दुनिया भर के मुसलमानों के लिए ईद खुशी, इंसानियत और भाईचारे का प्रतीक है. ईद का अर्थ होता है बार-बार आने वाली खुशी. आमतौर पर लोग दो ईद पर्व को जानते हैं. लेकिन असल में मुसलमान साल में तीन बार ईद मनाते है, ईद-उल-फ़ितर, ईद-उल-अजहा और ईद मिलाद-उन-नबी. तीनों ईद का अपना अलग महत्व और संदेश है.   

तीनों ईद में क्या फर्क है?

ईद-उल-फितर

ईद-उल-फ़ितर को मीठी ईद भी कहा जाता है. यह रमजान के महीने के खत्म होने के बाद मनाई जाती है . एक महीने तक रोजा रखने के बाद जब चांद दिखाई देता है, तो अगले दिन ईद का जश्न होता है. इस दिन लोग नमाज अदा करते है. जकात देते है और एक-दूसरे को गले लगाकर मुबारक बाद देते हैं. घरों में सेवइयां और मीठे पकवान बनाए जाते है, जो इस त्योहार की एक प्रमुख  पहचान हैं.

ईद-उल-अजहा (बकरीद)

ईद-उल-अजहा, जिसे बकरीद कहा जाता है. इस्लामिक कैलेंडर के आखिरी महीने जीलहिज्जा की 10वीं तारीख को मनाई जाती है. इस साल भारत में यह 28 मई को मनाई जाएगी . यह त्योहार हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है. जब उन्होंने अल्लाह के हुक्म पर अपने बेटे की कुर्बानी देने की तैयारी दिखाई थी. इस दिन मुसलमान जानवर की कुर्बानी करते हैं और उसका मांस जरूरतमंदों में बांटते है. इसका हज से भी गहरा संबंध है.

ईद मिलाद-उन-नबी

ईद मिलाद-उन-नबी पैगंबर हजरत मोहम्मद के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है. इस दिन लोग उनके जीवन और शिक्षाओं को याद करते है. कई जगहों पर जुलूस और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जबकि कुछ लोग इसे सादगी से मनाते हैं. गरीबों को खाना खिलाना और मदद करना भी इस दिन की एक अहम परंपरा है. तीनों ईद अलग-अलग संदेश देती है, रोजा के बाद खुशी, कुर्बानी का जज्बा और पैगंबर के आदर्शों का सम्मान. यही ईद की असली खूबसूरती है.

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