गोरखपुर. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर AIIMS की कार्यकारी निदेशक डॉ. विभा दत्ता की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें प्राइवेट अस्पताल ले जाना पड़ा. इस घटना ने संस्थान की स्वास्थ्य सुविधाओं और सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. जिस AIIMS से पूर्वांचल और पश्चिमी बिहार के लाखों मरीजों को बेहतर इलाज की उम्मीद है, वहां हार्ट के मरीजों के लिए जरूरी कैथ लैब अब तक शुरू नहीं हो पाई है.
हालांकि, सामने आई जानकारी के मुताबिक डॉ. दत्ता को कैथ लैब की जरूरत थी. AIIMS में यह सुविधा उपलब्ध नहीं थी. इसलिए उन्हें करीब आधे घंटे के लिए प्राइवेट अस्पताल ले जाया गया. वहां जरूरी प्रक्रिया के बाद वह वापस AIIMS लौट आईं. मामला केवल एक अधिकारी के इलाज का नहीं है. सवाल यह है कि आम मरीजों को ऐसी स्थिति में कितनी परेशानी उठानी पड़ती होगी.
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निदेशक के मामले ने खोली सुविधाओं की पोल
AIIMS की कार्यकारी निदेशक को ही इलाज के लिए दूसरे अस्पताल जाना पड़ा. इससे संस्थान की तैयारियों पर सवाल उठ रहे हैं. आम मरीजों के सामने भी गंभीर बीमारी के समय रेफर होने या निजी अस्पताल का खर्च उठाने की मजबूरी हो सकती है.
पांच साल बाद भी कैथ लैब शुरू नहीं
गोरखपुर AIIMS का उद्घाटन 7 दिसंबर 2021 को हुआ था. इसके बावजूद अब तक कैथ लैब शुरू नहीं हो सकी है. हार्ट के गंभीर मरीजों के लिए यह सुविधा बेहद जरूरी है. इसके अभाव में मरीजों को दूसरी जगह भेजना पड़ता है.
दिसंबर तक शुरू होने का दावा
AIIMS प्रशासन के मुताबिक कैथ लैब का करीब 70 फीसदी काम पूरा हो चुका है. मशीनें और उपकरण आने बाकी हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसे दिसंबर तक शुरू करने की तैयारी है. इसके बाद एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी और पेसमेकर लगाने जैसी सुविधाएं मिल सकेंगी.
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सरकार और प्रशासन से जवाब मांगते सवाल
गोरखपुर AIIMS का उद्देश्य पूर्वांचल के 14 जिलों और पश्चिमी बिहार के पांच जिलों के मरीजों को बेहतर इलाज देना था. लेकिन पांच साल बाद भी जरूरी सुविधा का इंतजार खत्म नहीं हुआ. सवाल है कि परियोजना की निगरानी किस स्तर पर हुई? कैथ लैब शुरू करने में देरी की जवाबदेही किसकी है? सरकार और स्वास्थ्य प्रशासन को बताना चाहिए कि मरीजों को पूरी सुविधा कब मिलेगी. केवल नए संस्थान खोलना काफी नहीं है, उनमें जरूरी इलाज की व्यवस्था समय पर करना भी उतना ही जरूरी है.

