
किरकिरी
इन दिनों सरकार इन्वेस्टमेंट जुटाने के लिए खूब पसीना बहा रही है। इतना कि अगर उसे सहेज लें, तो छोटी-मोटी सिंचाई परियोजनाएं शायद पूरी हो जाएंगी। सरकार के ख्वाब बड़े हैं। सरकार को लगता है कि जब निवेश आएगा तो राज्य की तकदीर बदलेगी। पिछले दिनों इस महान काम के लिए हुक्मरानों का एक हाई-प्रोफाइल डेलिगेशन पड़ोसी राज्य की चकाचौंध भरी राजधानी पहुंच गया। आगाज शानदार रहा। नुमाइंदों ने तरक्की के ऐसे कसीदे पढ़े कि लगा कि देश के विकास की असली कहानी यहीं से लिखी जा रही है। सब कुछ तय कार्यक्रम के मुताबिक चल रहा था, लेकिन किसे पता था कि दिन में जिस साख की इमारत को खड़ा किया जा रहा है, रात में उसे बदनामी का कफन ओढ़ा दिया जाएगा। दरअसल निवेश जुटाने की कमान जिस महकमे के कंधों पर थी, उस महकमे के एक साहब मधुशाला के नियमित मुसाफिर निकल गए। साहब की अंदरूनी प्यास जाग उठी थी। तरलता के कुछ पैग हलक के नीचे क्या उतरे, उनका सारा प्रशासनिक अनुशासन हवा हो गया। नशा सिर चढ़कर बोला तो प्रोटोकॉल और तमीज ने खुदकुशी कर ली। जब मुख्यमंत्री वहां पहुंचे, तब नशे में धुत्त साहब सुरक्षा घेरा तोड़कर सीधे उनके सामने जा धमके। बताते हैं कि साहब की जुबान लड़खड़ा रही थी, जब उन्होंने मुख्यमंत्री से हाथ मिलाते हुए उनका स्वागत किया। साहब का आत्मविश्वास बहुत हाई था, सो उन्होंने अपना परिचय कुछ यूं दिया मानो पूरा निवेश उन्हीं के भरोसे टिका हो। यह तो बस ट्रेलर था। असली तमाशा पांच सितारा होटल की उस रात में हुआ, जब साहब अपने कमरे का रास्ता भूल गए। वे दूसरे कमरे का दरवाजा पीटने लगे। वह जिस कमरे का दरवाजा पीट रहे थे, वहां एक अकेली महिला ठहरी हुई थी। साहब ने वहां खूब हुड़दंग मचाया। होटल प्रबंधन के लोगों को खूब मिन्नतें करनी पड़ी। सुबह जब साहब का नशा छंटा तो उनकी हेकड़ी काफूर हो गई। बदनामी के डर से उन्होंने आनन-फानन में वहां से चेक-आउट कर लिया। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। वापसी की फ्लाइट में कुछ घंटे की देरी थी। साहब ने मर्यादा ताक पर रखकर फिर बोतल खोल ली। इस बार नशे ने ऐसा टेक-ऑफ किया कि साहब जमीन पर ढह गए और उनकी फ्लाइट हवा में उड़ गई। अचेत साहब को घसीटते हुए दोबारा उसी होटल में ले जाया गया, लेकिन होटल प्रबंधन ने दो टूक कह दिया – साहब, अपना निवेश अपने पास रखिए, हमें अपने होटल की आबरू प्यारी है। होटल ने कमरा देने से साफ मना कर दिया। चर्चा है कि जब साहब ने लिखित माफीनामा दिया, तब जाकर उन्हें जगह दी गई। होटल मैनेजमेंट ने ले-देकर नाराज महिला को भी शांत कराया, वरना मामला पुलिस तक जाता तो सूबे की साख का सरेआम पोस्टमार्टम हो चुका होता। सरकार साख बनाने में जुटी है और इस किस्म के शराब खोर अफसर अपनी आदतों से किरकिरी कराने का कोई कसर नहीं छोड़ रहे। बेशक पीते लेकिन पीने का शौक नजाकत से भरा होना चाहिए था, हंगामे से नहीं।
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जादूगर
वैसे साहब की कारस्तानियों के कई किस्से विभाग में चर्चित रहे हैं। साहब की नीयत में खोट कोई नई बात नहीं है, बस इस बार फर्क इतना है कि रायता घर के बजाए पड़ोसी राज्य में फैला है। कुछ साल पहले की बात है कि उनके अधीनस्थ काम करने वाली एक महिला अफसर ने उन पर छेड़खानी का आरोप लगाया था। महिला अफसर ने पहले विभाग की विशाखा कमेटी के सामने शिकायत दर्ज कराई थी। साहब ने उनका खूब मान मनौव्वल किया, लेकिन बात नहीं बनी। तब थाने ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर लिया था। इस घटना के कुछ साल पहले भी उनके खिलाफ कुछ इस तरह का मामला ही सुर्खियों में आया था। तब आरोप एक समाजसेवी महिला ने लगाया था। खैर, बड़े-बड़े कांड करके भी जो बेदाग निकल जाए, उसे अफसर नहीं सरकारी रसूख रखने वाला जादूगर कहते हैं। निवेश के बाजार में एक वैधानिक चेतावनी दी जाती है। यह बताया जाता है कि निवेश बाजार के जोखिमों के अधीन है। साहब का यह किस्सा भी जिम्मेदारों की आंख खोलने जैसा है। अगली बार किसी राज्य के दौरे पर जाने से पहले होटल की हरकत को एक चेतावनी के रूप में लिया जाना ठीक होगा।
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सिस्टम में छेद
भले ही सूबे में सरकार बदल जाए, मगर दलालों का रसूख नहीं बदलता। प्रशासनिक तंत्र के सड़ चुके हिस्से का एक्सरे देखना हो, तो इस कड़वी हकीकत को गौर से देखिए। एक तरफ पीएससी घोटाले का शोर था, तो दूसरी तरफ उसी शोर की आड़ में एक शातिर ठग दर्जन भर परिवारों को जीते-जी उजाड़ रहा था। सरकारी नौकरी की आस में कुछ लोगों ने उसे अपनी गाढ़ी कमाई सौंप दी। किसी ने घर-बार बेचा, तो किसी ने पुरखों की जमीन-जायदाद दांव पर लगा दी। इस ठगी का पैटर्न ऐसा है कि अच्छे-अच्छों का माथा चकरा जाए। यह कोई गली-कूचे का अदना सा अपराधी नहीं था, जो छिपकर या अंधेरे में नोटों की गड्डियां गिनता। इसका जलवा तो यह था कि यह बेरोजगारों को सीधे सूबे के सबसे बड़े पावर सेंटर मुख्यमंत्री निवास के भीतर ले जाता था। वहां सोफे पर बैठाकर घंटों अपने रसूख का अहसास कराता और फिर बड़े सलीके से कहता, साहब अभी मीटिंग में व्यस्त हैं, काम पक्का समझिए, चलिए। मानो सत्ता के सबसे सुरक्षित केंद्र को इस ठग ने टूरिज्म स्पॉट बना दिया हो। भोले-भाले युवाओं को भी लगता कि जो शख्स मुख्यमंत्री निवास के सुरक्षा घेरे को खिलौना समझता हो, उसके लिए नौकरी लगाना कौन सी बड़ी बात है! पूर्ववर्ती सरकार से लेकर वर्तमान सरकार तक इस ठग का संपर्क रहा। खैर, मालूम चला है कि पीएससी के जरिए सीधे सरकारी कुर्सी दिलाने का दावा करते हुए उसने बाकायदा फर्जी नियुक्ति पत्र तक बांट दिए थे। महीनों के इंतजार के बाद जब दफ्तरों के ताले नहीं खुले तब जाकर पीड़ितों को अहसास हुआ कि उनके सपनों की डकैती हो चुकी है। जब पानी सिर से ऊपर गया और पीड़ितों ने अपनी खून-पसीने की कमाई वापस मांगी, तो यह रसूखदार रफूचक्कर हो गया। इसके बाद जो तमाशा हुआ वह हमारे सिस्टम की रही-सही साख को तार-तार कर देने के लिए काफी था। दुर्ग में पहली एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन पुलिस की चालान पेश करने की रफ्तार इतनी ढीली रही कि ठग को कोर्ट से अग्रिम जमानत का वीआईपी पास मिल गया। मामला राजधानी रायपुर पुलिस तक भी पहुंचा, मगर हालात ढाक के तीन पात ही रहे। सुना है कि अब जाकर बलौदाबाजार पुलिस ने कार्रवाई की कलम चलाई है। मगर सवाल यह है कि कलम पहले किसके दबाव में कांप रही थी? ठगी के इस गंदे खेल में सबसे ज्यादा थू-थू किसकी हुई? उस सरकारी व्यवस्था की, जिसके नाम का सिक्का खुलेआम बाजार में भुनाया गया? या एक अदद नौकरी की बांट जोहते उस मध्यमवर्गीय परिवार की, जिसके तरीके शायद गलत थे, मगर मजबूरियां और इरादे सच्चे थे? खैर, ठग मलाई खाकर और मूंछों पर ताव देकर कानून की कड़ियों के बीच से हंसता हुआ निकलता रहा और बदनामी की कालिख सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोगों के चेहरे पर पुतती रही। सिस्टम का यह छेद दरअसल कोई इत्तेफाक नहीं है, इसे जानबूझकर इतना बड़ा रखा गया है ताकि ऐसे रसूखदार मगरमच्छ जब चाहें तब कानून के जाल को फाड़कर निकल सके। जब तक व्यवस्था का यह छेद बंद नहीं होगा, बेरोजगारों के आशियाने ऐसे ही उजड़ते रहेंगे। सत्ता की चौखट इतनी कमजोर और खोखली नहीं होनी चाहिए कि कोई बहरूपिया उसकी आड़ लेकर सरेआम बेरोजगारों की जेब काट ले।
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मिलावटी शराब
सूबे में हुए कथित शराब घोटाले की जांच की आंच जब रसूखदारों तक पहुंची, तो पूर्ववर्ती सरकार के आबकारी मंत्री को भी सलाखों के पीछे दिन काटने पड़े। सबक लेने के लिए यह दृष्टांत पर्याप्त था। मगर इंसानी फितरत का यह सबसे स्याह पहलू है कि वह बदलाव के लिए पीढ़ियों का वक्त मांगती है। उम्मीद थी कि इतने बड़े महाघोटाले के पर्दाफाश के बाद सिस्टम संभलेगा। जवाबदेही तय होगी और शराब कारोबार में पसरी सड़ांध पर लगाम लगेगी, मगर सूबे की बदकिस्मती देखिए कि यह काला खेल आज भी उसी बेखौफ अंदाज में जारी है। सरकारी शराब दुकानों की रीढ़ मानी जाने वाली प्लेसमेंट कंपनियां इस पूरे सिंडिकेट की सबसे अहम कड़ी है। दुकानों में तैनात कर्मचारी इन्हीं कंपनियों के रहमोकरम पर रखे जाते हैं और यहीं से इस खेल की असली पटकथा लिखी जाती है। आबकारी विभाग समय-समय पर ओवर रेटिंग के खिलाफ दिखावे की कार्रवाई कर यह संदेश देने की कोशिश करता है कि व्यवस्था पर उसकी पैनी नजर है, लेकिन अब जो परतें खुल रही हैं, वे बताती हैं कि ओवर रेटिंग तो महज एक सतही बुखार है, असली बीमारी कहीं ज्यादा गहरी और जानलेवा है। हाल ही में एक जिले की पुलिस ने मिलावटी शराब के मामले में प्रकरण दर्ज किया। शुरुआती तौर पर यह सामान्य मिलावट का मामला लगा, लेकिन जैसे-जैसे जांच के पन्ने पलटे, पूरा नेक्सस उजागर होता चला गया। पुलिस को शायद खुद भी अंदाजा नहीं था कि उसने किस बर्रे के छत्ते में हाथ डाल दिया है। जांच में साफ हुआ कि इस मिलावटी शराब के पूरे लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन और वितरण तंत्र के पीछे सत्ताधारी दल के एक नेता का सीधा हाथ है। खेल सिर्फ शराब में पानी या केमिकल मिलाने तक महदूद नहीं था, कोलकाता से बाकायदा नकली होलोग्राम मंगाए जा रहे थे, ताकि मिलावटी जहर को सरकारी दुकान से खरीदी गई असली बोतल का लिबास पहनाया जा सके। यह नेता कोई अदना सा कार्यकर्ता नहीं है। राजधानी से लेकर न्यायधानी तक उसके रसूख के तार जुड़े हैं। बात साफ है कि रसूख का नशा हर सरकार में सिर चढ़कर बोलता है।
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त्रिमूर्ति
भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां पद की गरिमा बढ़ाने से ज्यादा मेहनत नेताओं को एडजस्ट करने के लिए नए-नए पद गढ़ने में होती है। कुछ साल पहले भाजपा ने भी राज्यों में मुख्यमंत्री के साथ दो-दो उप मुख्यमंत्री वाला फार्मूला लागू किया था। तर्क बड़ा सरल था, ‘एक अनार, सौ बीमार’ वाले दौर में क्यों न एक अनार के तीन हिस्से कर दिए जाएं, लेकिन अब दिल्ली के नीति-नियंताओं के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। वजह भी वाजिब है। जहां कभी एक म्यान में दो तलवारें नहीं समाती थी, वहां अब तीन-तीन पावर सेंटर खड़े हो गए हैं। हर उप मुख्यमंत्री इस बात पर नजर रखता है कि उसके रुतबे का एक इंच भी क्षरण न होने पाए। इसे देखते हुए अब पार्टी के भीतर नया ज्ञान प्रसारित हो रहा है। जहां गठबंधन सरकार हो, वहां उप मुख्यमंत्री का झुनझुना थमाना राजनीतिक मजबूरी है, लेकिन जहां जनता ने छप्पर फाड़कर पूर्ण बहुमत दिया हो, वहां दो-दो अतिरिक्त पावर सेंटर पालने का औचित्य क्या है? उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सरकारें मानो त्रिमूर्ति मॉडल पर चल रही हैं। दूसरी ओर हरियाणा, असम और पश्चिम बंगाल में भाजपा ने उप मुख्यमंत्री का फार्मूला ही नहीं रखा। भाजपा ने अपने पिछले फैसलों को देखते हुए बड़ा आमूलचूल परिवर्तन किया है। सुना है दिल्ली में उप मुख्यमंत्री के मॉडल की समीक्षा चल रही है। अगर बदलाव की बयार चली तो छत्तीसगढ़ इससे अछूता कैसे रहेगा? दिलचस्प यह है कि पिछली कांग्रेस सरकार ने ढाई-ढाई साल वाले फार्मूले के साइड इफेक्ट से बचने के लिए टी.एस. सिंहदेव को डिप्टी मुख्यमंत्री बनाया था। तब भाजपा ने इसे सत्ता बचाने की बैसाखी बताया था, लेकिन सत्ता में आते ही भाजपा ने भी वही काढ़ा दोगुनी खुराक के साथ पी लिया। खैर, वैसे छत्तीसगढ़ की राजनीति ऊपर से जितनी शांत दिखाई देती है, भीतर उसका अंडरकरेंट उतना ही तेज रहता है। अगर दिल्ली ने उप मुख्यमंत्री वाला फार्मूला डिलीट करने का बटन दबा दिया, तो यहां के राजनीतिक समीकरणों में हल्का कंपन नहीं होगा, सीधा भूचाल आएगा। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व दूर की सोचता है। उसे मालूम है कि आज जो नेता एक ही फ्रेम में मुस्कुराकर तस्वीर खिंचवा रहे हैं, कल को उनके बीच क्रेडिट लेने की होड़ मच सकती है। धान के कटोरे में जब तीन-तीन दावेदार अपनी-अपनी लाठी लेकर खड़े होंगे, तो फसल का बंटवारा मुश्किल हो जाएगा। सबसे ज्यादा असमंजस में नौकरशाही रहती है। जैसे ही पावर बैलेंस बदलने की चर्चा उठती है, अफसर वेट एंड वॉच मोड में चले जाते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि सियासत की जिस ट्रेन में सफर करना है, वह सिंगल इंजन वाली है, डबल इंजन वाली है या फिर डबल डिप्टी इंजन वाली। हालांकि बीजेपी के लिए यह फैसला आसान नहीं है। राजनीति में किसी को पद पर बैठाना जितना सरल होता है, उतना ही कठिन उसे सम्मान के साथ उस कुर्सी से उतारना होता है। इसलिए फिलहाल दिल्ली भी पत्ते नहीं खोल रही। खैर, सियासत में जब तक पत्ता गिर न जाए, तब तक हवा का रुख भांपना भी गुनाह है।
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कांग्रेस का नया अध्यक्ष कौन?
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही पॉलिटिकल सस्पेंस चल रहा है। 21 जून को राहुल गांधी छत्तीसगढ़ आए तो थे जिला अध्यक्षों को संगठन कैसे चलाएं? का पाठ पढ़ाने, लेकिन जाते-जाते बड़े-बड़े दिग्गजों के दिलों की धड़कनें बढ़ा गए। राहुल गांधी ने कुछ नेताओं के साथ वन टू वन चर्चा की है। उमेश पटेल के साथ भी उनकी वन टू वन चर्चा हुई है। कहा जा रहा है कि इस सीक्रेट टॉक में उमेश पटेल को कुछ विशेष ज्ञान मिला है। बहरहाल, बाज़ार की अफवाहों की मानें तो पार्टी में एक बार फिर 2018 वाले सुपरहिट फार्मूले पर लौटने की तैयारी है। यानी एक अध्यक्ष और दो कार्यकारी अध्यक्ष। एक चर्चा यह भी है कि अगस्त महीने में टी एस सिंहदेव के सिर पर प्रदेश अध्यक्ष का सेहरा सजाया जा सकता है। उमेश पटेल को लेकर पहले यह ख़बर थी कि उन्हें विधानसभा में उप नेता प्रतिपक्ष बनाया जाएगा, लेकिन बस्तर के लखेश्वर बघेल ने वहां बाजी मार ली। अब जब वहां पत्ता कटा है, तो संगठन में उनके नाम का पत्ता खुलना तय है। उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा सकता है। बस्तर का कोटा भी संगठन में पूरा करना होगा, लिहाजा चर्चा है कि सावित्री मंडावी या विक्रम मंडावी में से किसी एक को भी कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा सकता है। अब कांग्रेस में यह सब बदलाव वाक़ई होगा या फिर सावन के अंधे को हरा हरा दिखने जैसी अफ़वाह होगी। यह वक्त बताएगा।
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9 जिला, 4 संभाग
छत्तीसगढ़ के पुलिस महकमे में तबादले तो अक्सर होते रहते हैं, लेकिन कुछ नियुक्तियां अपने साथ एक अलग कहानी लेकर आती हैं। बस्तर रेंज के नए आईजी बनाए गए बद्रीनारायण मीणा की तैनाती भी ऐसी ही कहानी का हिस्सा है। मीणा छत्तीसगढ़ के उन चुनिंदा अधिकारियों में शामिल हैं, जिन्होंने राज्य के सबसे अधिक जिलों में एसपी के रूप में काम किया है। वह बलरामपुर-रामानुजगंज से लेकर कवर्धा, राजनांदगांव, जगदलपुर, कोरबा, बिलासपुर, रायपुर, रायगढ़ और दुर्ग तक कुल नौ जिलों की कमान संभाल चुके हैं। मैदानी पुलिसिंग के लगभग हर रंग को उन्होंने करीब से देखा है। नक्सल प्रभावित इलाकों से लेकर औद्योगिक शहरों और राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिलों तक। आईजी के तौर पर भी उनका सफर कम दिलचस्प नहीं रहा। दुर्ग, रायपुर और बिलासपुर संभाग के बाद अब बस्तर उनके खाते में जुड़ गया है। यानी राज्य के चार प्रमुख संभागों में आईजी रहने का रिकॉर्ड भी उनके नाम दर्ज हो गया है। बद्रीनारायण मीणा केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर इंटेलिजेंस ब्यूरो में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। नौ जिलों की कप्तानी और तीन संभागों की सरदारी के बाद मीणा अब बस्तर ने नया अध्याय लिख रहे हैं।
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