Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

जमीनी नेता

राजधानी के नजदीक एक शहर में हुए एक कार्यक्रम में जाना हुआ। एक मित्र ने इशारे से एक इमारत दिखाई और कहा, देखिए यह मंत्री जी का दफ्तर है। नजूल की जमीन पर खड़ी की गई है। मैंने गौर से देखा। मित्र ने धीरे से बताया कि दफ्तर की आड़ है, पर बात उससे आगे की है। अब यह जगह सरकारी कम, स्थायी ज्यादा हो चुकी है। मंत्री जी इस बात को लेकर पूरे शहर में लोकप्रिय हो गए हैं कि वह ‘जमीन’ के नेता हैं। जमीन से जुड़ने का उनका संकल्प इतना दृढ़ है कि वह नजूल की जमीन से भी अलग नहीं हो पाते। इसलिए शहर के कोने-कोने में उनका विस्तार दिखाई देता है। जहां दफ्तर है, वहां उनकी उपस्थिति है और जहां दफ्तर नहीं है, वहां जमीन की घेराबंदी उनकी उपस्थिति का संकेत है। नेताजी जी ने जिस दिन मंत्री पद की शपथ खाई थी, उस दिन ही उन्होंने यह बात दोहराई थी कि मैं संविधान की रक्षा करूंगा। दरअसल जब उन्होंने संविधान कहा होगा, तब मन में चुपचाप ‘सरकारी जमीन’ कह दिया होगा, ‘मैं सरकारी जमीन की रक्षा करूंगा’। अब वो ‘जमीन’ की घेराबंदी कर रक्षा करने का जतन खूब कर रहे हैं । इसमें बुराई क्या है! यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। भविष्य में कभी जब इतिहास उनसे पूछेगा कि बताओ नेताजी, मंत्री बनकर आपने क्या उखाड़ लिया। तब यही जमीनें उनकी उपलब्धियों का गौरव गान करती दिखाई देंगी। एक दफे उच्च कोटि के एक नेता जी ने बताया भी था कि एक कायदे के नेता में दो बड़ी खूबी होती है। एक – वह चुनाव जेब के पैसे से नहीं लड़ता है। चंदे के पैसे से लड़ता है। दूसरा- अगर वह भूले भटके मंत्री बन गया, तब सरकारी जमीनों पर अपने नाम की तख्ती लगा देता है। नेता जी नए नवेले सियासतदार तो हैं नहीं। उन्होंने सियासत का यह हुनर सीखा नहीं है, बल्कि जिया है। बचपन से राजनीति देखते- देखते उन्होंने यह समझ लिया था कि इस रास्ते से गुजरते हुए निजी जिंदगी में बदलाव लाना है। उन्होंने धीरे-धीरे, चुपचाप, बिना शोर किए यह सब किया भी, मगर वह बस यह भूल गए कि छोटा सा राज्य है। छोटी सी आहट भी लोगों को जगा देती है। यहां तो मौन सरकारी जमीनों ने ही शोर करना शुरू कर दिया है।

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आईजी साहब और उनके किस्से

एक रेंज के आईजी साहब की सक्रियता बढ़ गई है। उन्हें लेकर चर्चा वही पुरानी है, लेकिन उनका अंदाज नया है। आईजी साहब जांच की आड़ में निजी हित साध रहे हैं। उनसे जुड़े किस्सों का नया अध्याय खुल गया है। कुछ वक्त पहले आईजी बनते ही उन्होंने थाना प्रभारियों को चिट्ठी लिखकर पूछा था कि क्यों न आपके विरूद्ध कार्रवाई की जाए? यह चिट्ठी कुछ थाना प्रभारियों के खिलाफ चल रही जांच की आड़ में लिखी गई थी। कुछ चिट्ठी कामकाज की खामियों से भी जुड़ी थी। अब उनकी लिखी गई चिट्ठियों पर असर हो रहा है। चिट्ठियों का जवाब नकद में वापस आ रहा है। हालिया किस्सागोई में यह मालूम चला है कि एक टीआई के खिलाफ चल रही जांच एक झटके में गुम हो गई। सुना है कि टीआई से मांगे गए स्पष्टीकरण में 50 हजार रुपए का तर्क भेज दिया गया था। तर्क ने जगह बनाई और टीआई के खिलाफ होने वाली संभावित कार्रवाई ने मुंह फेर लिया। आईजी साहब फुल फॉर्म में हैं। पहले वह गलतियां ढूंढा करते थे। अब मौका तलाशते हैं। थाना दर थाना उनकी एक नई तरह की स्कैनिंग चल रही है कि किस थाना प्रभारी के विरूद्ध जांच लंबित है और किसके डर को समझौते में बदला जा सकता है। चर्चा आम है कि जांच का मकसद सच्चाई तक पहुंचना कम और सुलह तक पहुंचना ज्यादा है। खैर, इसमें आईजी साहब का क्या दोष? वह जिस व्यवस्था से आते हैं, उस व्यवस्था ने उन्हें यह सिखाया है कि हर जांच का अंत होता है और हर अंत की एक कीमत तय है। 

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आप बस ढक्कन खोलिए

आइए, शराब पर कुछ बात करते हैं। बीते हफ्ते दो घटनाएं घटी। पहली घटना – एक पति ने अपनी पत्नी का गला रेता और फिर उसका कटा सिर लेकर सरेआम घूमता रहा। दूसरी घटना- महज तीन साल की मासूम बच्ची से दुष्कर्म की रही। दोनों ही मामलों में एक समानता थी – आरोपी शराब के नशे में थे। खैर, आबकारी विभाग दिन-रात मेहनत कर रहा है कि लोगों तक शराब की पहुंच और आसान कैसे हो? आखिर सवाल राजस्व का है। राजस्व से ही तो विकास होगा, लेकिन जब यही राजस्व इतना ‘हाई’ हो जाए कि जमीन पर हो रही घटनाएं दिखनी बंद होने लगे, तब समस्या थोड़ी ज्यादा गहरी हो जाती है। सूबे में शराब से कमाई इतनी बढ़ रही है कि इंसानियत अब घाटे का सौदा लगता है। इसलिए सरकारी सिस्टम को हादसे भी महंगे नहीं लगते हैं। सड़क टूट जाए, अस्पताल दूर हो, स्कूल में शिक्षक न हो, कोई बात नहीं, लेकिन यह तय है कि आबकारी महकमे की व्यवस्था आपको कभी निराश नहीं करेगी। कम से कम एक बोतल की दूरी पर तो बिल्कुल भी नहीं। होश में रहने पर समस्या साफ दिखाई पड़ती है, मगर नशे में सब ठीक लगता है। शायद इसलिए समस्या का समाधान भी उसी दिशा में खोजा जा रहा है। अब यह बात कोई नहीं समझता कि शराब का यह नशा इतना गहरा हो चुका है कि शर्म भी होश में नहीं है। पूरा सिस्टम हल्के-हल्के झूम रहा है। ऐसे में सीधे खड़े रहने की उम्मीद किससे की जाए? बहरहाल अगर यही विकास का रास्ता है, तो बस ढक्कन खोलिए और फिर उन भयावह चेहरों को देखिए जो नशे में इंसानियत को कुचलते हुए सड़कों पर घूम रहे हैं।

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नेताओं का कद

देश के किसी भी हिस्से में चुनाव क्यों न हो? चुनाव का प्रबंधन हो या फिर रणनीतिक जिम्मेदारी पिछले कुछ सालों में छत्तीसगढ़ के नेताओं का बोलबाला बढ़ गया है। खूब पूछपरख हो रही है। नेताओं के हिस्से बड़ी जिम्मेदारियां आ रही हैं। नेता अपने साथ दूसरे राज्यों में क्या लेकर जाते हैं। यह तो नहीं मालूम, लेकिन हाड़ तोड़ मेहनत करते जरूर दिखते हैं। पसीने से भीगी शर्ट, धंसी हुई आंखें, कपड़ों की क्रीज का सिकुड़ जाना यह सब बताता है कि हमारे धुरंधर नेताओं ने खूब जोर लगाया है। फिलहाल असम और बंगाल के चुनाव में राज्य से गए सत्ताधारी दल के नेताओं ने खूब कसरत की है। नतीजे 4 मई को आएंगे। नतीजे पक्ष में आए, तो मेहनत को प्रमाण पत्र मिलेगा और न भी आए तो यह तो तय है कि पार्टी के भीतर उनकी मेहनत दर्ज कर ली जाएगी। इससे पहले झारखंड, बिहार के चुनाव में भी सत्ताधारी दल के नेताओं के परिश्रम ने पार्टी हाईकमान की वाहवाही लूटी थी। उधर विपक्षी दल में भूपेश बघेल इकलौते ऐसे चेहरे हैं, जिनके हिस्से बड़ी जिम्मेदारी आती रही है। जब वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज थे, तब से लेकर अब तक दिगर राज्यों के चुनावों में उन पर जिम्मेदारियों का बड़ा बोझ देखा जाता रहा है, हालांकि दूसरे नेताओं के हिस्से भी कुछ काम आते रहे हैं। कुल जमा बात इतनी सी है कि पार्टी चाहे कोई भी क्यों न हो छत्तीसगढ़ के नेताओं का अब कद बढ़ रहा है। 

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निशाने पर सौरभ सिंह

बंगाल चुनाव में छत्तीसगढ़ के नेताओं का जिक्र हो ही रहा है, तो तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा के X पोस्ट पर भी चर्चा जरूरी है। इस पोस्ट में उनके निशाने पर छत्तीसगढ़ से बंगाल गए भाजपा नेता सौरभ सिंह आ गए हैं। महुआ मोइत्रा ने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि – ‘सावधान रहे सौरभ सिंह… पार्टी प्रमुख नितिन नवीन भी आपको यहां बचा नहीं पाएंगे।’ अब महुआ मोइत्रा के इस पोस्ट पर होना जाना कुछ नहीं है, लेकिन यह जरूर है कि सौरभ सिंह यकायक चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। बंगाल चुनाव में सौरभ सिंह के हिस्से कई अहम जिम्मेदारियां रही हैं। अब जिम्मेदारियां क्या-क्या थी? यह तो मालूम नहीं, मगर महुआ मोइत्रा ने अगर उन पर सीधा हमला बोला है, तो यह समझ जाना चाहिए कि कोई बड़ी जिम्मेदारी ही रही होगी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कड़े शब्दों वाले पोस्ट में महुआ मोइत्रा ने एक तस्वीर साझा की है, जिसमें भाजपा नेता सौरभ सिंह नजर आ रहे हैं। इस तस्वीर में हाल ही में भाजपा में शामिल हुए टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस भी दिखाई दे रहे हैं। सौरभ सिंह नितिन नवीन के गुड बुक में हैं। नितिन नवीन उनके काम के तौर तरीकों से वाकिफ हैं और शायद यही वजह है कि उन्हें बंगाल जैसे बड़े राज्य के चुनाव में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। अब जब महुआ मोइत्रा जैसी तेजतर्रार सांसद ने उन्हें अपने निशाने पर लिया है, तो जाहिर है कि वह भाजपा आलाकमान के निगाह पर तो चढ़ ही गए होंगे। 

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आक्रोश नदारद

महिला आरक्षण संशोधन अधिनियम पारित नहीं होने पर राजधानी में भाजपा ने आक्रोश रैली निकाली, मगर आक्रोश रैली में आक्रोश नदारद देख पार्टी के आला नेताओं ने आंखें तरेर दी हैं। रैली में 15 हजार से ज्यादा भीड़ जुटाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन महज ढाई-तीन हजार लोग ही जुट पाए। राजधानी में भाजपा के 60 पार्षद हैं। अगर एक-एक पार्षद भी 100 लोगों को लेकर आता, तब भी 6000 की संख्या में भीड़ जुट सकती थी। रायपुर संभाग की सभी 7 विधानसभा सीटों पर भाजपा के विधायक हैं। अगर एक-एक विधायक 1000 की भीड़ जुटा लेते, तो 7000 लोग जुट जाते। निगम-मंडल और आयोग में पदस्थ नेताओं के हिस्से की भीड़ अलग। 15 हजार की भीड़ तो यूं ही जुट सकती थी। मगर भीड़ के साथ-साथ नेताओं की दिलचस्पी भी नदारद ही रही। सुनते हैं कि पार्टी ने इस मसले को बड़ी गंभीरता से लिया है। संगठन पुरोधाओं ने यह तक कह दिया है कि नेताओं की एक बैठक बुलाकर यह पता लगाया जाए कि रैली में भीड़ न आने की वजह क्या है? कार्यकर्ताओं ने आखिर दूरियां क्यों बनाई?  एक वरिष्ठ नेता से जब इसकी मालूमात हासिल की गई, तब कुछ और बात निकलकर बाहर आई। मालूम चला कि भीड़ नहीं आने के पीछे कार्यकर्ताओं की ‘नाराजगी’ एक बड़ी वजह रही। नेताजी ने बताया कि कार्यकर्ता यह कहते सुने गए कि हम सालों से पार्टी का झंडा बुलंद कर रहे हैं, लेकिन जब मलाई खाने की बारी आई, तब नए नवेले चेहरे पार्टी के ज्यादा करीब हो गए। चुनावी मौसम में ये नेता आते हैं। चमकते हैं और सेट हो जाते हैं। हमें फोटो में भी जगह नहीं मिलती। भूले भटके कभी मिल गई, तो उससे भी हमें क्राप कर दिया जाता है। कार्यकर्ताओं की नाराजगी गंभीर हो चली है। अभी तो सत्ता के ढाई साल भी पूरे नहीं हुए हैं। समय रहते इसका समाधान न ढूंढा गया तो ढाई बाद होने वाले चुनाव के वक्त कार्यकर्ताओं को कितने ही लड्डू क्यों न खिला दीजिएगा सत्ता की कुर्सी में फिसलन आ ही जाएगी। सो ज़िम्मेदारों की यही जिम्मेदारी है कि ऊंचे उड़ रहे नेताओं को थोड़ा ज़मीन पर लाइए और कार्यकर्ताओं से जुड़ने की हिदायत दे दीजिए। 

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