Automobile Desk : भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग बहुत जल्द एक ऐतिहासिक बदलाव का गवाह बनने जा रहा है। आने वाले 5 से 7 वर्षों में देश की सड़कों पर दौड़ने वाले 90 प्रतिशत नए वाहन केवल ईंधन या बैटरी से नहीं, बल्कि एडवांस्ड सॉफ्टवेयर और इंटरनेट से संचालित होंगे। चाहे चार पहिया वाहन हों, दोपहिया गाड़ियां हों या इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर, सॉफ्टवेयर आधारित तकनीक इनके काम करने के पूरे तरीके को पूरी तरह री-डिजाइन करने वाली है।

डिजिटल सुरक्षा तकनीक से जुड़ी प्रमुख वैश्विक संस्था ‘आईडीईएमआईए सिक्योर ट्रांजैक्शंस’ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राहुल टंडन के अनुसार, ऑटो इंडस्ट्री अब तेजी से ‘सॉफ्टवेयर-डिफाइंड व्हीकल’ (SDV) के युग में प्रवेश कर रही है। जिस तरह स्मार्टफोन को समय-समय पर अपडेट करके नए फीचर्स दिए जाते हैं, ठीक उसी तरह भविष्य की गाड़ियां भी ‘ओवर-द-एयर’ (OTA) सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए बिना गैरेज जाए नई तकनीक और फीचर्स प्राप्त कर सकेंगी।

अब तक वाहन का इस्तेमाल उसकी खरीदारी वाले दिन के फीचर्स तक सीमित रहता था, लेकिन इंटरनेट कनेक्टिविटी इस व्यवस्था को पूरी तरह बदलने वाली है। भारतीय बाजार में पेट्रोल-डीजल वाहन औसतन 10 से 15 साल और इलेक्ट्रिक वाहन 15 से 20 साल तक चलते हैं। ऐसे लंबे जीवनकाल में रिमोट कनेक्टिविटी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाएगी। ऑटोमोबाइल निर्माता वाहन बेचने के बाद भी उसके पूरे जीवनचक्र के दौरान सॉफ्टवेयर के जरिए नई सुविधाएं जोड़ सकेंगे और उसकी परफॉर्मेंस को दूर बैठे सुधार सकेंगे।

इस वैश्विक क्रांति में ‘ई-सिम’ (eSIM) तकनीक वाहन निर्माताओं की सप्लाई चेन को पूरी तरह से सुव्यवस्थित करने में मदद करेगी। वर्तमान में अलग-अलग देशों के दूरसंचार नियमों के अनुसार गाड़ियों में फिजिकल सिम और अलग हार्डवेयर लगाने पड़ते हैं, जिससे इन्वेंट्री प्रबंधन काफी जटिल हो जाता है। eSIM के आने से यह झंझट खत्म हो जाएगा। ऑटो कंपनियां एक ही हार्डवेयर तैयार कर सकेंगी और जिस देश में वाहन बेचा जाएगा, वहां के स्थानीय नेटवर्क को दूर से ही सॉफ्टवेयर के जरिए सक्रिय कर दिया जाएगा।

भारत में इस डिजिटल बदलाव का आधार मजबूत हो चुका है। देश में 4G नेटवर्क का व्यापक जाल पहले से बिछा है और 5G का विस्तार भी तेजी से जारी है। शुरुआत में गाड़ियों में इंटरनेट कनेक्टिविटी का उपयोग केवल जीपीएस लोकेशन ट्रेस करने तक सीमित था, लेकिन अब यह व्हीकल हेल्थ मॉनिटरिंग, एडवांस्ड फ्लीट मैनेजमेंट और ऑटोमेटेड ट्रांसपोर्ट सिस्टम का मुख्य हिस्सा बन रही है।

जैसे-जैसे वाहन इंटरनेट से जुड़ेंगे, हैकिंग और डेटा चोरी का जोखिम भी तेजी से बढ़ेगा। कार में मौजूद कोई भी ऑनलाइन कनेक्टेड सॉफ्टवेयर साइबर अपराधियों के लिए एंट्री पॉइंट बन सकता है। इस खतरे से निपटने के लिए विशेषज्ञ पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी जैसी आधुनिक सुरक्षा परतों पर काम कर रहे हैं। कंपनियों को ना केवल मजबूत तकनीक तैयार करनी होगी, बल्कि अलग-अलग देशों के सख्त डेटा और साइबर सुरक्षा कानूनों का भी पालन करना होगा।