कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। हरियाणा में आर्थिक रूप से कमजोर और गरीब मरीजों को सस्ता या मुफ्त इलाज उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार द्वारा निजी अस्पतालों को रियायती दरों पर जमीन आवंटित की गई। हालांकि, इन अस्पतालों को जमीन देते समय लगाई गई गरीबों के इलाज की शर्तों के पालन और निगरानी को लेकर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि वर्षों बाद भी सरकार के पास इसका स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है कि कितने जरूरतमंद मरीजों को इस व्यवस्था का लाभ मिला।
जानकारी के अनुसार, गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला, हिसार, रेवाड़ी और सोनीपत में निजी अस्पतालों या अस्पताल समूहों को कुल 29 साइटें रियायती दरों पर आवंटित की गई हैं। इन भूखंडों के आवंटन का उद्देश्य केवल निजी स्वास्थ्य ढांचा खड़ा करना नहीं था, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस और गरीबी रेखा से नीचे यानी बीपीएल परिवारों को मुफ्त या रियायती दरों पर इलाज उपलब्ध कराना भी था।
शर्तों पर उठे सवाल
रियायती जमीन हासिल करने वाले अस्पतालों के लिए गरीब मरीजों को इलाज में राहत देने, निर्धारित संख्या में बेड आरक्षित रखने और कुछ सेवाएं मुफ्त या सब्सिडी पर उपलब्ध कराने जैसी शर्तें तय की गई थीं। वर्ष 2022 में नीति में बदलाव के बाद अस्पतालों में ईडब्ल्यूएस मरीजों के लिए इलाज की व्यवस्था को अधिक स्पष्ट करने का दावा किया गया था, लेकिन लोकायुक्त की कार्रवाई के दौरान सामने आया कि इसके प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी के लिए पर्याप्त व्यवस्था अब तक नहीं बन सकी है।
सवाल यह है कि जब अस्पतालों को बाजार दर से कम कीमत पर जमीन दी गई, तो बदले में गरीबों को मिलने वाले इलाज का हिसाब रखने की जिम्मेदारी किस विभाग की थी। स्वास्थ्य विभाग, हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण यानी एचएसवीपी और हरियाणा राज्य औद्योगिक एवं बुनियादी ढांचा विकास निगम यानी एचएसआईआईडीसी की भूमिका भी इस मामले में जांच के घेरे में है।
2016 से उठ रहा मामला
गरीब मरीजों को रियायती इलाज उपलब्ध कराने की शर्तों के पालन को लेकर शिकायतों का सिलसिला वर्ष 2016 से चल रहा है। शिकायतों के बावजूद लंबे समय तक प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए हैं। लोकायुक्त के समक्ष मामला पहुंचने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आया है।
लोकायुक्त ने कथित तौर पर इस बात पर चिंता जताई है कि संबंधित विभाग गरीब मरीजों के लिए तय व्यवस्था को लागू कराने और उसका रिकॉर्ड रखने का कोई प्रभावी तरीका विकसित नहीं कर पाए। यह भी सवाल उठाया गया है कि अस्पतालों में कितने ईडब्ल्यूएस और बीपीएल मरीजों को मुफ्त या रियायती इलाज दिया गया, इसका सत्यापन कौन करता है और इसकी रिपोर्ट कहां उपलब्ध है।
कई बड़े अस्पतालों का नाम
रियायती दरों पर आवंटित अस्पताल साइटों में गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला, हिसार, रेवाड़ी और सोनीपत के अस्पताल शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें गुरुग्राम के मेदांता, फोर्टिस और आर्टेमिस जैसे बड़े अस्पतालों के साथ-साथ फरीदाबाद, पंचकूला और अन्य जिलों के निजी अस्पताल भी शामिल हैं।
इन अस्पतालों को जमीन आवंटित करते समय गरीब मरीजों के लिए इलाज की सुविधा सुनिश्चित करने की शर्त रखी गई थी। मगर अब यह स्पष्ट नहीं है कि कितने अस्पतालों ने इन शर्तों का पालन किया, कितने मरीजों को लाभ मिला और नियमों का उल्लंघन करने वाले अस्पतालों के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई हुई।
सुरजेवाला ने सरकार पर साधा निशाना
कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने इस मामले को लेकर हरियाणा सरकार पर निशाना साधा है। उनका आरोप है कि भाजपा सरकार ने गरीबों के इलाज के नाम पर निजी अस्पतालों को सस्ती दरों पर जमीन तो उपलब्ध करा दी, लेकिन गरीब मरीजों के हितों की रक्षा के लिए निगरानी और जवाबदेही की कोई ठोस व्यवस्था नहीं बनाई।
सुरजेवाला का कहना है कि सरकार को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि 29 अस्पताल साइटों में से प्रत्येक अस्पताल को कितनी जमीन और किस दर पर दी गई। साथ ही, इन अस्पतालों में अब तक कितने ईडब्ल्यूएस और बीपीएल मरीजों का मुफ्त या रियायती दरों पर इलाज हुआ, कितने बेड गरीबों के लिए आरक्षित रहे और नियमों का पालन नहीं करने वाले अस्पतालों पर क्या कार्रवाई की गई—इसका पूरा विवरण सामने आना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार गरीबों के इलाज की शर्त लागू कराने में नाकाम रही है और निजी अस्पतालों को दी गई रियायत का वास्तविक लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाया। सुरजेवाला ने यह भी सवाल उठाया कि यदि सरकार के पास लाभार्थी मरीजों का आंकड़ा ही नहीं है, तो वह इस योजना की सफलता का दावा किस आधार पर कर रही है।जवाबदेही की मांगइस पूरे मामले में अब सरकार से अस्पतालवार जांच और सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करने की मांग उठ रही है। जरूरतमंद मरीजों के लिए हेल्पलाइन, ऑनलाइन पंजीकरण, अस्पतालों में अलग ईडब्ल्यूएस डेस्क और इलाज का नियमित ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं लागू करने की जरूरत बताई जा रही है।साथ ही, रियायती जमीन पाने वाले अस्पतालों के लिए तय शर्तों का उल्लंघन पाए जाने पर जुर्माना, जमीन का पुनर्मूल्यांकन या आवंटन रद्द करने जैसी कार्रवाई पर भी सरकार को स्पष्ट नीति बनानी होगी। गरीबों के इलाज के नाम पर दी गई सरकारी रियायत का लाभ वास्तव में गरीब मरीजों तक पहुंचा या नहीं, अब यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
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