नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में संपत्ति खरीद-बिक्री के दौरान कम स्टाम्प ड्यूटी (stamp duty) चुकाने के लिए प्रॉपर्टी का मूल्य कम दिखाने की प्रवृत्ति पर अब सरकार ने सख्ती शुरू कर दी है। दिल्ली राजस्व विभाग (Delhi Revenue Department) ने सभी सब-रजिस्ट्रार और संयुक्त सब-रजिस्ट्रार कार्यालयों को संपत्ति पंजीकरण प्रक्रिया की गहन जांच के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों के अनुसार, सरकार का उद्देश्य प्रॉपर्टी के अंडर-वैल्यूएशन (Under-valuation) पर रोक लगाना और यह सुनिश्चित करना है कि सरकार को स्टाम्प ड्यूटी और पंजीकरण शुल्क की सही राशि प्राप्त हो। इसके लिए रजिस्ट्रेशन के दौरान संपत्तियों के घोषित मूल्य और निर्धारित सर्कल रेट (Circle Rate) का विशेष रूप से मिलान किया जाएगा।

निर्देशों के मुताबिक, यदि किसी संपत्ति का घोषित मूल्य सर्कल रेट से कम पाया जाता है, तो संबंधित मामलों की जांच कर कम आंकी गई राशि के आधार पर देय स्टाम्प ड्यूटी और अन्य शुल्क की वसूली की जाएगी। ऐसे मामलों में अधिकारियों को आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने के लिए भी कहा गया है।  राजस्व विभाग ने विशेष रूप से उन संपत्तियों पर नजर रखने को कहा है, जहां रिहायशी परिसरों में बेसमेंट को शामिल किया गया है।

सर्कल रेट वह न्यूनतम मूल्य होता है, जिसे राज्य सरकार किसी क्षेत्र की जमीन, मकान या अन्य संपत्तियों के लिए निर्धारित करती है। नियमों के अनुसार किसी संपत्ति की खरीद-बिक्री का पंजीकरण सर्कल रेट से कम मूल्य पर नहीं किया जा सकता। यदि किसी संपत्ति का बाजार मूल्य अधिक है, तो उसी के अनुसार मूल्यांकन किया जाता है, लेकिन पंजीकरण के लिए सर्कल रेट न्यूनतम आधार माना जाता है। वहीं स्टाम्प ड्यूटी वह शुल्क है, जो संपत्ति के पंजीकरण या दो अथवा अधिक पक्षों के बीच होने वाले कानूनी समझौतों और लेन-देन से जुड़े दस्तावेजों को रजिस्टर्ड कराने के लिए सरकार को दिया जाता है। यह शुल्क संपत्ति के मूल्य या निर्धारित सर्कल रेट के आधार पर तय किया जाता है।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद सर्कुलर जारी

सर्कुलर के अनुसार, यह प्रक्रिया इंडियन स्टाम्प एक्ट, 1899 की धारा 47-A के तहत लागू होगी। यह प्रावधान उन मामलों पर कार्रवाई की अनुमति देता है, जिनमें प्रॉपर्टी का मूल्यांकन कम करके दिखाया गया हो और सरकार को स्टाम्प ड्यूटी के रूप में कम राजस्व प्राप्त हुआ हो। अधिकारियों ने बताया कि यह सर्कुलर हाल ही में आए दिल्ली हाईकोर्ट(Delhi High Court) के एक आदेश के बाद जारी किया गया है, ताकि संपत्ति पंजीकरण प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता लाई जा सके और राजस्व हानि को रोका जा सके।

सर्कुलर में कहा गया है कि दिल्ली स्टाम्प (प्रिवेंशन ऑफ अंडर-वैल्यूएशन ऑफ इंस्ट्रूमेंट्स) रूल्स, 2007 के तहत अब संपत्ति मालिकों को अपनी प्रॉपर्टी का प्लिंथ एरिया और बिल्ट-अप एरिया स्पष्ट रूप से घोषित करना होगा। इसके अलावा, स्टाम्प ड्यूटी की गणना केवल भूमि के मूल्य के आधार पर नहीं, बल्कि घोषित क्षेत्रफल और निर्माण लागत को शामिल करते हुए की जाएगी। किसी संपत्ति की आंशिक बिक्री होने की स्थिति में उसका वास्तविक मूल्यांकन बेचे गए प्लिंथ एरिया (ढके हुए क्षेत्र) के अनुपात में किया जाएगा और स्टाम्प ड्यूटी भी उसी आधार पर तय होगी।

अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में वास्तविक बिल्ट-अप एरिया के बजाय अधिकतम प्लिंथ एरिया के आधार पर गलत गणना की जाती है, जिससे संपत्ति का मूल्य कम आंका जाता है और सरकार को राजस्व नुकसान होता है। सर्कुलर में विशेष रूप से रिहायशी संपत्तियों के बेसमेंट रजिस्ट्रेशन से जुड़े मामलों पर चिंता जताई गई है। विभाग के अनुसार, ऐसे कई मामलों में दस्तावेजों में दर्शाई गई कीमत संबंधित क्षेत्र के लागू सर्कल रेट के आधार पर निर्धारित मूल्य से कम पाई गई है। यही वजह है कि इन मामलों की अब अधिक बारीकी से जांच की जाएगी।

दिल्ली राजस्व विभाग ने सभी सब-रजिस्ट्रार और संयुक्त सब-रजिस्ट्रार कार्यालयों को निर्देश दिया है कि संपत्ति पंजीकरण के दौरान यदि घोषित मूल्य आधिकारिक सर्कल रेट से कम पाया जाता है, तो संबंधित पक्षों को लिखित रूप से सूचित किया जाए कि वे निर्धारित राशि से कम स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान कर रहे हैं। सर्कुलर में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इंडियन स्टाम्प एक्ट, 1899 की धारा 47-A और दिल्ली स्टाम्प (प्रिवेंशन ऑफ अंडर-वैल्यूएशन ऑफ इंस्ट्रूमेंट्स) रूल्स, 2007 के तहत ऐसे मामलों की जांच की जा सकती है, जहां संपत्ति का मूल्य वास्तविक से कम दर्शाया गया हो।

दस्तावेज ठीक करने का मिलेगा मौका

यदि किसी प्रॉपर्टी के दस्तावेज में सर्कल रेट से कम मूल्य दर्शाया गया है, तो संबंधित पक्षों को पहले उसे संशोधित करने और सही मूल्यांकन के अनुसार आवश्यक स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान करने का अवसर दिया जाएगा। दिल्ली राजस्व विभाग ने कहा यदि संबंधित पक्ष दस्तावेज में संशोधन करने में असफल रहते हैं या सर्कल रेट के अनुसार आवश्यक स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान नहीं करते, तो सब-रजिस्ट्रार और संयुक्त सब-रजिस्ट्रार ऐसे मामलों को स्पष्ट टिप्पणी के साथ दर्ज करेंगे। इसके बाद यह दस्तावेज आगे की कार्रवाई के लिए स्टाम्प कलेक्टर को भेज दिया जाएगा। स्टाम्प कलेक्टर को निर्देश दिया गया है कि उन्हें दस्तावेज प्राप्त होने के बाद अधिकतम 3 महीने के भीतर संबंधित मामलों का निपटारा करना होगा। इस दौरान वे कानून के अनुसार जांच प्रक्रिया आगे बढ़ाएंगे और संपत्ति के सही बाजार मूल्य का आकलन सुनिश्चित करेंगे। यह व्यवस्था इंडियन स्टाम्प एक्ट, 1899 की धारा 47-A (जैसा कि दिल्ली में लागू है) के तहत लागू की गई है।

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