रायपुर. छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में खनिज क्षेत्र की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है. राज्य खनिज संपदा से समृद्ध है और यही कारण है कि खनन गतिविधियां न केवल औद्योगिक विकास बल्कि राजस्व और स्थानीय रोजगार का भी प्रमुख आधार रही हैं. लेकिन लंबे समय तक यह क्षेत्र पारदर्शिता की कमी, मैनुअल प्रक्रियाओं, अवैध खनन और राजस्व क्षति जैसी चुनौतियों से जूझता रहा. पिछले दो वर्षों में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने इन चुनौतियों को अवसर में बदलने की दिशा में कई व्यापक और तकनीक आधारित सुधार लागू किए हैं, जिनके परिणाम अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं.

राज्य में खनन क्षेत्र के आधुनिकीकरण की सबसे महत्वपूर्ण पहल “खनिज ऑनलाइन 2.0” के रूप में सामने आई है. वर्ष 2017 में लागू पुराने पोर्टल की सीमाओं को दूर करते हुए विकसित इस नई डिजिटल व्यवस्था ने खनन संचालन को पूरी तरह तकनीक आधारित बनाया है. अब खदानों से जुड़े अधिकांश कार्य—जैसे ई-रॉयल्टी पर्ची, ई-अभिवहन पारपत्र और राजस्व संग्रहण—बिना मानवीय हस्तक्षेप के ऑनलाइन संचालित हो रहे हैं. इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ी है बल्कि खदान संचालकों को कार्यालयों के चक्कर लगाने से भी राहत मिली है. खदान मालिक अब अपने घर या खदान स्थल से ही 24×7 सेवाओं का लाभ ले पा रहे हैं और विभाग को खदानों की रियल टाइम मॉनिटरिंग की सुविधा प्राप्त हुई है.

खनन से प्राप्त राजस्व के सामाजिक उपयोग को प्रभावी बनाने के लिए जिला खनिज संस्थान न्यास (डीएमएफ) में भी महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं. डीएमएफ का उद्देश्य खनन प्रभावित क्षेत्रों और वहां के लोगों का समग्र विकास है, लेकिन पूर्व में स्वीकृतियों की मैनुअल व्यवस्था और मनमानी प्रक्रिया के कारण इसकी पारदर्शिता पर सवाल उठते रहे. इन्हीं चुनौतियों को दूर करने के लिए वर्तमान सरकार के द्वारा डीएमएफ निधि से होने वाले समस्त कार्यों की समुचित निगरानी, वित्तीय स्वीकृति, प्रबंधन एवं नियंत्रण और उत्तरदायिता के लिए “डीएमएफ पोर्टल 2.0” लागू किया गया है. नई व्यवस्था के तहत खनन क्षेत्रों में अब सामाजिक सर्वेक्षण और बेसलाइन अध्ययन को अनिवार्य बनाया गया है, ताकि यह तय हो सके कि प्रभावित क्षेत्रों में वास्तव में किस प्रकार के विकास कार्यों की आवश्यकता है. ग्रामीणों की सहभागिता, पंचवर्षीय योजना और डिजिटल निगरानी के माध्यम से डीएमएफ को उसके मूल उद्देश्य—जनहित और जवाबदेही—से जोड़ा गया है.

खनन क्षेत्र में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देने के साथ-साथ राज्य सरकार ने रेत खदानों के संचालन में भी व्यापक सुधार किए हैं. पहले अलग-अलग नियमों और मैनुअल आबंटन व्यवस्था के कारण रेत की उपलब्धता और कीमतों में असमानता बनी रहती थी तथा मानवीय हस्तक्षेप की आशंका रहती थी. वर्ष 2025 से लागू नई एकीकृत नीति के तहत अब रेत खदानों का आबंटन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ई-टेंडर के माध्यम से किया जा रहा है. इसके तहत प्रदेश में लगभग 200 नई रेत खदानों की नीलामी हो चुकी है. इससे रेत की उपलब्धता अधिक व्यवस्थित हुई है और उपभोक्ताओं को रियायती दरों पर भी मिल रही है.छत्तीसगढ़ गौण खनिज साधारण रेत (उत्खनन तथा व्यवसाय) नियम 2025 के अंतर्गत नई नीति में “रेत उपलब्धता अनुबंध” का प्रावधान विशेष रूप से उल्लेखनीय है. पहले न्यूनतम उत्पादन सुनिश्चित करने की व्यवस्था नहीं होने के कारण वास्तविक उत्पादन छिपाकर राजस्व चोरी की शिकायतें सामने आती थीं. अब खनन योजना और पर्यावरण स्वीकृति में निर्धारित मात्रा के अनुरूप रॉयल्टी जमा करना अनिवार्य कर दिया गया है. इससे न केवल राजस्व संरक्षण होगा बल्कि अवैध उत्खनन पर भी प्रभावी अंकुश लगेगा.

खनन सुधारों का एक महत्वपूर्ण सामाजिक आयाम बस्तर संभाग के आदिवासी परिवारों से जुड़ा है. यहां टिन खनिज संग्रह करने वाले आदिवासी समूहों को पहले नकद भुगतान किया जाता था, जिससे पारदर्शिता और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां थीं. अब आधार आधारित डिजिटल भुगतान प्रणाली विकसित की जा रही है, जिससे राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में स्थानांतरित होगी. साथ ही, खनिज टिन की खरीद दर 640 रुपये से लगभग चार गुना बढ़ाकर प्रति किलो 2800–2900 रुपये तक किया गया है. इससे आदिवासी परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना बनी है और खनिज संपदा का लाभ सीधे स्थानीय समुदायों तक पहुंचाने की दिशा मजबूत हुई है.

इन नीतिगत सुधारों का प्रत्यक्ष प्रभाव राज्य के खनिज राजस्व पर भी दिखाई दिया है. खनिज क्षेत्र में पारदर्शिता, डिजिटल नियंत्रण और सुव्यवस्थित संचालन के कारण राज्य को 16 हजार 757 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ है, जो इस क्षेत्र में सुधारों की सफलता का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है.
दूसरी ओर, सरकार ने अवैध खनन, परिवहन और भंडारण पर नियंत्रण को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी है. सीमित फील्ड स्टाफ और पारंपरिक निगरानी प्रणाली के कारण अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण कठिन हो रहा था. इसे देखते हुए राज्य में ड्रोन निगरानी और ई-चेक गेट प्रणाली को पायलट परियोजना के रूप में लागू किया जा रहा है. पांच ड्रोन के माध्यम से खदानों की निगरानी और दस प्रमुख परिवहन मार्गों पर ई-चेक गेट स्थापित करने की मंजूरी दी गई है. इससे खनन गतिविधियों की तकनीकी निगरानी और त्वरित कार्रवाई संभव होगी. गौण खनिज नियमों में भी कठोर संशोधन किए गए हैं. अवैध उत्खनन और परिवहन के मामलों में अब न्यूनतम 25 हजार रुपये अर्थदंड और प्रति टन दो हजार रुपये की दर से वसूली का प्रावधान किया गया है. वहीं, साय सरकार ने जप्त वाहनों की सक्षम न्यायालय से सुपुर्दगी प्राप्त करने के लिए 50 हजार से तीन लाख रुपये तक की जमानत राशि निर्धारित की है. इससे अवैध खनन में शामिल तत्वों पर प्रभावी दबाव भी बना है.

खनन क्षेत्र में तकनीक आधारित निगरानी की दिशा में “माइनिंग सर्विलांस सिस्टम” भी महत्वपूर्ण पहल है. प्रदेश में वर्तमान में 1900 से अधिक गौण खनिजों की खदानें स्वीकृत है. डोलोमाइट, क्वार्टजाइट और फायरक्ले जैसी व्यावसायिक गौण खनिज खदानों की अब सैटेलाइट के माध्यम से निगरानी की जा रही है. स्वीकृत क्षेत्र के बाहर खनन की स्थिति में विभाग को रियल टाइम सूचना प्राप्त होती है और परीक्षण कर तत्काल कार्रवाई की जा रही है.
ऑनलाइन अभिवहन पास की अनिवार्यता ने भी अवैध परिवहन और भंडारण पर अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. पिछले पांच वर्षों में अवैध उत्खनन, परिवहन और भंडारण के 29 हजार से अधिक मामलों में कार्रवाई कर लगभग 84 करोड़ रुपये से अधिक का अर्थदंड वसूला गया है. यह बताता है कि सरकार अब खनन क्षेत्र में केवल नीतिगत सुधार ही नहीं, बल्कि कठोर प्रवर्तन पर भी समान रूप से बल दे रही है.
स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ में खनन क्षेत्र अब केवल राजस्व संग्रह का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि तकनीक, पारदर्शिता, सामाजिक उत्तरदायित्व और सुशासन का उदाहरण बनता जा रहा है. डिजिटल प्लेटफॉर्म, निगरानी तंत्र, कठोर नियम और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर आधारित ये सुधार न केवल खनिज राजस्व में वृद्धि सुनिश्चित कर रहे हैं, बल्कि खनन गतिविधियों को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और जनहितकारी भी बना रहे हैं. आने वाले समय में इन पहलों के व्यापक परिणाम प्रदेश की अर्थव्यवस्था और खनन प्रभावित समाज—दोनों के लिए सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकते हैं.
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