Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

चाय चर्चा

घोटालों की फेहरिस्त में नई कड़ियां जोड़ रही एक केंद्रीय जांच एजेंसी की रफ्तार सुस्त पड़ती फिलहाल नहीं दिख रही। खबर मिली है कि इस बार एजेंसी का न्योता पूर्ववर्ती सरकार के दौरान मुख्यमंत्री सचिवालय संभाल चुके कुछ कद्दावर अफसरों तक पहुंचा है। चर्चा तो यह भी है कि सेंट्रल जांच एजेंसी की चाय पीने एक पूर्व मुख्य सचिव भी शरीक हुए थे। मतलब बुलाए गए थे। दरअसल जांच एजेंसी को शराब घोटाले का पुराना हिसाब-किताब समझना था। सुबह 10 बजे शुरू हुई चाय पर चर्चा रात 9 बजे तक अनवरत चलती रही। बातचीत में क्या छनकर निकला इसका ब्यौरा तो बाहर नहीं आया पर 11 घंटे चली चाय की चुस्की के बाद यह तो तय हो गया कि बात बहुत गहरी थी या फिर बात को जानबूझकर गहरा बना दिया गया! बहरहाल पुराने घोटालों की जांच को मध्यम आंच पर सिमटते कौन देखना चाहता है? सो एजेंसियां भी कोई न कोई नया पैंतरा आजमाती रहती हैं ताकि सुर्खियों के बाजार में घोटालों का जायका हमेशा गरमा गरम बना रहे।

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मुकर गए

किस्म-किस्म के घोटालों की तह तक पहुंचने की जुगत में लगी एक एजेंसी ने इस बार एक नया दांव चला। सलाखों के पीछे कैद रसूखदार आरोपियों को आमने-सामने बिठा दिया गया। कुछ पुराने बाशिंदे थे, तो कुछ हाल ही में पहुंचे नए मेहमान। एजेंसी को उम्मीद थी कि जब आंख से आंख टकराएगी, तो उस टकराव की चिंगारी से कोई न कोई हलचल ज़रूर पैदा होगी। झूठ का आवरण टूटेगा। मगर वहां जो हुआ, उसकी कल्पना एजेंसी ने भी नहीं की थी। आरोपियों की आंखें जैसे पूरी तरह सूख चुकी थीं। कल तक जो एक-दूसरे के हमप्याला और हम निवाला हुआ करते थे, उन्होंने एक-दूसरे को पहचानने से साफ इंकार कर दिया। चेहरे पर न कोई शिकन, न कोई घबराहट। गजब की आपसी समझदारी थी। सुना है कि जब रसूखदार आरोपी आमने-सामने थे, तब यह कह पड़े कि अच्छा फलाना आदमी यही है क्या? अखबार में इनके बारे में पढ़ रखा है। जांच एजेंसी के अफसर भी कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। हल्की मुस्कान के बीच शायद मन में यह सोच लिया कि आदमी कितना भी मजबूत क्यों न हो एक दिन ढह ही जाता है। फिलहाल ढहने का इंतजार किया जा रहा है। 

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करतूत

सत्ता के केंद्र में बैठे एक बड़े चेहरे के निर्वाचन क्षेत्र से शिक्षा महकमे की शर्मनाक करतूत सामने आई है। विभाग के कुछ भ्रष्ट अफसरों ने पूरे इलाके के स्कूलों में वसूली का धंधा चला रखा है। प्रिंसिपलों और शिक्षकों को फर्जी जांच के नाम पर डराया-धमकाया जा रहा है। हाल ही में इन अफसरों ने फर्जीवाड़े का जाल बुनकर एक महिला शिक्षिका को निशाना बनाने की कोशिश की और उससे मोटी रकम की मांग की। जब शिक्षिका ने घूस देने से साफ इनकार कर दिया, तो अधिकारियों ने रंजिश में उसे निलंबित कर दिया। निलंबन का हास्यास्पद तर्क यह दिया गया कि मोबाइल ऐप पर तो अटेंडेंस दर्ज है, लेकिन मैन्युअल रजिस्टर में हस्ताक्षर छूट गए हैं। अफसरों को अंदाज़ा नहीं था कि इस अन्याय के खिलाफ गांव और स्कूली बच्चे एक साथ सड़क पर उतर आएंगे। शिक्षिका के समर्थन में जन-आक्रोश देखकर अफसरों की हेकड़ी काफूर हो गई है। अब मसला सत्ता की चौखट तक पहुंच चुका है। जब तक दो चार कौंवों को मारकर सरकार टांगेगी नहीं, तब तक ऐसे कौंवों का हौसला बुलंद होता रहेगा। 

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कलई

हुक्मरानों ने फैसला सुनाया था कि सूबे के तमाम शहरों में ‘अटल’ यादों का ऐसा बगीचा सजाया जाएगा, जहां धातु से बनी अमर शख्सियत की मूर्ति जगमगाएगी। इसके लिए सरकारी खजाने का मुंह खोलते हुए नगरीय प्रशासन ने हरी पत्तियां उछाल दी थी। इसके बाद ताकतवर महारथियों ने नियम-कायदों का गला घोंटना शुरू कर दिया। टेंडर तो बस दिखावा था, असली खेल तो पीछे से उन खास दुकानदारों से मूर्तियां खरीदने का चल रहा था, जिन्हें शायद हुनर का ह भी न आता हो। देश के मशहूर मूर्तिकार ने तब ही अफसरों को बाकायदा चिट्ठी लिखकर कान खींचने की कोशिश की थी। यह कहा था कि कच्चे उस्तादों को यह काम मत दो, बहुत बड़ा रायता फैलेगा! पर अफसोस हमारा सिस्टम तो कुंभकर्णी नींद का शौकीन है। चेतावनी को रद्दी की टोकरी में डालकर अनाड़ी उस्तादों से वन टू का फोर करते हुए मूर्तियों की धकाधक सप्लाई ले ली। बस फिर क्या था? मौसम बदला और बारिश की पहली ही बूंदों ने सिस्टम की कलाकारी का पानी उतार दिया। धातु के नाम पर खड़ी की गई मूर्तियों का असली रंग उधड़कर सामने आ गया। बारिश की बौछारों ने धातु का नकाब नोच डाला और अंदर से चटकती सीमेंट की परतें झांकने लगी। तमाशा देखकर खुद सत्ताधारी दल के स्थानीय आका की रूह कांप उठी और उन्होंने हाय-तौबा मचा दी।  सिस्टम हरकत में आया। बड़े सूरमाओं को बचाने के लिए रस्म-ए-कार्रवाई निभाई गई।

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सीबीआई जांच !

राज्य में बाघों के शिकार के तार अब सिर्फ स्थानीय जंगलों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इसके पीछे एक अंतर्राज्यीय और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के सक्रिय होने की खबर है। इसी गंभीरता को देखते हुए मामला सीबीआई को सौंपने की तैयारी की जा रही है। इंद्रावती टाइगर रिजर्व और उससे सटे इलाकों में हुई शिकार की हालिया घटनाओं ने इस काले कारोबार का पर्दाफाश किया है। शुरुआती जांच में न केवल अंतर्राज्यीय तस्करों, बल्कि कुछ स्थानीय मुखबिरों और पुलिसकर्मियों की सांठगांठ की बात भी सामने आई है। चूंकि तस्करी का यह जाल सरहदों के पार तक फैला है, इसलिए राज्य सरकार इसे केंद्रीय जांच एजेंसी को सुपुर्द करने पर विचार कर रही है। जंगल के राजा को शायद यह मुगालता था कि राष्ट्रीय प्रतीक होने के नाते वे इस तंत्र में सुरक्षित हैं। बेचारों को क्या मालूम था कि शिकारियों की नज़र में उनकी इस राजकीय हैसियत की कोई कीमत नहीं। उनके लिए तो बाघ महज महंगी खाल, चमकीले दांत, मूंछ और नाखूनों का सौदा है।

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अभयदान !

राजनीति का सबसे पसंदीदा खेल है- कयासबाजी! सत्य और अफवाह के ठीक बीचो बीच बसती है यह दुनिया, जहां जितनी गपशप होगी, राजनीति उतनी ही गर्माएगी। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के सियासी गलियारे में आजकल एक ही चर्चा आम है, दीपक बैज को दिल्ली से मिला अभयदान और बाबा की उम्मीदों पर लगा लंबा ब्रेक! कांग्रेस के भीतर के पावर कॉरिडोर में फुसफुसाहट है कि संगठन में सर्जरी का इरादा फिलहाल टाल दिया गया है। कहते हैं कि इसके तार दिल्ली में हुई उस सामूहिक घेराबंदी से जुड़े हैं, जहां भूपेश बघेल गुट के कई आदिवासी नेता अचानक अवतरित हो गए थे। दबाव साफ था कि अगर बैज की छुट्टी हुई, तो कुर्सी पर कोई आदिवासी ही बैठेगा। आखिर बीजेपी के आदिवासी सीएम का काट आदिवासी अध्यक्ष से ही तो होगा। नतीजा? दिल्ली ने फिलहाल वेट एंड वॉच का बटन दबा दिया है। दीपक बैज की कुर्सी बच गई है और बाबा के खाते में एक बार फिर तारीख-पर-तारीख यानी सिर्फ इंतज़ार दर्ज हो गया है।

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