Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

रसूख

लोकतंत्र की विशाल इमारत दो मजबूत खंभों पर टिकी है। एक जनता का चुना हुआ जन-प्रतिनिधि और दूसरा सिस्टम को चलाने वाला अफसर, लेकिन जब इन दोनों खंभों के बीच अहम का टकराव होने लगे तो पूरी की पूरी व्यवस्था भरभराकर गिरने लगती है। छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ सांसद का अफसर के रवैये से आहत होकर विशेषाधिकार समिति का दरवाजा खटखटाना इसी खिंचाव की एक दिलचस्प बानगी है। सांसद का दर्द अपनी जगह जायज है। आखिर जनादेश लेकर आए जनप्रतिनिधियों को अगर अफसर तवज्जो न दें या प्रोटोकॉल का पालन न करें तो यह सीधे-सीधे उस जनता का अपमान है जिसने उन्हें चुनकर भेजा है। सवाल बड़ा वाजिब है, जब साहबान सांसदों के फोन काल को ही गंभीरता से नहीं ले रहे हो, तो कतार में खड़े उस आम आदमी की अर्जियों का क्या होता होगा? सत्ताधारी दल के एक वरिष्ठ नेता इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहते हैं कि आखिर अफसरों को यह याद दिलाना बहुत जरूरी है कि वे लोक सेवक हैं, लोक मालिक नहीं। जब साहबान सांसद के फोन को वेटिंग में डाल सकते हैं। ”जो करना है कर लो…” वाले अंदाज में हाजिर जवाब दे सकते हैं, तो आम तबके की उनके सामने क्या ही बिसात होगी? बहरहाल अफसर के व्यवहार से सांसद की गरिमा को जरा सा खरोंच लगा, तो उन्होंने दिल्ली की विशेषाधिकार समिति तक की राह चुटकी में नाप दी गई। यह तो रहा एक स्याह पक्ष, लेकिन दूसरे पक्ष की चर्चा भी जरूरी है। अफसर ने सांसद के सामने झुकने वाली मुद्रा नहीं दिखाई, आमतौर पर जैसे राजनीतिक व्यवस्था के आगे सरकारी नियम कायदों को झुका दिया जाता है। अफसरशाही का अपना फलसफा है। अफसर बिरादरी यह मानती है कि नियम कायदों से भरी सरकारी फाइलें सलामी से नहीं चलती वह उनके दस्तखत से चलती है। फिर भी इस मामले में टकराव राजनीति और अफसरशाही के दो मजबूत किरदारों के बीच हुआ है। देखा जाए तो यह लड़ाई राज्य के विकास के मसले पर नहीं है, कुर्सी के रसूख को लेकर है। 

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रिश्वत

सूबे के एक ट्रेनी आईपीएस अधिकारी पर एक-दो लाख नहीं, बल्कि पूरे एक करोड़ रुपये की रिश्वत मांगने का संगीन आरोप लगा है। मामला अब महज गलियारों की चर्चा तक सीमित नहीं रहा। शिकायतकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई की विशेष अदालत ने बाकायदा राज्य के डीजीपी को नोटिस जारी कर दिया है। आरोप है कि रिश्वत का यह बड़ा लेन-देन हवाला के जरिए किया गया। अपनी बात को साबित करने के लिए शिकायतकर्ता ने कोर्ट की मेज पर व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग का पुलिंदा रख दिया है। मामला सुर्खियों में आते ही अब दो अलग-अलग थ्योरी सतह पर तैरने लगी है। एक ट्रेनी आईपीएस के बचाव में खड़ी दिखती है, तो दूसरी उनके खिलाफ। पहली थ्योरी के मुताबिक ट्रेनी आईपीएस ठगी के एक बड़े गिरोह की तह तक पहुंच चुके थे। ठगी के इस खेल से एक ऐसे फर्म ने मोटा मुनाफा कमाया था जिसके तार बड़े रसूखदारों से जुड़े थे। जैसे ही युवा अफसर ने इस गठजोड़ पर नकेल कसी उसे रास्ते से हटाने का खेल शुरू हुआ। कहा जा रहा है कि आईपीएस अफसर को पहले भारी-भरकम रकम की पेशकश की गई, फिर गुजरात के किसी मंत्री और एक वरिष्ठ आईपीएस से फोन करवाकर दबाव बनाया गया। जब ट्रेनी आईपीएस ने घुटने टेकने से इनकार कर दिया, तो उन्हें फंसाने के लिए रिश्वत का यह पूरा ताना-बाना बुन दिया गया, लेकिन दूसरी थ्योरी की कहानी बिल्कुल उलट है, जो उन पर लगे आरोप की जड़ों को मजबूत बनाती दिखती है। इस थ्योरी के मुताबिक ठगी का मामला सामने आते ही ट्रेनी आईपीएस ने जांच के लिए अपनी टीम गुड़गांव भेजी थी। वरिष्ठ अधिकारियों ने इसे सामान्य रूटीन कार्रवाई माना था, लेकिन पर्दे के पीछे कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी। आरोप है कि वहां न केवल राहत देने का बड़ा सौदा हुआ, बल्कि हर महीने के लिए पेशगी की शर्त भी रख दी गई। जब सौदेबाजी हद से बाहर निकल गई तब यह मामला अदालत की दहलीज तक पहुंच गया। फिलहाल ट्रेनी आईपीएस जिस इलाके में तैनात हैं, वहां के उच्च पदस्थ अफसरों ने इस पूरे मामले से दूरी बना ली है। न तो कोई उनके बचाव में बयान दे रहा है, न ही खुलकर विरोध में हैं। यह रहस्यमयी खामोशी कई सवाल खड़े करती है। सच क्या है, यह तो जांच के तराजू पर ही तौला जाएगा, लेकिन इतना तय है कि अगर धुआं उठा है, तो चिंगारी कहीं न कहीं जरूर सुलगी होगी।

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सब्र किसे है?

हाल के सालों में प्रशासनिक गलियारों का नजारा काफी बदल गया है। यूपीएससी की परीक्षा पास करते वक्त जो देश सेवा और ईमानदारी का निबंध लिखा जाता है, उसकी मियाद ट्रेनिंग खत्म होने के साथ ही पूरी मान ली जाती है। बेशक हर किसी को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता, लेकिन नए जमाने के कुछ होनहार रंगरूटों ने जिस तरह ड्यूटी जॉइन करते ही मैदान मारने की फुर्ती दिखाई है, उससे पुराने भ्रष्टाचारियों में भी हीन भावना आने लगी है। पहले के दौर में अफसरों के पास एक पेशेंस पीरियड होता था। साहब लोग नौकरी के शुरुआती 10-12 साल अपनी साख और इंटीग्रिटी बनाने में लगाते थे, ताकि बाद में अगर कोई छोटा-मोटा जुगाड़ भी हो, तो पुरानी साख का पर्दा ढका रहे। मगर आज की जनरेशन इंस्टेंट कॉफी और 2 मिनट नूडल्स वाली है। यहां सब्र किसे है? आज के फास्ट-ट्रैक रंगरूट सर्विस में पहला कदम ही किसी बड़े बिजनेस प्लान की तरह रखते हैं। उनका सिद्धांत बड़ा साफ है कि शुरुआती सालों में ईमानदारी दिखाकर समय क्यों बर्बाद करना? जो वसूलना है, डे-वन से ही वसूलिए! नए नए आए रंगरूट ये जताने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं कि मसूरी और हैदराबाद की अकादमियों में उन्हें एथिक्स के साथ-साथ एसेट क्रिएशन का हिडन कोर्स भी पढ़ाया जाता है ! फील्ड में उतरते ही साहबों का एक ही फलसफा होता है, पहली बाल पर ही छक्का मार लें।

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बकाया

सरकारी बकाये की वसूली का एक मामला इन दिनों गलियारों में जबरदस्त सुर्खियां बटोर रहा है। मामला कांग्रेस के एक दिवंगत पूर्व विधायक के साहबज़ादे और एक सरकारी अफ़सर के बीच छिड़ी सीधे टकराव की दास्तान है। पूरा वाकया तब शुरू हुआ जब विभाग ने दिवंगत नेता के बेटे को सरकारी खजाने में एक भारी-भरकम रकम जमा करने का फरमान थमा दिया। विरासत में सियासत सीखे साहबजादे सीधे दफ्तर पहुंचे और अफसर की मेज पर ही बकाये रकम के गणित की धज्जियां उड़ा दी। तर्कों में इतना दम था कि अफसर को मजबूरी में बैकफुट पर आना पड़ा और तय किया गया बकाया रकम घट कर आधा हो गया, लेकिन असली ड्रामा इसके बाद शुरू हुआ। अफसर ने घटी हुई रकम तुरंत चुकाने की ताकीद की, तो साहबजादे ने साफ मना कर दिया। अफसर भी अपने ओहदे की ऐंठ में अड़ गए कि वसूली तो हर हाल में होगी। जब साहबजादे ने भांप लिया कि प्रशासनिक मिजाज में ढील की गुंजाइश नहीं है, तो उन्होंने अपना सबसे जहरीला राजनीतिक तीर छोड़ा। सीधी बहस छोड़कर उनकी नजर अफसर की कलाई पर टिक गई। कमरे के सन्नाटे को चीरते हुए उन्होंने सीधा हमला बोलते हुए कहा कि दो लाख की सैलरी पर लाखों की घड़ी? हुज़ूर आप बकाये का हिसाब मांग रहे हैं या अपनी कलाई में कीमती घड़ी सजाकर कमाई का राज बता रहे हैं? मालूम चला कि कमरे में बात इतनी बिगड़ गई कि मामला एक कद्दावर राजनेता तक पहुंच गया जिन्होंने आनन-फानन में बीच-बचाव कर सुलह कराई, लेकिन तीर कमान से निकल चुका था। अफसर की कलाई और साहबजादे का यह करारा वार अब पूरे व्यापारी समाज में एक चटपटे सवाल के साथ गूंज रहा है कि बकाया तो बाद में जमा होगा, इससे पहले महंगी घड़ी का हिसाब कौन देगा? 

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‘मोक्ष’ के रास्ते

एक कॉर्पोरेशन ने उपकरण आपूर्ति के लिए टेंडर आमंत्रित किया। ‘मोक्ष’ के रास्ते कदम बढ़ा रही एक कंपनी को लगा था कि वह नहले पर दहला मारकर टेंडर हथिया लेगी, लेकिन डाक्युमेंट वेरिफिकेशन में वह पिछड़ गई। चालाक कंपनी को इस अंदेशे का अहसास पहले से था, इसलिए उसने अपनी एक शैडो कंपनी को भी कतार में खड़ा कर रखा था। इस बीच पंजाब और दिल्ली के रास्ते एक दूसरी कंपनी ने भी टेंडर में दांव ठोक दिया, जो देशभर में उपकरणों की आपूर्ति के लिए जानी जाती है। नियमानुसार यदि इस नई कंपनी के कागजात सही पाए जाते, तो शह-मात का खेल रचने वाली स्थानीय कंपनी रेस से बाहर हो जाती। खतरे को भांपते ही शह-मात के खिलाड़ी सक्रिय हो गए। बाहरी कंपनी के प्रतिनिधियों को कॉर्पोरेशन के चेयरमैन के दफ़्तर में तलब किया गया। चेयरमैन साहब मूकदर्शक बने रहे और उनके सामने ही स्थानीय कंपनी के कर्ताधर्ता ने बाहरी कंपनी के लोगों को जमकर हड़काया। कहा जा रहा है कि कल तक जिस स्थानीय कंपनी की हैसियत जर्रे बराबर नहीं थी, उसने अब पूरे महकमे को अपनी मुट्ठी में कसना शुरू कर दिया है। विभाग में यह चर्चा आम है कि टेंडर चाहे कोई भी भरे, सप्लाई की असली कमान यही स्थानीय कंपनी अपने पास रखना चाहती है। सत्ता के गलियारों में बैठे जिम्मेदार शायद इतिहास भूल चुके हैं। पूर्ववर्ती सरकार के दौरान भी इसी तर्ज पर मोक्ष का सपना देखने वाली एक कंपनी के कर्ताधर्ता को मोक्ष तो नहीं मिला, सलाखों की हवा जरूर मिल गई थी। सुशासन का इकबाल बुलंद करने का दावा करने वाली सरकार के लिए इस किस्म की अराजकता एक बड़ा धब्बा है। समय रहते अगर जिम्मेदारों की नींद नहीं खुली, तो तंत्र को घुन की तरह चाट रहे ये कीड़े पूरे महकमे को निगल जाएंगे।

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नकेल

सरकारी तंत्र में सुशासन का दायरा जितना व्यापक होता जाएगा, अफसरशाही की मनमानी पर नकेल उतनी ही कसती चली जाएगी। सूबे के सुशासन विभाग की आनलाइन सेवाओं ने सरकारी दफ्तरों में बरसों से चले आ रहे अवैध कमाई के तय ढर्रे को भीतर तक हिलाकर रख दिया है। इस पूरी कवायद के केंद्र में सिर्फ और सिर्फ आम आदमी है। सीधा गणित है, अगर नागरिक को सहूलियत मिलेगी, तो रिश्वतखोरी की जमीन अपने आप खिसक जाएगी। आम आदमी का रास्ता जितना सुगम होगा, बिचौलियों और भ्रष्ट तंत्र की जेबें उतनी ही खाली होती चली जाएंगी। सूबे में भी हालिया शुरू हुई कुछ आनलाइन सेवाओं ने आम आदमी के हिस्से बड़ी राहत दी है। जो काम पहले सिफारिशों और चढ़ावे के बिना नहीं होते थे, वे अब एक क्लिक पर निपट रहे हैं। इसके उदाहरण हमारे आसपास ही बिखरे पड़े हैं। महीनों से एफआईआर दर्ज कराने के लिए दर-दर भटक रहे एक हताश युवा ने जब थक हारकर सीएम हेल्पलाइन में शिकायत की, तो तंत्र ऐसा जागा कि पलक झपकते ही एफआईआर दर्ज हो गई। दो साल से ड्राइविंग लाइसेंस में पता बदलवाने के लिए दफ्तरों की धूल छान रहा एक अन्य युवा प्रशासनिक जटिलताओं में उलझा था। उसने ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई और महज तीन दिन में उसका काम हो गया। राशन कार्ड के लिए अब कतारों में लगने की ज़रूरत नहीं रही, घर बैठे आवेदन हो रहा है। ड्राइविंग लाइसेंस, जाति और आय प्रमाण पत्र बनवाने के लिए चक्कर काटने के दिन अब इतिहास बनते जा रहे हैं। मैन्युअल और पारंपरिक ढर्रे का एक ही कड़वा सच था, जब तक जेब ढीली न हो, बात आगे नहीं बढ़ती थी। हर खिड़की पर एक नई अड़चन और हर मेज पर एक नया बिचौलिया मुस्तैद रहता था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। सरकारी सेवाएं जितनी ऑनलाइन और पारदर्शी होंगी, अफसरों का अकारण हस्तक्षेप उतना ही घटता चला जाएगा। भ्रष्टाचार की गुंजाइश अपने आप खत्म हो जाएंगी। 

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डेपुटेशन

उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर वरुण जैन सेंट्रल डेपुटेशन पर एनआईए जा रहे हैं। सूबे में यह पहली बार है जब एक वन महकमे के अफसर का डेपुटेशन एनआईए में हो रहा है। जैन के डेपुटेशन पर जाने से वन महकमे में तबादले की एक छोटी सूची जल्द आएगी। 2017 बैच के आईएफएस अधिकारी वरुण जैन ने फरवरी 2022 में उदंती-सीतानादी टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर का कार्यभार संभालने के बाद अतिक्रमण और अवैध शिकार पर कड़ा रुख अपनाया था। ओडिशा सीमा से सटे इस क्षेत्र में तस्करों, शिकारियों और अतिक्रमणकारियों के गठजोड़ के कारण वन और वन्यजीवों को भारी नुकसान पहुंच रहा था। बेदखली से बचने के लिए अतिक्रमणकारियों ने बीआर अंबेडकर की प्रतिमा लगाई थी। इसके जवाब में वरूण जैन ने संविधान के अनुच्छेद 48ए का बोर्ड लगा दिया था। वैध दस्तावेज न मिलने पर जब बेदखली के नोटिस जारी किए गए तब यह मामला अदालत पहुंचा। आईएफएस वरूण जैन ने इसरो के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र से प्राप्त 2008-2010 और 2022 की उपग्रह तस्वीरें प्रस्तुत की। इससे साबित हुआ कि घने जंगलों में अतिक्रमण 2010-12 के बाद शुरू हुआ था। साक्ष्यों के आधार पर उच्च न्यायालय ने वन विभाग के पक्ष में फैसला दिया था।

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लेट रिस्पांस

कांकेर में भालू के हिंसक हमले के दौरान वन विभाग के बेहद लचर और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार ने बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की है। घटना के समय और उसके बाद मचे बवाल पर पूरी तरह निष्क्रिय रहने के आरोप में कांकेर के डीएफओ रौनक गोयल को हालिया तबादले में हटा दिया गया। सरकार की नाराजगी इस बात को लेकर रही कि जब बीमार शावक की मौत से बौखलाई मादा भालू ग्रामीणों को नोंच-नोंचकर अपना शिकार बना रही थी, तब सूचना मिलने के बावजूद डीएफओ ने बेहद लेट रिस्पांस किया। इसके बाद गुस्साए ग्रामीण भालू को लाठी-डंडों से पीट-पीटकर मार रहे थे, तब भी वन महकमे की सक्रियता नहीं दिखी। वन अफसरों का लेट रिस्पांस दो बेगुनाह ग्रामीणों और भालू की मौत की वजह बन गया। लगता है कि सरकार अब समझ रही है कि जितनी इंसानी जिंदगी मायने रखती है, वन्य जीवों की जिंदगी के मायने भी उतने ही हैं। अच्छा होगा अगर इस तरह की कार्रवाई के बाद वन महकमे के अफसर और सतर्क हो जाएं। 

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