Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

रिसाव

सरकारी शब्दकोश बड़ा दिलचस्प होता है। यहां चोरी, कभी चोरी नहीं लगती। शब्द थोड़े बदल दिए जाते हैं, तो वह प्रक्रिया का हिस्सा लगने लगती है। अब चोरी के इस मामले को ही देख लीजिए। अगर हम चोरी शब्द हटाकर यह लिख दें कि यह घटना एक प्रोसेस्ड ट्रांसफर ऑफ रिसोर्सेज है, तो सुनने में सब कुछ वैध सा लगता दिखेगा, पर हकीकत यह है कि इस पूरी घटना में सब कुछ काला था, जिसे भाषाई शक्ल की सफेद चादर डालकर ढकने की खूब कोशिश की गई, मगर सच की अपनी जिद होती है। वह सामने आ ही जाता है। यह मामला बिल्कुल सीधा था, लेकिन कहानी टेढ़ी कर दी गई। एलपीजी से भरे छह कैप्सूल ट्रक पकड़े गए थे। दस्तावेज अधूरे थे, सो ट्रकों को थाने में खड़ा कर दिया गया था। फिर सुरक्षा का तर्क आया। कहा गया कि कैप्सूल ट्रकों में ज्वलनशील गैस है। इससे खतरा हो सकता है। आदेश हुआ कि इन्हें सैकड़ों किलोमीटर दूर एक निजी पेट्रोकेमिकल्स प्लांट में शिफ्ट किया जाए। सरकारी कागजों में इसे एहतियात बरतने वाला कदम बताया गया था, मगर असल में यही कदम वह दरवाजा बना, जहां से पूरी साजिश भीतर आनी थी। कैप्सूल ट्रकों के प्लांट पहुंचने के बाद सारा गैस वहां के बुलेट टैंकों में खाली कर दिया गया। जो गैस बच गई, उसे खुले बाज़ार में अवैध ढंग से बेच दिया गया। कोर्ट के आदेश पर जब ट्रक मालिक अपना ट्रक वापस लेने पहुंचा, तो उसे ख़बर मिली की गैस तो लीक हो गई है। कैप्सूल ट्रक जो लीक प्रूफ था, उससे गैस लीक हो चुकी थी। चर्चा में यह बात सुनी गई कि इस पूरे खेल में करीब एक करोड़ रुपए की बंदरबांट हुई है। प्लांट और प्रशासन के बीच सांठ-गांठ की बातें सामने आई है और शक की सुई उन अफसरों तक भी पहुंची हैं, जो जिले की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ट्रक मालिक के दबाव पर गैस की चोरी का एफआईआर दर्ज हुआ है और विडंबना देखिए कि अब जांच भी वही सिस्टम कर रहा है, जिसकी परछाइयां इस खेल में दिख रही हैं। खैर, इस पूरे मामले ने यह तो बता दिया है कि गैस के साथ-साथ सिस्टम का जमीर भी लीक हो गया है। वैसे भी सिस्टम के ज़मीर का कोई सेफ्टी वाल्व तो होता नहीं है। इस संगठित चोरी में हर किरदार ने चुपचाप अपनी भूमिका निभाई है। इनमें से अगर एक कड़ी न टूटती तो भीतरखाने की चर्चा कब की दफ्न हो चुकी होती। 

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तुनकमिजाज अफसर

जंगल महकमे में इन दिनों एक अफसर की तुनकमिजाजी खूब चर्चा बटोर रही है। साहब किसी की नहीं सुनते। ना संतरी की, ना मंत्री की। अफसरों से उनका रवैया ऐसा है, जैसे सामने वाले की कोई हैसियत ही न हो। मानो वे सब उनके जूते की नोक पर खड़े हो। हर वक्त उनके चेहरे पर एक अजीब सा ‘तेज’ झलकता रहता है। शुरुआत में लोग समझ नहीं पाए कि उनके चेहरे पर इतना ‘तेज’ आखिर आया कहां से है ! मगर जब विभाग के कुछ जिज्ञासु अफसरों ने इस रहस्य की परतें खोलनी शुरू की, तो मामला धीरे-धीरे साफ होने लगा। पता चला कि साहब के चेहरे का यह ‘तेज’ कोई प्राकृतिक नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से आयातित है। अफसर मूलतः दक्षिण भारत के एक ऐसे राज्य से आते हैं, जहां देश की सत्ता की बागडोर संभालने वाली पार्टी की बुनियाद कुछ चुनिंदा नेताओं के कंधों पर टिकी हैं और उन्हीं चुनिंदा नेताओं के सहारे संगठन अपना विस्तार करने में जुटा है। अफसर उनमें से ही एक नेता के बेटे हैं। उनके पिता उस राज्य में पार्टी के कोषाध्यक्ष हैं। पार्टी की गतिविधियां उनके कोष की रोशनी से ही आगे बढ़ रही है। यह बात तुनकमिजाज साहब बखूबी जानते हैं, इसलिए नाम के साथ-साथ उनके चेहरे पर भी हर वक्त एक ‘तेज’ बना होता है। एक उच्च पदस्थ अफसर कहते हैं कि शायद उनके पिता के राजनीतिक पद से ही उनके व्यवहार को तेज धार मिल रही होगी। 

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नेटवर्किंग प्लेस

राजधानी के एक जिम में उमड़ रही अफसरों और कारोबारियों की गतिविधियों पर सरकारी नज़र तेज हो गई है। जिम में आख़िर ऐसा क्या है कि दूरदराज़ के इलाकों में रहने वाले अफसर वर्जिश के लिए पहुंच रहे हैं? सरकार इस सवाल का जवाब ढूंढ रही है। इसलिए नजर पैनी हो गई है। एक जिम का सरकार की नज़र में आ जाना भी एक ख़बर है। खैर, एक उच्च पदस्थ अफसर ने यह कहा कि बहुत से अफसर अब महंगी सोसाइटियों के बाशिंदे हैं। उन सोसाइटियों में अव्वल दर्जे का जिमखामा भी है। अफसरों के लिए छत्तीसगढ़ क्लब भी बना रखा है। पीएचक्यू ने तो अपने अफसरों के लिए बाकायदा आधुनिक जिम बनाया हुआ है। बावजूद इसके एक ही जिम में जुटने की कोई तो वजह होगी ही, यह मानकर गुपचुप ढंग से तफ्तीश शुरू की गई है। क्या मालूम इस तफ़्तीश में कई किस्से और कई कहानियां बाहर आ जाए। खैर, जिम सिर्फ एक जिम नहीं है। यह एक किस्म का नेटवर्किंग प्लेस बन गया है। इस जिम में नेता, अफ़सर, कारोबारी हर कोई जुटता है। ज़ाहिर है, ऐसे में यहां सिर्फ शरीर की मांसपेशियों को दुरुस्त करने भर की बात तो होती नहीं होगी। मुमकिन है कि बेंच प्रेश करते किसी अफसर से कोई कारोबारी आकर यह कहता हो कि साहब टेंडर भर दिया है, जरा देख लीजिएगा और साहब सांस छोड़ते कहते हो, जरा पांच किलो का वेट बढ़ा दे। वैसे एक मासूम सा सवाल है कि क्या इस जिम में समझौते किलो में होते होंगे? है ना…..

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प्रति व्यक्ति कितना पेड़?

वर्ल्ड पापुलेशन रिव्यू के अनुसार दुनिया में 3 लाख करोड़ पेड़ है। इस हिसाब से दुनिया के हर व्यक्ति के हिस्से करीब 422 पेड़ हैं। भारत में करीब 35 अरब पेड़ हैं। यानी हर व्यक्ति के हिस्से औसतन 28 पेड़, लेकिन छत्तीसगढ़ के संदर्भ में आंकड़ें बढ़ जाते हैं। छत्तीसगढ़ का वन क्षेत्र क़रीब 55 हज़ार 811 वर्ग किलोमीटर का है। यानी क़रीब 41 फीसदी जंगल है। राज्य की जनसंख्या 3 करोड़ है। एक वर्ग किलोमीटर में 100 हेक्टेयर होता है। औसतन 600 पेड़ प्रति हेक्टेयर में माने जाएं, तो  55 हज़ार 811 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में 335 करोड़ पेड़ लगे होने चाहिए। राज्य की जनसंख्या के अनुपात में देखा जाए तो प्रति व्यक्ति क़रीब 110 से 115 पेड़ होगा। आंकड़ों में यह तस्वीर कितनी ख़ूबसूरत दिखती है। मगर ज़मीन पर वास्तविक स्थिति क्या है? 

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मैं हूं कहां? 

तिनका-तिनका नुक़सान एक दिन इतना बड़ा हो जाता है कि नुक़सान की भरपाई की जगह बच नहीं जाती। एक दशक में धीरे-धीरे गरियाबंद के जंगल का एक हिस्सा कट गया। अवैध ढंग से पेड़ गिरते रहे। जब तक समझ आया तब तक एक लाख पेड़ कट चुके थे। यानी जितने पेड़ गिरे, उतनी ही खामोशी भी जंगल में भर गई। हमारा जंगल हर दिन ढह रहा है और जंगल महकमे के ज़िम्मेदार कुर्सी की लड़ाई में व्यस्त है, उनके पास इतनी फुर्सत भी नहीं कि जंगल की ओर एक बार झांक आए। गिरते पेड़ों का दर्द शायद उनके हिस्से नहीं। सरकारी दस्तावेजों में यह दर्द केवल दर्ज हो रहा है। खैर, पिछले दिनों जब दुनिया के सबसे गर्म शहरों की खबर आई, तब उन शहरों में छत्तीसगढ़ के भी कुछ शहरों के नाम शामिल रहे। हरियाली के दावों को तापमान ने सीधी चुनौती दे दी है। सवाल यह है कि सूबे में गर्म होते शहर क्या सरकार की चिंता में नहीं होने चाहिए? या फिर चिंता भी अब सिर्फ आंकड़ों में दर्ज होने के लिए रह गई है? सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि राज्य के शहरी इलाकों में ही बीते दो दशकों में एक अरब से ज्यादा पेड़ रोपे जा चुके हैं, मगर ज़मीन पर इतने पेड़ हैं कहां? इतने पेड़ लगाए गए होते तो शायद एक इंच ज़मीन भी न बची होती। पेड़ कटकर ठूंठ में बदल रहे हैं। ठूंठ ज़मीन हो रही है और जंगल बस एक सवाल पूछ रहा है ‘मैं हूं कहाँ?’ इस तस्वीर के बरक्स फारेस्ट सर्वे आफ़ इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि सूबे में जंगल का क्षेत्र थोड़ा बढ़ा है। सवाल यह है कि क्या यह कागजों पर बढ़ा है? क्योंकि खत्म होते जंगल की तस्वीर सामने हैं। बढ़ने की तस्वीर कहां है? 

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अधर में नियुक्ति? 

न जाने कौन सी अड़चन आ खड़ी हुई है कि पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति अधर में लटक गई है? यूपीएससी से दो नाम के भेजे गए पैनल पर धूल जम गई है, लेकिन उन दो नामों में से एक पर मुहर नहीं लग पा रही। मालूम नहीं कि वह कौन सी शक्ति है, जिसने इस प्रक्रिया को रोक रखा है। दो नामों में से एक हैं प्रभारी डीजीपी अरूण देव गौतम और दूसरे हैं हिमांशु गुप्ता। आला अफसर कहते हैं कि यूपीएससी से पैनल आने के बाद आदेश जारी होना था, मगर यह ठहर गया। अब दिन गुजर रहे हैं, लेकिन आदेश जारी नहीं हो रहा। टकटकी निगाह जमाए हर कोई इंतजार कर रहा है। कोई कहता है कि राजस्थान के रास्ते पैरवी आई है, कोई कहता है कि सरकार में किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन रही। कोई कहता है कि चार नामों के पैनल में से जो दो नाम डीपीसी में कट गए थे, उन लोगों ने अड़चन लगा रखी है, जिसकी वजह से सरकार फैसला नहीं कर पा रही। चर्चाओं पर किसका रोक है। जितने लोग उतनी बातें। मगर यह हैरान करता है कि यूपीएससी के भेजे गए नामों में से किसी एक नाम को चुनने के लिए आखिर सरकार इतना वक्त ले रही है? सरकार को झट से फैसला ले लेना चाहिए। सरकार कहती है कि ला एंड आर्डर सरकार की प्राथमिकता में है। ऐसे में डीजीपी चुनने के लिए सिवाए इसके कोई दूसरा एजेंडा भी नहीं होना चाहिए। फिर वह किस बाद की सरकार जो फैसले न ले सके। हुज़ूर ए आला को थोड़ी फुर्सत निकालकर सीधे आदेश जारी कर देना चाहिए, फिर चाहे ताजपोशी किसी भी नाम की क्यों न हो? सरकार वहीं जो जल्दी-जल्दी फैसला कर ले। फैसले सही हुए तो अच्छी बात और अगर किन्हीं कारणों से ग़लत भी हो गए, तो लिए गए फैसलों को सही साबित करने में सरकार पूरी ताक़त झोंक दे। सरकार में वैसे भी कुछ गलत कहां होता है !

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चेत जाइए

सुशासन तिहार शुरू हो गया है। सूबे के मुखिया ने तल्खी दिखाते हुए अफसरों को हिदायत दी है कि आम तबके की सुनवाई हो। वैसे तो सूबे में सुशासन की सरकार है और ढाई साल बाद भी आम तबके की सुनवाई होने जैसी नसीहत देने की जगह नहीं होनी चाहिए। यह तो अब तक अफसरों की प्रैक्टिस में आ जानी चाहिए थी, फिर भी कई जिलों में कलेक्टरों और एसपी साहबों की कारगुजारियों से सूबे के मुखिया बखूबी वाक़िफ़ हैं, इसलिए इस तरह की हिदायत दी गई है। वैसे सिर्फ हिदायत भर से बात बन जाती तो बार-बार देने की नौबत नहीं आती। सरकार को यह चाहिए कि आड़ा तिरछा काम कर रहे एक-दो कौव्वों को मारकर टांग दे। बाकी दूसरे यह देखकर अपने आप ही ठीक हो जाएंगे। खैर, सुशासन तिहार को लेकर प्रभारी मंत्री भी फुल फार्म में आ गए हैं। मंत्री अपने-अपने प्रभार जिलों का दौरा कर समीक्षा बैठक ले रहे हैं। इनमें से सबसे तेज दौड़ रहे हैं, स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव। उनकी मैराथन बैठक चल रही है। हाल ही में दुर्ग और इससे पहले राजनांदगांव में उन्होंने बैठक ली। गजेंद्र यादव के तेवर बेहद कड़े हैं। बैठक में वह अपने एजेंडों के साथ पहुंच रहे हैं। वह भी पूरी तैयारी के साथ। कोई अफसर यदि आंकड़ों के फेर में फंसाने की कोशिश करने की जुर्रत भी करता दिखता है, तो उसके हिस्से उनकी कड़ी फटकार आ जाती है। गजेंद्र यादव को देखकर पुराने दौर के मंत्री याद आ रहे हैं, जिनकी समीक्षा बैठक होती तो बंद कमरे में थी, लेकिन उसकी गूंज बाहर तक सुनाई देती थी। गज पर सवार होकर पहुंचे गजेंद्र दो टूक कह रहे हैं, मैं यहां चाय पीने नहीं आया हूं। कुल मिलाकर उनकी नसीहत इतनी भर है कि अफसर समय रहते चेत जाएं, नहीं तो ठिकाने लगा दिए जाएंगे।