कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। नगर निगम परिषद के इतिहास में पहली बार सदन का माहौल इतना गरमा गया कि बहस हाथापाई की नौबत तक पहुंच गई। जिस सदन में शहर के विकास और जनहित के मुद्दों पर चर्चा होनी थी, वहां पार्षद एक-दूसरे के आमने-सामने आ गए। हालात इतने बिगड़े कि नेता प्रतिपक्ष और अन्य पार्षदों को बीच-बचाव करना पड़ा, जबकि लगातार हंगामे के चलते परिषद की बैठक दो-दो बार स्थगित करनी पड़ी।

ये तस्वीरें ग्वालियर नगर निगम परिषद की हैं, जहां कुछ ही पलों में लोकतंत्र का मंच अखाड़े में तब्दील होता नजर आया। बहस के दौरान MIC सदस्य अवधेश कौरव, पार्षद अंकित कट्टल और पदेन सभापति गिर्राज कंसाना आमने-सामने आ गए। तीखी नोकझोंक के बीच मामला इतना बढ़ा कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की ओर बढ़ गए। स्थिति को बिगड़ता देख नेता प्रतिपक्ष सहित अन्य पार्षदों ने बीच-बचाव किया। हंगामा थमने का नाम नहीं ले रहा था,जिसके चलते परिषद की बैठक दो बार स्थगित करनी पड़ी। नगर निगम परिषद के इतिहास में पहली बार सदन के भीतर मारपीट जैसी स्थिति देखने को मिली।

वीओ-इस पूरे विवाद पर पदेन सभापति गिर्राज कंसाना का कहना है कि उन्होंने सदन में जांच समिति की रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिससे कुछ सदस्य नाराज हो गए। उनका दावा है कि उन्होंने केवल नियमों के अनुसार कार्यवाही संचालित करने और नियम पढ़वाने की बात कही थी, लेकिन इसे लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा कर दिया गया।

वहीं MIC सदस्य अवधेश कौरव ने परिषद की कार्यवाही पर गंभीर सवाल उठाए,उनका आरोप है कि बैठक नियमों के विपरीत संचालित की गई। उनके मुताबिक सभापति मनोज तोमर की अनुपस्थिति में पैनल-2 के सभापति को अध्यक्षता करनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय पैनल-3 की सभापति मंजू राजपूत को अध्यक्षता के लिए बैठाया गया। अवधेश कौरव ने यह भी सवाल उठाया कि 10 से अधिक जांच समितियों की रिपोर्ट अब तक सदन में क्यों पेश नहीं की गई और इसके लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

उधर पैनल-3 की सभापति मंजू राजपूत ने सदन में हुए घटनाक्रम पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों को संयम और मर्यादा का परिचय देना चाहिए। उनका कहना है कि परिषद की गरिमा बनाए रखना सभी पार्षदों की जिम्मेदारी है और जनहित से जुड़े मुद्दों पर शांतिपूर्ण एवं सार्थक चर्चा होनी चाहिए, न कि हंगामा और टकराव।

जनता ने पार्षदों को शहर के विकास, समस्याओं के समाधान और जनहित के मुद्दे उठाने के लिए चुना है, लेकिन इस परिषद बैठक में विकास की चर्चा से ज्यादा हंगामा सुर्खियों में रहा। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नगर निगम परिषद में आगे जनहित के मुद्दों पर गंभीर और सकारात्मक बहस होगी, या फिर राजनीतिक टकराव और हंगामा ही सदन की नई पहचान बनता जाएगा। यह सवाल सिर्फ ग्वालियर नगर निगम का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और जनता के भरोसे से भी जुड़ा हुआ है।

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