
मंत्रियों की पाठशाला (1)
यह बेहद आनंददायी खबर है कि हमारे माननीय मंत्रियों को आईआईएम में सुशासन का पाठ पढ़ाया जा रहा है। देश भर से आए विषय विशेषज्ञ मंत्रियों को ब्लैकबोर्ड पर चाक घिसकर या डिजिटल स्क्रीन पर समझा रहे हैं कि जनता की सेवा कैसे की जाती है। सुशासन महकमे की इस कोशिश की सराहना की जानी चाहिए। कम से कम इस तरह की पाठशाला से दो-चार मंत्रियों के ज्ञानचक्षु भी खुल जाए और अपने कामकाज में इस सीख को अमल में ले आए तो नतीजे बेहतर ही सामने आएंगे। खैर, आईआईएम की क्लास में मंत्रियों को पढ़ते देखने की तस्वीरें देखकर छाती गर्व से भर जाती है। हमारे नेताजी जो अमूमन दूसरों को ज्ञान देने के लिए जाने जाते हैं, वहां हाथ बांधकर सिर झुकाए किसी स्कूल के बच्चे की तरह बैठे हैं, लेकिन इन तस्वीरों को देखकर मन में एक दुष्ट और कुटिल सवाल बार-बार कुलबुला रहा है कि इस महाज्ञान का आखिर मंत्री जी करेंगे क्या? आइए आईआईएम में परोसे जा रहे इस ज्ञान और मंत्री जी की व्यावहारिक दुनिया के बीच के कुछ लॉजिस्टिक गैप को समझने की कोशिश करते हैं। आईआईएम में सिखाया जाता है – जवाबदेही (Accountability) और पारदर्शिता (Transparency)। राजनीति का बुनियादी उसूल कहता है कि फाइल को गोल-गोल घुमाना और ठीकरा दूसरों के सिर फोड़ना। अगर मंत्री जी आईआईएम के चक्कर में आकर सीधे फैसले लेने लगे, तो सालों से चला आ रहा सिस्टम बेकाबू हो जाएगा। सुशासन तो दूर कुशासन का पहिया भी जाम हो जाएगा। इसलिए अधिकांश मंत्री क्लास से मिले सर्टिफिकेट को फ्रेम करवाकर दफ्तर में टांग देंगे और काम पुराने मैनुअल तरीके से ही करेंगे। तो सवाल वही है, इस ज्ञान का होगा क्या? चिंता मत कीजिए, ज्ञान कभी बेकार नहीं जाता। अगली बार जब कोई मंत्री जी से बेरोजगारी, खस्ताहाल सड़कों, सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलने, उनकी मांगों को कूड़ेदान में डालने या अस्पतालों की दुर्दशा जैसे सवाल पूछेगा, तो मंत्री जी गुस्सा होने के बजाय मंद-मंद मुस्कुराएंगे। वो अपनी कुर्सी पर पीछे झुकेंगे और फिर आत्मविश्वास से कहेंगे, देखिए भाई साहब, आपका सवाल मैक्रो-इकोनॉमिक पर्सपेक्टिव से सही हो सकता है, लेकिन अगर आप रिसोर्स एलोकेशन और बॉटम ऑफ द पिरामिड के लॉजिस्टिक्स को समझेंगे, तो पाएंगे कि हमारी सस्टेनेबल ग्रोथ बहुत अच्छी है। सवाल पूछने वाले का सिर चकरा जाएगा।
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कथनी-करनी (2)
वैसे एक बात और है। मंत्रियों की पाठशाला में जब विषय विशेषज्ञ उन्हें KPI (Key Performance Indicators) और ROI (Return on Investment) जैसे कठिन शब्दावली से सुशासन का गणित समझाएंगे, तब मंत्री एक-दूसरे से खुसर-फुसर करते दिखते होंगे। यह पूछते कि भाईसाहब चुनाव में टिकट और वोट की बात कर रहे हैं क्या? अब जरा एक आभासी दुनिया में चलते हैं। आईआईएम की थ्योरी जब मंत्री जी के प्रैक्टिकल से टकराएगी तब क्या होगा? थ्योरी ये कहेगी कि कोई भी नीति बनाने से पहले डेटा का विश्लेषण करें, चार्ट्स और ग्राफिक्स देखें। मंत्री जी का विज्ञान कहेगा कि डेटा तो ठीक है साहब, लेकिन हमारे इलाके में किस जाति के कितने वोटर हैं। इसका डायग्राम आपके पास है क्या? हमारे लिए असली डेटा तो वो है, जो चुनाव जिताए। एक्सपर्ट्स मंत्रियों को जब सिखाएंगे कि क्राइसिस मैनेजमेंट के समय तुरंत जिम्मेदारी लें, पारदर्शी तरीके से संवाद करें और रूट काज का पता लगाएं। तब मंत्रियों का पारंपरिक तरीका सामने आ जाएगा कि कैसे संकट के वक्त वह एक जांच कमेटी बना देते हैं। जिसकी रिपोर्ट तब आती है, जब संकट खत्म हो चुका होता है। एक्सपर्ट जब कहेंगे कि योग्यता के आधार पर अपनी टीम तैयार करें, जो बेहतर रिजल्ट दें। तब मंत्री महोदय को ध्यान आएगा कि कैसे उन्होंने अपने साले साहब को टेंडर और सप्लाई का ठेका दे रखा है। अपने रिश्तेदार को ओएसडी बना रखा है। वफादार कार्यकर्ता को तबादले की जिम्मेदारी सौंप रखी है। बहरहाल यह अच्छी बात है कि सरकार मंत्रियों को सरकार चलाने के असली तौर तरीके सिखा रही है, लेकिन बुनियादी सवाल तो यही खड़ा होता है कि तौर तरीका सिखाना एक बात है और उसे अमल में लाना अलग।
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किसकी कटी नाक?
जब मैंने नकटी गांव में जमींदोज हुए घरों के संदर्भ में एक उच्च पदस्थ अफसर से वजह पूछी, तो उन्होंने तपाक से पलटकर सवाल किया, ‘अतिक्रमण की परिभाषा क्या है?’ मैंने उन्हें सहजता से जवाब दिया- ‘अतिक्रमण वह अवैध निर्माण या कब्ज़ा है, जो तब तक पूरी तरह वैध और अदृश्य रहता है, जब तक कि उस पर किसी रसूखदार की नजर न पड़ जाए।’ सरल शब्दों में कहें तो सरकार की नजर में अतिक्रमण की परिभाषा समय, व्यक्ति और परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती है। उन्होंने आंशिक तौर पर सहमति जताई। नकटी गांव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जब लोग अपनी जीवनभर की पूंजी लगाकर एक-एक ईंट जोड़ रहे थे, तब प्रशासन क्या सो रहा था? तब क्या प्रशासन की आंखों में मोतियाबिंद हो गया था। नजरें धूंधली हो गई थी, जो अतिक्रमण दिखाई नहीं दिया। प्रशासन ने अपनी नाक कहीं गिरवी रख दी थी, जो अतिक्रमण की सड़ांध उसे कभी महसूस नहीं हुई। वैसे इस घटना के बाद अतिक्रमण को लेकर प्रशासन का दोहरा मापदंड स्पष्ट तौर पर दिखाई दिया। अतिक्रमण को देखने का पैमाना गरीब के लिए अलग और रसूखदार लोगों के लिए अलग-अलग होता है ! इसी शहर की एक बड़ी पॉश कॉलोनी बसाने के लिए कॉलोनाइजर ने पूरी की पूरी नहर पाट दी? नहर की छाती पर आलीशान इमारतें खड़ी हो गईं, लेकिन तब प्रशासन का बुलडोज़र जंग खाता रह गया, क्योंकि वहां रहने वाले लोग रसूखदार और बड़े अफसर थे। शहर की एक और कॉलोनी ने प्रशासन की नाक की बिल्कुल सीधी रेखा में श्मशान घाट की जमीन निगल ली, मगर तब भी लोहे का दानव न गुर्राया, मगर आज नकटी में माननीय नेताओं का आशियाना सजाने के इरादे से लोहे के दानव की गर्जना गूंजी है। नकटी में जहां घरों की छतें जमींदोज हो गई है, वहां का आसमान पूरा नंगा कर दिया गया है। मलबे के बीच खड़े ग्रामीण पूछ रहे हैं कि जब अतिक्रमण था तो प्रधानमंत्री आवास योजना कैसे पहुंच गई? जल जीवन मिशन का पानी कैसे आ गया? राशन कार्ड कैसे बन गया? और नेताओं ने वोट की भीख कैसे मांग ली? गरीब सवाल पूछ रहा है। यह भूलकर कि कानून की चौखट पर उसका बोलना भी दंगा है। सुशासन सरकार बेशक अतिक्रमण हटाए। अतिक्रमण गैर कानूनी है। मगर नियत रसूखदारों और माननीयों की सहूलियत के लिए न हो। खैर, पूरी कार्रवाई के बाद एक सवाल गूंज रहा है कि नकटी में आख़िर नाक किसकी कटी?
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जमीनी समझ
अक्सर लोग पूछते हैं कि राजनीति में आने के लिए सबसे जरूरी योग्यता क्या है? पुराना जवाब था- समाजसेवा। नया और व्यावहारिक जवाब है- ‘ज़मीनी समझ’। हमारे एक माननीय विधायक इसी व्यावहारिक ज्ञान के पीएचडी होल्डर हैं। शहर की एक जमीन पर उनका दिल अटक गया है। उन्होंने जमीन मालिक के पास प्यार, पुचकार और थोड़े से अधिकार के साथ उसे खरीदने का प्रस्ताव भेजा था। मालिक ने सीधे-सीधे मना कर दिया। अब सत्तारूढ़ दल के नेताओं को ‘ना’ शब्द से वैसे ही एलर्जी होती है, जैसे चोर को पुलिस से। सो विधायक जी ने साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाई। थोड़ी जांच-पड़ताल हुई तो जमीन मालिक की एक कमजोरी हाथ लगी। पता चला कि उसका बेटा सरकारी अफसर है। बस विधायक जी का चेहरा खिल उठा। उन्हें समझ आ गया कि जो जमीन पैसे से नहीं मिल रही है, वो अब तबादले से मिलेगी। विधायक ने अपने रसूख़ से चौबीस घंटे के भीतर बेटे का तबादला ऐसे काले पानी वाले इलाके में करवा दिया, जहां परिंदा भी पर मारने से सोचता है। अब लाचार पिता बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ा होकर सत्तारूढ़ दल के आला नेताओं के दफ़्तरों के चक्कर काट रहा है। वह हाथ जोड़कर गुहार लगा रहा है कि जमीन भले ही चली जाए, लेकिन बुढ़ापे की लाठी (बेटा) उसके पास लौट आए। मगर ये बुज़ुर्ग शायद भूल रहे हैं कि आज की सियासत का नया नियम यही है, लाठी सिर्फ उसकी, जिसके हाथ में सत्ता की कमान है। आलाकमान के दफ़्तरों से उन्हें जो दिलासा मिल रहा है, उसकी कड़वी हकीकत बस इतनी सी है, बाबा, शुक्र मनाओ कि विधायक जी ने सिर्फ बेटे का तबादला कराया है। अगर उनकी भूख ज़रा और बड़ी होती, तो वो तुम्हारी आत्मा का ही शरीर से परमानेंट ट्रांसफर करा देते।
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मुखौटा
पूर्ववर्ती सरकार के दौर में तीन होटलों के गलियारे सत्ता और सियासत के सबसे बड़े गवाह रहे। एक होटल जो वीआईपी रास्ते पर शान से खड़ा था, दूसरा जो पुराने और नए शहर की सरहद को जोड़ता था और तीसरा, जिसके लिए सेंट्रल जेल का रास्ता पार करना पड़ता था। यह कोई छिपी बात नहीं थी कि कई बड़े विभागों के करोड़ों-अरबों के टेंडर इन्हीं होटलों के बंद कमरों और गलियारों से होकर तय होते थे। रसूखदारों, ठेकेदारों और अफसरों की महफिलें यहां आम थी। यहां तक कि एक होटल तो अफसरों की किस्म-किस्म की सीडी बनाने के काले कारनामों के लिए गाहे-बगाहे चर्चाओं के बाजार को गर्म रखता था। खैर, वक्त बदला, सरकार बदली लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या तौर-तरीके बदले? प्रशासनिक गलियारों में आज एक बार फिर वही पुरानी सुगबुगाहट तेज हो गई है। चर्चा है कि एक-दो होटल कारोबारी फिर से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। होटल व्यवसाय तो सिर्फ उनका एक मुखौटा है, असल खेल तो पिछले दरवाजे से बड़े-बड़े ठेके हथियाने और अपने रसूख के दम पर काम करवाने का चल रहा है। सूत्रों की मानें तो पड़ोसी राज्य के रास्ते सूबे के स्वास्थ्य महकमे में एक ऐसी कंपनी को लाने के इरादे से रेड कार्पेट बिछाया जा रहा है, जिसे खुद उस राज्य ने ब्लैकलिस्ट कर रखा है। सोचने वाली बात यह है कि जो कंपनी पड़ोसी राज्य में अपनी साख खो चुकी है, उसे हमारे राज्य के स्वास्थ्य महकमे में इतनी तवज्जो क्यों दी जा रही है? यदि इस आत्मघाती इरादे को अमलीजामा पहनाया गया, तो पहले से ही वेंटिलेटर पर चल रही स्वास्थ्य महकमे की साख पूरी तरह से मिट्टी में मिल जाएगी। समय रहते जिम्मेदारों को इस पर नकेल कस लेना चाहिए।
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ग्रहण
सूबे के पुलिस महकमे में बदलाव की अटकलें खत्म नहीं हो रही। यह ख़बर सुनाई पड़ती है कि आज-कल में तबादले की सूची जारी कर दी जाएगी। तबादले में तीन रेंज के आईजी समेत आधा दर्जन से ज्यादा जिलों के कप्तान बदले जाएंगे। मगर न जाने वह कौन सी शक्ति है, जो तबादले की सूची के आते-आते ग्रहण बनकर छा जाती है। उधर बदलाव की अटकलों के बीच उन अफसरों की धड़कनों की रफ़्तार बढ़ जाती है, जिनके नाम के सूची में शामिल होने की सबसे ज्यादा संभावनाएं हैं। सरकार के निर्णय लेने की गति बेहद सुस्त है। ख़ासतौर पर पुलिस महकमे में। पुलिस महकमे में अगर निर्णय की रफ़्तार सुस्त होगी तो वर्दी की रफ़्तार से उम्मीद बेमानी हो जाएगी। जब-जब महकमे में कोई बड़ा निर्णय किया जाता है, तब-तब एक नारियल विध्नहर्ता गणेश को चढ़ा आना चाहिए। विध्नों का नाश होगा और फैसले जल्दी होने लगेंगे। सुशासन सरकार में फैसलों में अड़चनें अच्छी बात नहीं है। कई जिले हैं, जहां एसपी ढाई साल पूरे कर चुके हैं। सात से ज्यादा जिलों में डीआईजी कप्तानी कर रहे हैं। पिछली मर्तबा ये हल्ला हुआ कि बस्तर आईजी के साथ तबादले की पूरी सूची बाहर आ जाएगी। मगर हल्ला तब थम गया जब अकेले बद्रीनारायण मीणा को आईजी बनाए जाने का आदेश जारी हुआ। खैर, सरकार के निर्णय पर सवाल कौन उठाए? सरकार का जब मन होगा, तब आदेश आएगा। मगर मन कब होगा? कुछ जिले प्रभार के भरोसे चल रहे हैं। भला प्रभार पर जिला चलता है। इतने लंबे समय तक के लिए।
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