि जब सरकार ही शराब बेच रही है, तब अवैध शराब पर लगाम क्यों नहीं है? न ठेकेदार हैं और न ही ठेकेदारों के कोचिए। फिर अवैध शराब की सप्लाई चेन किस राजनीतिक रास्ते को पार कर रही है? खैर, छोड़िए। सरकार ग्रामीणों की मांग सुन रही है। नीति के स्तर पर यह निर्णय ठीक हो सकता है, मगर यहां सवाल सिर्फ नीति का नहीं रह गया है, सवाल उस मानसिक स्थिति का है, जहां लोग शराब दुकान खुलने पर सार्वजनिक उत्सव मना रहे हैं। शराब दुकान के उद्घाटन पर पूजा-पाठ चल रहा है, जनप्रतिनिधि फीता काटते तस्वीर खिंचवाते दिख रहे हैं और बाकायदा चिट्ठी लिखकर शराब दुकान खोलने पर धन्यवाद पत्र भेजा जा रहा है। खैर, राज्य की अपनी मजबूरियां हैं। आर्थिक दबावों से जूझती सरकार के लिए शराब की आय सबसे स्थिर और भरोसेमंद स्रोतों में से एक है। शराब की बिक्री से मिलने वाला पैसा बजट के कई छेद भरता है। संभव है कि आने वाले वर्षों में विकास के सरकारी सूचकांक भी बदल जाएं और दस्तावेजों में यह लिखा जाए कि सरकार ने इस वित्तीय वर्ष 75 नई शराब दुकान खोली है और अगले वर्ष 75 नए का लक्ष्य है।
इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : दुबई कथा… झुनझुना बजाने नहीं आए… टकराव… बटुआ… तराजू… हिसाब-किताब… – आशीष तिवारी
एक आंकड़ा…
जिस राज्य में शराब दुकान खुलने पर सार्वजनिक उत्सव मनाया जा रहा हो, वहां शराब की खपत के आंकड़ों पर भी एक नजर डाल लेनी चाहिए। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के ताजा आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में 15 वर्ष से अधिक उम्र के 38.3 प्रतिशत पुरुष शराब का सेवन करते हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 18.9 प्रतिशत है। यानी देश के औसत से दोगुने से भी अधिक। महिलाओं के मामले में भी तस्वीर अलग नहीं है। राज्य की 5.7 प्रतिशत महिलाएं शराब का सेवन करती हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत महज 1.1 प्रतिशत है। शराब खपत के मामले में देश के बड़े राज्यों में छत्तीसगढ़ दूसरे स्थान पर है। सिर्फ तेलंगाना हमसे आगे है। ये महज आंकड़े नहीं हैं। ये उस सामाजिक बदलाव की कहानी भी हैं, जिसमें शराब धीरे-धीरे एक आदत से आगे बढ़कर जीवन और व्यवस्था दोनों का हिस्सा बनती चली गई है। सरकार के खजाने में शराब का योगदान है, बाजार में शराब की मांग है और समाज में शराब की स्वीकृति भी बढ़ती दिख रही है। अब समझ नहीं आ रहा है कि छत्तीसगढ़ के लोग शराब पी रहे हैं या शराब धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ को पी रही है? वैसे भी एक पुराना गाना है, नशा शराब में होती तो नाचती बोतल…। यहां नशा सिर्फ बोतल में नहीं है। नशा सोच में भी है।
इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : सरकारी मोक्ष… धुनाई… स्पेशल विजिट… चर्चा में ‘घर’… टकराव… – आशीष तिवारी
गुस्सा
राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की एक पूरी पीढ़ी ऐसी है, जिसने प्रशासन की वर्णमाला से लेकर शासन का व्याकरण तक पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष डॉ.रमन सिंह के दौर में सीखा है, मगर बेमेतरा के एक कार्यक्रम में उनका नया रूप देखकर हर कोई चौंक उठा। चर्चाएं खूब उठी कि ब्यूरोक्रेसी में जिस डॉ.रमन सिंह की पहचान एक अभिभावक की रही है, आखिर ऐसा क्या हुआ कि वह अचानक भड़क उठे? एक अफसर ने इसका जवाब इन शब्दों के साथ दिया। उन्होंने कहा, जब अभिभावक डांटता है, तब उसकी डांट में सिर्फ गुस्सा नहीं होता। उस गुस्से में एक संदेश और सीख छिपी होती है। डॉ.रमन सिंह का गुस्सा दरअसल एक सीख थी। उन्होंने आगे कहा, डॉ. रमन सिंह उन नेताओं में नहीं हैं, जो हर दूसरे दिन भौहें तानकर सुर्खियां बटोरते हो। उनका गुस्सा दुर्लभ है। हां यह जरूर है कि कुछ चूक थी, जो शायद उनके लिए सहज नहीं थी और जिसने वर्षों से शांत दिखने वाले इस राजनीतिक व्यक्तित्व को नाराज कर दिया। बहरहाल मामला थम गया है। लोगों को लग रहा था कि बात दूर तलक जाएगी। सूबे की ब्यूरोक्रेसी भी इतनी अनुभवी हो चुकी है कि उसे यह अच्छे से मालूम है कि राजनीतिक नाराजगी का सबसे कारगर इलाज तर्क-वितर्क नहीं है। इसका इलाज संवाद और मुलाकात के रास्ते ढूंढा जा सकता है। जिले के जिम्मेदार अफसरों ने यही किया। दूसरे दिन ही उनके दरवाजे पर हाजिरी लगाने पहुंच गए। अफसरों ने स्पष्टीकरण दिए। कुछ परिस्थितियां बताई और कुछ बातें ऐसी रहीं, जिन्हें डॉ. रमन सिंह ने बिना सुने ही समझ लिया। जिले की कलेक्टर की पहचान मेहनती, ईमानदार और परिणाम देने वाली अधिकारी की है। बाकी अफसरों की कार्यशैली की चर्चाएं भी डॉ. रमन सिंह के कानों तक पहुंच गई थी। आखिरकार नाराजगी का बादल छंट गया। जो संदेश देना था, वह पहुंच गया और जो बात समझनी थी, वह समझ ली गई।
इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : नैतिक-अनैतिक… वीआईपी पास… ढांचा बदलने की तैयारी… टिप्पणी… पांडेय पर मुहर !… आईपीएस तबादला?… – आशीष तिवारी
मेंटरशिप
बेमेतरा में जो हुआ उसकी परिस्थितियां अलग थी। मगर इसमें कोई दो राय नहीं कि सूबे की ब्यूरोक्रेसी में आ रही ज्यादातर नई पौध मेंटरशिप के अभाव से जूझ रही है। नई पौध तेजी से बढ़ना चाहती है। उन्हें इस बात का भी डर नहीं रह गया है कि कहीं वह पहली आंधी में ही न ढह जाए। बरगद की छांव में खड़े पौधों को धूप कम मिलती है, लेकिन वह आंधी-तूफानों से बचने का हुनर जरूर सीख लेते हैं। लोगों को लगता है कि बरगद की ऊंचाई उसकी शाखाओं से है। जबकि हकीकत यह है कि ऊंचाई और मजबूती की वजह उसकी गहरी जड़ें हैं। यह अनुभव से हासिल होती हैं और यह अनुभव समय की गोद में पलता है। इसे कोई किताब नहीं सीखा सकती। मौसम की मार पर हासिल की गई गहरी पकड़ ही एक बरगद को बरगद बनाती है। खैर, सूबे की ब्यूरोक्रेसी का एक दौर ऐसा भी था, जब आला अफसर खुद मेंटरशिप पर जोर देते थे। नियम-कानून की बारीकियों के साथ जिम्मेदारी सिखाई जाती थी। मगर लगता है कि यह सब अब बीते जमाने की बात हो गई है। मेंटरशिप पर किसी का कोई जोर नहीं दिखता। बीते एक दशक में तो कम से कम ऐसी प्रैक्टिस देखने को नहीं मिली है। अफसरों की बेतरतीबी बढ़ती चली गई और रोक लगाने का कोई मैकेनिज्म डेवलप नहीं किया जा सका। ब्यूरोक्रेसी की नई पौध को लगता है कि जमीन पर बीज डलते ही वह ऊंचे पेड़ बन जाएंगे। मगर उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि पेड़ बनने की प्रक्रिया आसान नहीं। मिट्टी की गोद में जब एक छोटा सा बीज गिरता है, तब वह अपने भीतर एक विशाल पेड़ बनने का सपना संजोए होता है। धरती उसे अपने स्नेह से ढक लेती है। बारिश की बूंदे उसे जीवन का अमृत पिलाती है और सूरज की किरणें उसके भीतर छिपी चेतना को जगाती है। धीरे-धीरे बीज का कठोर आवरण टूटता है। एक नन्हा अंकुर धरती का सीना चीरकर बाहर आ जाता है। हवाओं के झोंके उसे झुलाते हैं। मौसम के उतार-चढ़ाव उसे परखते हैं, फिर भी वह हर चुनौती के साथ थोड़ा और मजबूत होता जाता है। उसकी जड़ें धरती की गहराइयों में फैलती है और शाखाएं आकाश की ओर अपना विस्तार करती हैं। तब जाकर एक छोटा सा बीज धैर्य, संघर्ष और प्रकृति के सहयोग से एक विशाल पेड़ बन पाता है। मगर क्या करें लगता है कि सूबे की ब्यूरोक्रेसी में आए नए रंगरूट गमले का पौधा बनकर सिमट जाना चाहते हैं।
इसे भी पढ़ें : पॉवर सेंटर : अब ‘सॉफ्ट पोस्टिंग’ नहीं… नारी शक्ति… खाकी शक्ति… ज्ञान का मंत्रालय… रुतबा… अधूरा असर… – आशीष तिवारी
घाघ आदमी
बीते दिनों एक जनपद सीईओ और भाजपा नेता के बीच हुई तीखी नोकझोंक का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। वीडियो में दिखी तल्खी ने इतना शोर मचाया कि सरकार को भी कार्रवाई करनी पड़ गई, लेकिन असली कहानी वायरल वीडियो के बाद तब शुरू हुई, जब सरकार ने सीईओ की पूरी कुंडली निकाली। पता चला कि सीईओ साहब कोई नए खिलाड़ी नहीं हैं। विवादों के मैदान में उनकी पारी लंबी रही है। रिकॉर्ड बताते हैं कि वर्ष 2017 में एक पूर्व कांग्रेस विधायक के साथ कथित अभद्रता के मामले में उन्हें पद से हटाया जा चुका है। टायलेट निर्माण में उन पर गड़बड़ी के आरोप लगे। टायलेट बनाया नहीं, लेकिन रकम पूरी निकाल ली। साल 2020 में डॉ. भीमराव अंबेडकर पर की गई एक टिप्पणी को लेकर भी उनका नाम सुर्खियों में आया। खूब विरोध हुआ। मामला दर्ज किया गया और फिर समय के साथ यह ठंडा भी पड़ गया। एक पोस्टिंग के दौरान सरकारी राशि के कथित गबन के आरोपों में भी उनका नाम उछला। तब प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा रही कि ऊंचे स्तर से उन्हें राहत दे दी गई। उनकी प्रशासनिक यात्रा में विवाद ने दायरा भी लांघा। निजी संबंधों से जुड़े कुछ प्रसंग भी समय-समय पर चर्चा का विषय बने। कहते हैं कि पंचायत मंत्री तक उनकी कार्यशैली की शिकायतें पहुंची थीं। हाल ही में उनका तबादला दक्षिण बस्तर हुआ था, लेकिन तबादले के विरोध में उन्होंने अदालती रुख अपनाकर स्टे ले लिया। स्टे आर्डर के सहारे सीईओ कुर्सी पर जमे रहे। सीईओ को लेकर यह कहा जाता है कि उनके रिश्तों का नेटवर्क बहुत व्यापक है। संघ से जुड़े लोगों से लेकर भाजपा और कांग्रेस जैसे दलों के प्रभावशाली चेहरों तक उनके संपर्कों की चर्चा रही है। सत्ता बदली। सरकारें बदलीं, मगर सीईओ साहब की उपयोगिता बनी रही। इस दफे सरकार ने ठीक-ठीक ठिकाने लगा दिया है। फिर भी सीईओ हैं बड़े घाघ आदमी। कौन जानता है कि उनके निलंबन की मियाद कब तक रहेगी?

