Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

रुतबा और रुआब

नए नवेले कलेक्टर साहब को लगा था कि उन्हें रुतबे वाली कुर्सी मिल गई, मगर वो यह भूल बैठे थे कि राजनीति का रुआब अच्छे-अच्छे रुतबों का पानी निकाल देता है। रुतबे और रुआब में बड़ा फर्क है। रुतबा यानी मान-सम्मान-प्रभाव और रुआब यानी धाक-धमक-रौब। अब भला व्यवस्था के इस खेल में मंत्री जी के सियासी रौब के आगे कलेक्टर की बिसात ही क्या है? कलेक्टर साहब चले थे कानून का डंडा चलाने! जुर्म भी क्या था? एक निजी अस्पताल की छोटी सी लापरवाही से महज तीन महिलाओं की जान ही तो गई थी। अब बताइए करोड़ों की आबादी वाले इस राज्य में तीन जानें क्या मायने रखती हैं? पर नहीं, कलेक्टर साहब के भीतर का सिंघम जाग गया था। उन्होंने आव देखा न ताव सीधे अस्पताल पर ताला जड़ दिया। ताला लगाने से पहले यह तो देख लेते कि उस अस्पताल की नींव ईंट-गारे से नहीं, सत्ता के गलियारों में बैठे माननीयों के आशीर्वाद से बनी है। जैसे ही कलेक्टर साहब ने ताला लगाया उसका दर्द माननीय मंत्री जी के दिल में उठ पड़ा। बस फिर क्या था। माननीय ने कलेक्टर को फोन घुमाया। उन्होंने कहा- देख लो भाई, अपना ही आदमी है। अब कायदा तो यही कहता था कि कलेक्टर साहब तुरंत फोन पर साष्टांग दंडवत करते और कहते- हुजूर अभी देख लेता हूं। मगर कलेक्टर साहब को उनका रुतबा याद आ गया। दो टूक कह बैठे ‘ना’। अब ‘ना’ शब्द सियासतदारों की डिक्शनरी में सबसे बड़ा गुनाह माना जाता है। इस एक ‘ना’ ने माननीय के अत्यंत संवेदनशील दिल को इतनी गहरी ठेस पहुंचाई कि उनका दिल पल भर में पत्थर हो गया। उन्हें अस्पताल में दम तोड़ने वाली उन तीन महिलाओं की चीखें सुनाई नहीं दीं। आखिर सुनाई देती भी कैसे? सत्ता के बड़े सौदों के शोर में ऐसी छोटी-मोटी आवाजें दब जाया करती हैं। वैसे भी मंत्री बनना और बने रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए न जाने कितनी बार जमीर गिरवी रखनी पड़ती है। तय था कि कलेक्टर को उनकी गुस्ताखी की सजा मिलेगी। स्क्रिप्ट पहले से तैयार थी। कैबिनेट की बैठक हुई। बैठक में तय एजेंडों पर जब बात खत्म हई और अफसर अपनी फाइलें समेटकर कमरे से बाहर निकले, तब मंत्री जी के सब्र का बांध टूट गया। उन्होंने भरे गले से अपना दुख बाकी मंत्रियों के सामने रखा। उन्होंने कहा, एक अदना सा कलेक्टर मेरी बात नहीं सुनता। बाकी मंत्रियों के दिल में भी साथी मंत्री के लिए सहानुभूति की लहर दौड़ गई। आखिर आज उनके साथी की मूंछ कटी है, कल उनकी भी कट सकती थी। सो एक सुर में फैसला हुआ और कलेक्टर साहब रातों रात निपटा दिए गए। कलेक्टर की कुर्सी खिसक गई और उनका रुतबा धरा का धरा रह गया। सिस्टम में रहते हुए कलेक्टर साहब जितना सुलझे रहते, उतना उलझने से बच सकते थे।

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गृहयुद्ध

सत्ता के सबसे बड़े पावर सेंटर की नाक के ठीक नीचे एक नगर निगम है। इस नगर निगम में तमाशा चल रहा है। नगर सरकार के दो टुकड़े हो चुके हैं। पार्षदों के दिलों में आग सुलग रही है। जब यह आग इतनी भड़क गई कि उसकी आंच पार्टी मुख्यालय तक पहुंचने लगी, तब पार्टी ने अपने एक प्रदेश महामंत्री को फायर ब्रिगेड बनाकर भेजा। शायद मंशा यही थी कि बेकाबू आग पर ठंडे पाने की बौछार से काबू पाया जा सके। प्रदेश महामंत्री ने बंद कमरे में सत्तारूढ़ दल के सभी पार्षदों की एक बैठक बुलाई। प्रदेश महामंत्री ने सबसे पहले सबके मोबाइल फोन कमरे के बाहर रखवा दिए। उन्हें इस बात का डर था कि यदि पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की अभद्र भाषा बाहर आ गईं तो पार्टी की शुचिता और अनुशासन के नारे का मुखौटा उतर जाएगा, लेकिन प्रदेश महामंत्री यह भूल गए थे कि जब जूतम पैजार के हालात बनते हैं, तब बंद कमरे की दीवारों में दरारें खुद ब खुद आ जाती है। अंदर की गूंज दीवारों को चीरकर बाहर आ गई। बंद कमरे के भीतर शहर की बदहाली पर कोई आंसू नहीं बहा रहा था। वहां तो सीधे-सीधे महापौर और एमआईसी मेंबर पर कमीशनखोरी के आरोप मढ़े जा रहे थे। पार्षदों का गुस्सा साफ था। वे इस बात से दुखी थे कि शहर को लूटा जा रहा है और इस लूट के वे हिस्सेदार नहीं हैं ! खैर, संगठन के एक आला नेता बताते हैं कि इस पूरे गृहयुद्ध की पटकथा महापौर ने खुद ही लिखी थी। चुनाव के समय उन्होंने हर दूसरे पार्षद को एमआईसी की कुर्सी का झुनझुना थमाया था। मगर सत्ता हाथ आते ही उन्हें सिर्फ सगे संबंधी और खास लोगों में ज्यादा योग्यता दिखाई पड़ी। जिनके हाथ झुनझुना था, वे खुद को ठगा महसूस करने लग गए। वक्त बीतता चला गया। जिन चंद लोगों को कुर्सी मिली उनके पेट और तिजोरी दोनों बड़े होने लगे। यह देखकर बाकी पार्षदों के पेट में मरोड़ उठना लाजमी था। नाराज पार्षदों के भीतर सुलग रही आग को ठंडा करने फायर ब्रिगेड बनकर पहुंचे प्रदेश महामंत्री भी थक हार कर उल्टे मुंह लौट आए। इधर नगर सरकार में चल रहा तमाशा अब भी जारी है। 

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सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट 

संविदा भर्ती की अपनी एक तयशुदा और पेचीदा प्रक्रिया है। सामान्य प्रशासन विभाग के कड़े नियम-कायदे और फिर वित्त महकमे की मंजूरी। कुल मिलाकर इन तमाम कागजी शर्तों और औपचारिकताओं के कटीले रास्तों से गुजरकर ही संविदा नियुक्ति की वैतरणी पार होती है, लेकिन अगर आप यह जानना चाहते हैं कि नियमों के इस अभेद्य किले में सेंध कैसे लगाई जाती है और व्यवस्था को कैसे बायपास किया जाता है, तो आपको ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। नया रायपुर की मुख्य सड़क से गुजरते हुए जरा बाएं मुड़िए और सीधी रेखा पर चलते-चलते सीधे हाथ पर शान से खड़े अरण्य भवन का रुख कर लीजिए। इसी अरण्य भवन ने नौकरशाही को एक नया हुनर सिखाया है कि रिटायरमेंट के बाद चहेते अफसरों को उनकी मोटी पेंशन का पूरा-पूरा लाभ दिलाते हुए सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट जैसे मखमली पदों के जरिए पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग का मलाईदार तोहफा कैसे दिया जाता है! अरण्य भवन के गलियारों से छनकर आने वाली खबरें बताती हैं कि यदि कोई भाग्यशाली रिटायर्ड आईएफएस हैं, तो उन्हें सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट के रूप में करीब 4500 रुपए प्रतिदिन की दिहाड़ी पर रख लिया जाता है। वहीं अगर कोई अफसर स्टेट फॉरेस्ट सर्विस से रिटायर हुआ हो, तो उसे करीब 3500 रुपए प्रतिदिन की दिहाड़ी दी जाती है। मधुर संबंधों के आधार पर सरकारी गाड़ी और घरों में जी-हुजूरी के लिए अर्दली तक की मुफ्त सेवाएं खैरात में बांट दी जाती हैं। चूंकि महकमे को सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट्स की फौज खड़ी करने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग या वित्त विभाग की बंदिशों की दरकार है नहीं, सो फाइलें दनादन दौड़ती हैं और मनमाने ढंग से अपनों को रेवड़ियां बांट दी जाती है। इस पूरे खेल का सबसे मजेदार और स्याह पहलू यह है कि कागजी तौर पर इन पुनर्जीवित अफसरों के पास कोई वित्तीय अधिकार नहीं होते। मगर जब ये स्पेशलिस्ट की हैसियत से अपनी कुर्सी पर बैठते हैं, तो विभाग के असली वित्तीय अधिकार रखने वाले मौजूदा मातहत अधिकारियों की रीढ़ कांपने लगती है। वे न चाहते हुए भी बेमन से इन बुजुर्ग साहेबानों के तैयार किए गए प्रस्तावों पर अपने दस्तखत की चिड़िया बिठाने पर मजबूर हो जाते हैं। नियमों की धज्जियां उड़ाती और व्यवस्था का उपहास करती यह जुगाड़-प्रणाली न जाने कब से निर्बाध रूप से चली आ रही है और व्यवस्था की आंखों में धूल झोंकने का यह उपक्रम चल रहा है। 

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गड्ढों में फंसा विकास

सूबे के अलग-अलग हिस्सों से टूटती, उखड़ती और दरकती सड़कों की तस्वीरें लगातार सामने आ रही हैं। ऐसा लगता है कि सड़कें अब चलने के लिए कम और यह याद दिलाने के लिए ज्यादा बची हैं कि सरकारी निर्माण की उम्र लगातार घट रही है। सड़कें राज्य की तरक्की की धमनियां होती हैं, लेकिन जब इन धमनियों में भ्रष्टाचार और लापरवाही के थक्के जम जाएं, तब विकास दौड़ नहीं सकता है। वह सिर्फ हांफते-हांफते रेंग सकता है। जरा इन दो तस्वीरों को देखिए। पहली तस्वीर राजनांदगांव के रेलवे ओवरब्रिज की है, जिसे चंद दिनों पहले ही लोगों के लिए खोला गया था। ओवरब्रिज की यह सड़क धंस गई और गुणवत्ता के दावों की पोल खुल गई। स्पीकर और सांसद को चिट्ठी लिखने की नौबत आ गई। दूसरी तरफ कवर्धा में प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत बनी सड़क का मेकअप कुछ ही दिनों में उधड़ गया। जब देश के प्रधान के नाम पर चलने वाली योजनाएं भी गुणवत्ता की गारंटी नहीं दे पा रही हो तो बाकी सब की चर्चा बेमानी हो जाती है। जानकार बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में सिंगल लेन सड़क बनाने का खर्च 80 लाख से लेकर डेढ़ करोड़ रुपए प्रति किलोमीटर तक आता है। प्रशासनिक गलियारों में यह फुसफुसाहट आम है कि सड़क की मंजूरी की कीमत ही प्रति किलोमीटर दस लाख रुपए तक वसूली जाती है। जाहिर है, जब कमीशनखोरी का यह खेल चलेगा, तो सड़कों की सेहत पर इसका असर पड़ेगा ही। कोई भी ठेकेदार अपनी जेब से तो इस घाटे की भरपाई करेगा नहीं। वह सड़क पर सिर्फ थूक-पॉलिश ही करेगा। नीति-नियंताओं और जिम्मेदारों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि राज्य के विकास को रफ्तार देने के लिए गड्ढामुक्त और मजबूत सड़कें चाहिए। फिलहाल हकीकत यह है कि सूबे का विकास खुद इन्हीं गड्ढों में फंसा हुआ है।

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भूपेश का बुखार

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को बीजेपी लाख गाली दे दे, लेकिन लगता है कि बीजेपी को रह-रह कर भूपेश नाम का बुखार चढ़ ही जाता है। अब देखिए तीजन बाई की याद में उनके गृहग्राम में एक म्यूजियम बनाने का जिक्र आया तो बीजेपी ने अपने X पोस्ट पर मुख्यमंत्री को बधाई देते-देते भूपेश बघेल लिख डाला। जाहिर है, चूक ही थी। मानवीय भूल हर किसी से हो जाती है, लेकिन इस चूक को भुनाने वाले भी बीजेपी के लोग ही निकले। स्क्रीन शाट ले ली और उसे वायरल कर दिया। कांग्रेसी ऐसा करते तो कोई बात न थी। कहते हैं कि घर का भेदी लंका ढाए। सो ढाहने वाले हर जगह होते हैं। बीजेपी के भीतर भी हैं। खैर, बीजेपी के X एकाउंट पर भूलवश हुई गलती को दुरुस्त किया जा चुका है, मगर अब स्क्रीन शाट बाजार में खूब वायरल हो रहा है। 

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एक सूची और..

लंबे इंतजार के बाद आईपीएस अफसरों का तबादला हुआ। 12 जिलों के एसपी समेत कुल 24 अफसर इधर से उधर कर दिए गए। कुछ का रूटिन तबादला होना था। कुछ शिकायतों के बाद बदले गए। सरकार तबादलों में अमूमन यही करती है। राजनांदगांव में बालाजी सोमावर की जगह अजय यादव आईजी बनाए गए हैं। बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के लिए मोर्चे पर लगाए गए अफसरों को मैदानी तैनाती दी गई है। जितेंद्र कुमार यादव को कबीरधाम, किरण चव्हाण को बालोद, गौरव राय को बलौदाबाजार-भाटापारा का एसपी बनाया गया है। राबिन्सन गुरिया जिला संभालते थे, अब रायपुर पश्चिम के डीसीपी के रूप में काम देखेंगे। इधर चंद्रमोहन सिंह, त्रिलोक बंसल, सुनील शर्मा को फिर से कप्तानी मिली है। चंद्रमोहन सिंह दंतेवाड़ा, त्रिलोक बंसल बेमेतरा और सुनील शर्मा सारंगढ़-बिलाईगढ़ के एसपी बनाए गए हैं। 2020 बैच के अफसरों को मलाल था कि दूसरे राज्यों में उनके बैचमैट्स बहुत पहले एसपी बन चुके हैं और उन्हें डीसीपी बनाकर काम चलाया जा रहा है, सो उन्हें जिले की कप्तानी दे दी गई है। मयंक गुर्जर सुकमा, उमेश गुप्ता बीजापुर, संदीप पटेल नारायणपुर भेजे गए हैं। न जाने क्यों इस सूची में स्मृतिक राजनाला और मोहला-मानपुर में तैनात चिराग जैन का नाम छूट गया। मुमकिन है कि देर सबेर उनकी भी सुध ली जाएगी। बिलासपुर से रजनीश सिंह, बस्तर से शलभ सिन्हा और कोरबा से सिद्धार्थ तिवारी के नामों की चर्चा तेज थी कि उन्हें इधर से उधर किया जाएगा, फिलहाल हालिया सूची में उनका नाम नहीं है। जल्द ही एक सूची और आने की खबर है। कमिश्नरेट से गए लोगों की भरपाई भी करनी है। चंद्रमोहन सिंह की जगह एसडीआरएफ में नई तैनाती नहीं हुई है।

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