
लाइजनर
सरकारी दफ़्तर के चक्कर काटकर-काटकर अगर आप थक चुके हैं या आपकी फाइल नियमों के बोझ तले सरकारी दफ्तर में धूल खाती पड़ी है, तब फौरन इस विधायक जी की शरण में आ जाइए। विधायक जी महज जनप्रतिनिधि भर नहीं है, वह जंग लगे प्रशासनिक ढांचे की मरम्मत करने वाले उम्दा कारीगर हैं। नए दौर की खड़ी भाषा में कहा जाए तो लाइजनर। सूबे के बड़े साहब के दफ़्तर की दहलीज को वक्त-बेवक्त नापने का हुनर सिर्फ़ उन्हीं के पास है। सुबह हो या ढलती शाम विधायक जी बड़े साहब के सामने अचानक ऐसे प्रकट होते हैं, जैसे बिन बुलाए मेहमान। बड़े साहब भी जानते हैं कि विधायक किस मकसद से उनकी चौखट पर आते हैं। वैसे विधायक जी की असली पहचान उनके कुर्ते की जादुई जेब है। उस जेब से जनहित का कोई मसौदा निकले न निकले, लेकिन भगवान का प्रसाद जरूर निकल आता है। यह वह दिव्य प्रसाद है, जिसका आचमन करते ही कड़े नियमों से बंधे बड़े साहब का मूड अचानक धार्मिक हो जाता है और कई-कई बार विधायक इसका फायदा उठाकर अटकी हुई फाइल को सरपट दौड़ लगाने का फार्मूला ढूंढ लेते हैं। राजनीति के पंडित भले नैतिकता का ज्ञान झाड़ते रहे, मगर हमारे विधायक जी ने लाइजनिंग को एक कला बना दिया है। वे सिस्टम रूपी जंग लगे ताले की वह मास्टर-की हैं, जो प्रसाद से रुकी हुई फाइलों को मोक्ष दिला देते हैं।
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सांसद वर्सेस अफसर
बीते हफ्ते एक चिट्ठी की गूंज खूब सुनाई दी। दिल्ली तक हलचल तेज हो गई। रसूखदार सांसद और दबंग अफसर के बीच का कुछ मसला था। इस मसले में लोगों ने मसाला डालकर खूब चटकारा लिया। बंद कमरे की गुफ्तगू की मालूमात भी हासिल कर लेते, तो सच बाहर आ जाता। खैर, एक और सांसद महोदय की चिट्ठी दिल्ली पहुंची। चिट्ठी में शिकायती लहजे में जो कुछ भी लिखा गया हो असल बात यह है कि दो अलग-अलग नगर निगमों के अफसरों ने सांसद महोदय के निर्देशों को कूड़ेदान में डाल दिया। एक नगर निगम के अफसर इसलिए रडार पर आ गए क्योंकि सांसद महोदय के जन्म दिन के कार्यक्रम में खर्च होने वाली राशि के भुगतान के लिए उन्होंने दो टूक जवाब देते हुए कह दिया कि निगम में तनख्वाह बांटने तक के पैसे नहीं हैं। जन्मदिन का खर्चा नहीं उठा पाऊंगा। सांसद ने फटकार लगाते हुए पूछा- विधायक के कार्यक्रम के लिए पैसा कहां से आ जाता है? गुस्से से भर उठे सांसद ने कह दिया कि देखता हूं तुम यहां कैसे रहते हो? अफसर ने तपाक से कहा- आप सक्षम हैं, चाहे तो हटवा दें। एक दूसरे नगर निगम के अफसर से जुड़ी कुछ ऐसी ही कहानी है। सांसद ने अपने एक करीबी को काम देने की सिफारिश की थी। अफसर ने कह दिया- मैं कुछ नहीं हूं। फलाने मंत्री का आदमी ही पूरा नगर निगम चलाता है। मेरे हाथ में कुछ नहीं। सांसद भड़क गए और अफसर ठिठक कर रह गए। फिलहाल दोनों नगर निगम के अफसरों के नाम शिकायती चिट्ठी दिल्ली पहुंच गई है। शायद सांसद महोदय का भरोसा सूबे की सरकार और अपनी पार्टी के फोरम पर से डगमगा गया है, इसलिए नगर निगम के अफसरों तक की शिकायत दिल्ली से कर रहे हैं। रूलिंग पार्टी के चुने हुए जनप्रतिनिधि और प्रशासन चलाने वाले अफसर रेल की दो पटरी की तरह हैं। समानांतर चलते रहे तो बेहतर है। एक का भी उखड़ जाना पूरी की पूरी व्यवस्था को भरभराकर गिराने के लिए काफी है।
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कड़वी सच्चाई
सरकार का काम जानना हो तो कहीं भटकने की जरूरत नहीं, बस किसी माननीय के सोशल मीडिया हैंडल के कमेंट्स खंगाल लीजिए। एक तरफ जहां भारी-भरकम बजट वाली सोशल मीडिया टीमें पोस्ट के जरिए दिन-रात तारीफों के पुल बांधती हैं, वहीं दूसरी तरफ उन पोस्ट के कमेंट सेक्शन में आए कमेंट्स उन्हें जमीनी हकीकत का पर्चा थमा देते हैं। माननीयों को लगता है कि हर रोज़ फीता काटने, जन्मदिन-शादी की औपचारिक बधाइयां देने और चुनिंदा कार्यक्रमों की चमकदार तस्वीरें पोस्ट करने से उनकी छवि एकदम चमक जाएगी, लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं पड़ता। वैसे सोशल मीडिया का झंझट कुछ साल पहले तब शुरू हुआ था, जब भाजपा हाईकमान ने सांसद, विधायक और संगठन के पदाधिकारियों के लिए सोशल मीडिया पर फालोअर्स बढ़ाने का एक पैमाना तय किया था। सभी माननीय इस डिजिटल भेड़चाल में कूद पड़े। हर दिन स्क्रीन पर फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम के बढ़ते आंकड़ों पर टकटकी लगाए बैठे रहते और संख्या बढ़ते ही ढोल नगाड़े पीटकर जश्न मनाते। माननीयों को लगने लगा था कि उनकी लोकप्रियता वर्चुअल फालोवर की संख्या बता रही है। उन्हें क्या पता था कि जिस डिजिटल भीड़ को वे अपनी ताकत समझ रहे थे, वही एक दिन उनके लिए जी का जंजाल बन जाएगी। संख्या तो बढ़ गई, लेकिन इसके साथ ही हर छोटे बड़े मुद्दे पर लोगों का सीधा सवाल और तीखा जवाब भी उनके दरवाजे तक पहुंच गया। मुद्दे की बात यह है कि माननीयों को अगर वास्तव में इस डिजिटल मौजूदगी का कोई फायदा उठाना है, तो सिर्फ वाहवाही से काम नहीं चलेगा। माननीयों को अपनी सोशल मीडिया टीमों के जरिए कमेंट्स में आने वाली आलोचनाओं और शिकायतों का एक व्यवस्थित डेटा तैयार करना होगा। जब तक इन कमियों को चिन्हित कर जमीन पर सुधारा नहीं जाएगा, तब तक सोशल मीडिया का यह भारी भरकम बजट दिखावे के अलावा कुछ नही रह जाएगा। है तो कड़वी सच्चाई। मान लिए तो ठीक है, वरना जय राम जी की।
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साख
बीते हफ्ते एक आईपीएस अफसर पर एक करोड़ की रिश्वत मांगने का ताजातरीन आरोप लगा और सूबे की खाकी बिरादरी एक बार फिर कटघरे में खड़ी हो गई। रिश्वत लेने के आरोप पर उच्च पदस्थ अफसरों ने आईपीएस की भूमिका को खारिज कर दिया है। इस मामले में कोर्ट क्या करेगा? फिलहाल नहीं मालूम। खैर, यह पहला मौका नही है, जब बिरादरी के किसी अफसर पर आरोप लगा हो। बीते कुछ सालों में आईपीएस बिरादरी इस किस्म के आरोपों से टकराती रही है। यह बात भी गलत नहीं है कि चंद होनहार अफसरों के कारनामों के बूते सूबे की आईपीएस बिरादरी पर दाग लगता रहा है। वैसे इन होनहारों के कारनामों का बिल पूरी बिरादरी के नाम पर फाड़ा जाना उचित नहीं, मगर सच यह भी है कि बीते कुछ सालों में कुछ खाकीधारियों ने अपनी निष्ठा और साख की खुले बाजार नीलामी की है। मुठ्ठी भर अफसर दहलीज लांघ जाते हैं और हमला पूरी बिरादरी पर होने लगता है। दिल्ली में पदस्थ दूसरे कैडर से आने वाले एक आईपीएस अफसर कहते हैं- दरअसल मूल बात ये है कि छत्तीसगढ़ का कैडर साइज छोटा है। कुल कैडर के अनुपात में मुठ्ठी भर अफसर भी अपनी साख की नीलामी कर लें तो प्रतिशत में यह आंकड़ा किसी बड़े कैडर की तुलना में ज्यादा दिखता है। उत्तरप्रदेश जैसे बड़े सूबे का उदाहरण ले लीजिए। वहां साढ़े पांच सौ से ज्यादा आईपीएस अफसरों का लश्कर है। अगर आधा-एक दर्जन साहब बहक भी जाएं या जांच एजेंसियों के रडार पर आ जाएं, तो यह आंकड़ों के लिहाज से कुल कैडर का महज एक-दो फीसदी ही होगा। बड़ा कैडर चंद अफसरों पर लगने वाले दाग को यूं चुटकी में हजम कर जाता है। पूरी बिरादरी पर संकट नहीं आ जाता, लेकिन छत्तीसगढ़ का मामला अलग है। कुल जमा 133 अफसरों का छोटा सा कुनबा है। अब इस छोटे से कुनबे से अगर पांच-दस साहबों का नाम किसी घपले घोटाले में आ जाए तो गणित बड़ा आंकड़ा सामने रख देता है। अब इसे खाकी की बदकिस्मती कहें या छोटे कैडर का साइज इफेक्ट। बड़े राज्यों में जिन मसलों को अपवाद मानकर दबा दिया जाता है, हमारे यहां वहीं आंकड़ा प्रतिशत में इतना भारी दिखता है कि लगता है कि सिस्टम का एक बड़ा हिस्सा कमीशन मोड पर चल रहा है। आबादी के हिसाब से शायद हम छोटे राज्य हो, लेकिन साख पर धब्बा लगाने के प्रतिशत के खेल में हमारे चंद साहबानों ने बड़े-बड़े राज्यों को पीछे धकेल दिया है।
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जीरो पेंडिंग केस !
ईओडब्ल्यू में बरसो पुराने धूल खाते पड़े प्रकरणों की फाइल दोबारा खुल रही है। हाल ही में ईओडब्ल्यू ने 21 साल पुराने चावल घोटाले के एक मामले में 40 हजार पन्नों का चार्जशीट कोर्ट में पेश किया है। इसी तरह नगरीय प्रशासन विभाग के एक चीफ इंजीनियर के खिलाफ 1500 पन्नों का चार्जशीट पेश किया गया है। ईओडब्ल्यू राज्य की एक बड़ी जांच एजेंसी है, जो भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करती है। अच्छी बात है कि बरसो पुराने मामलों की सुध ली गई है। फाइलों को कब्र से निकाला गया है। ना भी निकालते तो क्या हो जाता? पड़ी रह जाती। इतने सालों से अफसर आते-जाते तो रहे, लेकिन पुराने मामलों को उधेड़ना किसी को रास नहीं आया। शायद कुछ अफसरों ने सोचा होगा कि गर्म छड़ी को हाथ लगाना ठीक नहीं और कुछ ने सोचा होगा कि फिजूल में आखिर पसीना क्यों ही बहाया जाए? ना जाने क्यों ईओडब्ल्यू के मौजूदा चीफ अमरेश मिश्रा गर्म छड़ी उठाने निकल पड़े हैं। सुना है कि उन्होंने दो टूक कह दिया है कि ईओडब्ल्यू के सभी पुराने प्रकरणों को खोलकर उनका खात्मा किया जाए। वैसे एक दफे पॉवर सेंटर के इस कालम में हमने यह बताया था कि सूबे के कुल 174 आईएएस, 135 आईपीएस और 111 आईएफएस अफसरों के कुल जोड़ यानी 420 अफसरों में से 50 अफसरों के खिलाफ भी ईओडब्ल्यू-एसीबी में मामले दर्ज है। यानी आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों की कुल संख्या का करीब 12 फीसदी। अब जाहिर है, जब ईओडब्ल्यू को जीरो पेडिंग केस वाली एजेंसी बनानी है, तो इन 50 अफसरों के प्रकरण भी खत्म करने होंगे। ईओडब्ल्यू चीफ जुनूनी अफसर हैं। उनके रहते हो भी जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।
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वन-विवाद
वन विभाग में बीते हफ्ते जारी हुआ एक बहुप्रतीक्षित ट्रांसफर ऑर्डर महकमे के भीतर गहरी खींचतान और प्रशासनिक उलझनों का सबब बन गया है। इस आदेश में 2022 बैच के एक आईएफएस अफसर का नाम शामिल है। महज एक साल के भीतर यह उनका तीसरा ट्रांसफर है। हालिया ट्रांसफर आर्डर आने के बाद उन्होंने नए डीएफओ को चार्ज तो सौंप दिया, लेकिन इस आर्डर को असंवैधानिक और मनमाना बताते हुए सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) का दरवाजा खटखटाया दिया। कैट ने मामले की सुनवाई करते हुए अफसर की यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया। हालांकि कैट के स्टे ऑर्डर की तामील होती, उससे पहले ही नए डीएफओ ने जल्दबाजी दिखाते हुए उन्हें रिलीव कर दिया। अब प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि नए आए डीएफओ के पास पूर्व अफसर को रिलीव करने का कोई विधिक अधिकार नहीं था। बावजूद इसके उन्होंने रिलीव कर दिया। नियम कायदों को दरकिनार कर की गई इस जल्दबाजी ने पूरे वन महकमे को असहज स्थिति में डाल दिया है। महज 5 साल की कुल सेवा वाले एक युवा अफसर का एक ही साल में तीन-तीन बार ट्रांसफर करना और जब वे अपने अधिकार की कानूनी लड़ाई लड़कर राहत पाने में सफल रहे, तो नियमों को ताक पर रखकर आनन-फानन में रिलीव कर देना प्रशासनिक प्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। फिलहाल यह पूरा घटनाक्रम वन विभाग के लिए गले की फांस बन चुका है।
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