Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

दुबई कथा

सूबे के एक मंत्री जी इन दिनों अपनी रहस्यमयी विदेश यात्रा को लेकर चर्चा के केंद्र में हैं। हाल ही में कोलकाता चुनाव की आड़ में वह अपने एक करीबी मित्र के साथ चुपचाप दुबई की यात्रा कर आए। यात्रा इतनी गोपनीय रही कि न सरकार को भनक लगी, न संगठन को और न ही प्रशासनिक गलियारों में इसकी कोई आहट सुनाई दी। दिलचस्प बात यह है कि इसी साल जनवरी में भी मंत्री जी अचानक दुबई पहुंच गए थे। तब मामला उछला तो सरकारी स्तर पर कहा गया कि यह उनकी निजी यात्रा थी और शीर्ष स्तर से मौखिक सहमति ली गई थी। मंत्री पद पर रहते हुए विदेश यात्रा के लिए एक तय प्रक्रिया होती है, जिसे पूरा करना सामान्य तौर पर जरूरी माना जाता है। मगर लगता है कि मंत्री जी अब उन औपचारिक प्रक्रियाओं से कहीं आगे निकल चुके हैं। खैर, सत्ता के गलियारों में असली कौतूहल यह जानने की है कि आखिर मंत्री जी बार-बार दुबई क्यों जा रहे हैं? आखिर ऐसा क्या है जो मंत्री जी को दुबई बार-बार खींच रहा है? वहां ऐसा कौन सा काम है जो इतनी गोपनीयता मांगता है? दुबई से उड़कर मंत्री जी का विमान कब का लैंड कर चुका है, लेकिन उनके दौरे से जुड़े किस्म-किस्म के सवालों की लैंडिंग अब तक नहीं हो पा रही है। वैसे एक बात मंत्री जी को दूसरे तमाम मंत्रियों से अलग बनाती है, चोरी छिपे विदेश यात्रा कर मंत्री जी ने यह बता दिया कि वाकई वह सबके ‘गुरू’ हैं।

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झुनझुना बजाने नहीं आए…

एक मंत्री जी के परिवार में शादी थी। सरकार का पूरा कुनबा माने मंत्री, नेता, विधायक, अफसर और कार्यकर्ता सब एक बड़े रिसॉर्ट में जुटे थे। भव्य रिसेप्शन चल रहा था। रिसेप्शन में आने वाले अतिथियों का खूब आवभगत हो रहा था। इस बीच एक मंत्री रिसेप्शन की थाली के साथ पूरा-पूरा इंसाफ कर वापस लौट रहे थे कि एक विधायक उनसे टकरा गए। विधायक अभी-अभी रिसेप्शन में दावत उड़ाने दाखिल हुए थे। औपचारिक नमस्कार के बाद उन्होंने बिना भूमिका बांधे सीधे मुद्दे पर प्रहार कर दिया। कहा- क्या मंत्री जी, आजकल आपके विभाग में हुए एक बड़े खेल की खूब चर्चा है। सुना है आपने अच्छी-खासी कमाई कर ली है ! विधायक के मुंह पर लगाम नहीं था, वह शायद भूल गए थे कि यह बातचीत किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की मौजूदगी के बीच हो रही थी। आसपास खड़े लोग कानों को एंटीना बनाकर पूरी बातचीत सुनने लगे। मंत्री जी ने न तो सफाई दी और न ही नाराजगी जताई। मुस्कुराते हुए ऐसा जवाब दिया कि विधायक जी का परोसा गया सवाल उन्हीं के सामने वापस आ गिरा। बोले, तो क्या हम सिर्फ झुनझुना बजाने आए हैं? हम नहीं कमाएंगे क्या? और विधायक जी आप जिस मंत्री के रिसेप्शन में दावत उड़ाने आए हैं, आप ही बताइए इतनी भव्यता बिना कमाए-धमाए हो सकती है क्या? मंत्री जी का जवाब सुनकर विधायक कुछ क्षण के लिए निरुत्तर हो गए। माहौल में कुछ सेकंड का मौन छा गया, फिर दोनों नेताओं ने मुस्कुराकर एक-दूसरे को नमस्कार किया और अपने-अपने रास्ते निकल लिए। पीछे खड़े कार्यकर्ता यह पूरा संवाद सुन चुके थे। नेता आगे बढ़ गए, लेकिन कार्यकर्ताओं की चर्चा देर तक चलती रही। वे लोकतंत्र, नैतिकता और जनसेवा पर गहन चिंतन करते हुए मन ही मन अपने नेताओं का अभिनंदन कुछ ऐसी शब्दावली में कर रहे थे, जिसे सार्वजनिक मंचों पर दोहराना उचित नहीं माना जा सकता। बहरहाल मंत्री जी ने वह सच बोल दिया, जिसे राजनीति में आमतौर पर लोग स्वीकार नहीं करते।

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टकराव

राजधानी से लगे एक नगर निगम में इन दिनों महापौर का गुस्सा चर्चा में है। हालात ऐसे हैं कि अफसर जोखिम उठाकर उनके कमरे में दाखिल होते हैं। दरअसल मुद्दा एक सरकारी कार्यक्रम की सूचना महापौर तक समय पर न पहुंचने से शुरू हुआ था। सूचना पहुंचने में भले ही देरी हुई, लेकिन उस पर प्रतिक्रिया देने में महापौर ने देरी नहीं की। महापौर कार्यक्रम में पहुंचीं और मंच से ही अफसरों को जमकर लताड़ दिया। आमतौर पर ऐसी नाराजगी भाषण खत्म होते ही खत्म हो जाती है, लेकिन यहां कहानी अगले दिन भी जारी रही। महापौर ने संबंधित अफसरों को तलब किया और जवाब मांगा। अफसर सफाई देने लगे, बात इधर-उधर घूमने लगी और महापौर का पारा और चढ़ गया। बताया जाता है कि उन्होंने अफसरों को कमरे से बाहर निकलने तक नहीं दिया। किसी अफसर ने चुपके से पुलिस को सूचना दे दी। पुलिस पहुंची और महापौर को समझाया कि किसी को उसकी इच्छा के विरुद्ध रोकना कानूनी संकट खड़ी कर सकता है। एफआईआर तक की नौबत आ सकती है। तब कहीं जाकर महापौर का गुस्सा शांत हुआ। ऐसा पहली बार नहीं था कि महापौर का गुस्सा परवान चढ़ा हो। एक दफे किसी बात पर नाराज होकर उन्होंने अकाउंट अफसर पर पेपर वेट फेंक मारा था। अफसर चोटिल होते-होते बचा। तब से महापौर के टेबल से पेपर वेट ही हटा दिया गया कि कहीं महापौर किसी का सिर न फोड़ दें। खैर, जनप्रतिनिधि जनता की आवाज होते हैं और अफसर प्रशासन का चेहरा। दोनों के बीच मतभेद होना भी स्वाभाविक है, लेकिन जब मतभेद टकराव का रूप लेने लगें, तब नुक़सान किसी व्यक्ति का नहीं संस्था की गरिमा का होता है। सवाल यह नहीं है कि किसके पास ज्यादा अधिकार हैं, बल्कि यह है कि अधिकारों का उपयोग किस तरह किया जाता है। कुर्सी का कद आवाज ऊंची करने से नहीं बढ़ता, यह धैर्य, संवाद और विवेक से बढ़ता है। डर लोगों को चुप करा सकता है, लेकिन सम्मान और सहमति कभी नहीं दिला सकता।

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बटुआ

राज्य गठन के बाद से अब तक के 26 सालों में यह पहला मौका है जब सरकार के महज ढाई साल के भीतर ही अधिकांश मंत्रियों के ओएसडी और पीए बदल दिए गए हैं। अब सरकार ने तो कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई, लेकिन इतना तय है कि कोई आदमी अपने घर का पंखा भी बिना वजह नहीं बदलता, फिर मंत्री अपने ओएसडी-पीए क्यों बदलेंगे?पुराने जमाने में ओएसडी और पीए की नौकरी बड़ी उबाऊ हुआ करती थी। बेचारे फाइलें देखते थे, विभागीय काम समझते थे, अधिकारियों से समन्वय करते थे और मंत्री के कार्यालय को व्यवस्थित ढंग से चलाते थे। कुल मिलाकर उनका काम शासन चलाने में मदद करना था, लेकिन समय के साथ तकनीक बदली और ओएसडी-पीए का सॉफ्टवेयर अपडेट हो गया। अब उनका काम फाइलों से ज्यादा लोगों को स्कैन करना है। कौन मिलने आया है, कौन सिर्फ नमस्ते करने आया है और कौन नमस्ते के साथ व्यवस्था भी लाया है, इसका सूक्ष्म परीक्षण अब इन्हीं के जिम्मे है। मंत्री तक पहुंचने का रास्ता भी इन्हीं के मूड और मैनेजमेंट स्किल से होकर गुजरता है। ओएसडी और पीए मंत्रियों का दूसरा बटुआ बन गए हैं। जब तक बटुआ बगैर विवाद के ठीक से काम करता रहता है, सब कुछ बढ़िया चलता है, लेकिन जैसे ही शिकायतों का बैलेंस बढ़ने लगता है, मंत्रियों को लगता है कि सबसे पहले बटुआ बदलकर नया बटुआ लाया जाए। लोग भी अपने और मंत्री के बीच ओएसडी और पीए को एक दीवार मानकर चलते हैं, सो सबसे ज्यादा उन्हें ही कोसा जाता है। मंत्री भी इस तरह की व्यवस्था से संतुष्ट है। अगर कोई विवाद हुआ तो बस ओएसडी या पीए को हटा दो। कम से कम संदेश चला जाता है कि बड़ी कार्रवाई हो गई है। यानी बीमारी चाहे जहां हो, इंजेक्शन ओएसडी और पीए को ही लग रहा है। हालांकि इस छोटे से राज्य में यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि मंत्रियों के यहां असली व्यवस्थाओं को कौन संभाल रहा है। कहीं रिश्तेदार सक्रिय हैं, कहीं पुराने मित्र, कहीं खास शुभचिंतक। ऐसे में ओएसडी और पीए बेचारे वही भूमिका निभाते हैं जो शतरंज में प्यादे निभाते हैं। राजा सुरक्षित रहता है, प्यादा कुर्बान हो जाता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि कुर्बान हुए प्यादे ही व्यवस्था से बाहर आने के बाद उन मंत्रियों की कब्र खोद रहे हैं, जिन्होंने बे आबरू होकर हटना पड़ा है। 

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तराजू

सूबे में सुशासन है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि यहां लात भी लोकतांत्रिक तरीके से चलती है। कोई किसी को पीट दे तो सरकार तुरंत संतुलन बना देती है। एक एफआईआर इधर, एक एफआईआर उधर। मामला बराबर। सरकार के पास बड़ा अद्भुत तराजू है, जो ऐसा संतुलन बनाता है, जिसे देखने वाला अपना माथा पकड़कर इस सोच में डूब जाता है कि आखिर पलड़ा किसका भारी है? खैर, ताजा मामला एक विधायक और नायब तहसीलदार के बीच छिड़े विवाद से जुड़ा है। आरोप है कि तहसीलदार ने विधायक की बहन से अभद्रता की। विधायक को लगा कि कानून अपना काम करने में देर कर सकता है, इसलिए उन्होंने कानून की मदद करने का फैसला कर लिया। विधायक ने नायब तहसीलदार को बेदम पीट दिया। अब इस पिटाई कांड से तहसीलदार संघ नाराज हो गया है। संघ ने दो टूक कह दिया कि अफसर की पिटाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। दरअसल यह लड़ाई सिर्फ विधायक और अफसर की नहीं है। यह दो विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों की लड़ाई है। एक के पास सत्ता की ताकत है, दूसरे के पास व्यवस्था की। बहरहाल घटना के बाद सरकार ने निष्पक्षता की मिसाल पेश की। दोनों पक्षों पर एफआईआर दर्ज कर दी गई है। यानी जिसने हाथ चलाया और जिस पर हाथ चला, दोनों बराबर। विधायक के समर्थन में पार्टी खड़ी है। कार्यकर्ता खड़े हैं। नायब तहसीलदार के समर्थन में संघ है। दोनों तरफ नारे हैं। बयान हैं। पद, प्रभाव और गुस्से का संयुक्त प्रदर्शन चल रहा है। मगर यह तय है कि इसमें होना जाना कुछ नहीं है। समझौता ही विकल्प है। यह विकल्प आम आदमी के हिस्से नहीं आ पाता है। रोजमर्रा के बुनियादी काम पर कमियां दिखाता सरकारी कागज ही आम आदमी के हिस्से है। आम आदमी राजनीति और सरकारी व्यवस्था के बीच वैसा ही दबा रहता है, जैसे दो पाटों के बीच गेहूं। मटमैला कागज लिए बरसो से सरकारी दफ्तर के चक्कर काटते गरीब, पेंशन के लिए बाबुओं के आगे हाथ जोड़ते खड़ा बुजुर्ग और सालों साल जमीन विवाद का केस लड़ते-लड़ते चेहरे की झुर्रियों और माथे पर चिंता की सलवटों को लेकर घूमते आम आदमी के हिस्से की बात कौन करेगा? उनके हिस्से की लड़ाई कौन लड़ेगा? ऐसे विधायक और नायब तहसीलदार? काश गरीब तबके का भी एक संगठन होता। संगठन की तेज आवाज होती। नेताओं और अफसरों की हिकारत की गूंज पर ये संगठन दहाड़ उठता और सरकार उस दहाड़ से थर्रा जाती। थर्रा कर सरकार का संतुलन का तराजू निकलता और हर छोर का पलड़ा बराबरी पर लाकर समझौते का विकल्प खोल दिया जाता। 

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हिसाब-किताब

पार्टी में इन दिनों हिसाब चल रहा है, जो विवाद की दहलीज पर आ खड़ा हुआ है। हिसाब का यह विवाद किसी पद, टिकट या बयान को लेकर नहीं है। मामला उससे कहीं ज्यादा गंभीर है। मामला पार्टी फंड का है, जिसे आम भाषा में चंदा कहा जाता है। समस्या यह नहीं है कि चंदा कितना और कहां से आया। समस्या यह है कि चंदा जितना आया, उतने का हिसाब नहीं मिल रहा है। इस पूरे मामले का सबसे रोचक हिस्सा यह है कि हिसाब लगाने के लिए पांच लोगों की एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई थी। सबके पास अपने-अपने आंकड़े थे। बैठक में खूब माथापच्ची हुई। कैलकुलेटर गरम हो गए, कागज़ भर गए, चाय के कई दौर चले, लेकिन हिसाब कहीं जाकर बैठने को तैयार ही नहीं हुआ। सूत्र कहते हैं कि अब फैसला हुआ है कि एक और बैठक होगी। हर जटिल समस्या का यही सबसे सफल समाधान भी यही है कि पहली बैठक में हिसाब नहीं मिला तो दूसरी होगी। दूसरी में नहीं मिला तो तीसरी होगी। अंततः ऐसा हिसाब तैयार किया जाएगा जो वास्तविकता से भले न मिले, लेकिन कागज़ में जरूर मिल जाए। वैसे भी राजनीति में हिसाब का महत्व वास्तविक रकम से ज्यादा कागज पर उसकी उपस्थिति का होता है। पैसा कहां से आया, यह सवाल छोटा है। फिलहाल पार्टी के नेता आश्वस्त हैं। उन्हें भरोसा है कि अगली बैठक में हिसाब पूरी तरह से साफ हो जाएगा। चाहे सरकार हो या सियासत एक बात तय है कि समस्याएं सुलझे या न सुलझे खाते अंततः संतुलित हो ही जाते हैं। 

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