दिल्ली की साकेत जिला अदालत ( Saket District Court) ने कहा हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम (Health insurance claim ) को केवल कागजी प्रक्रिया या अनुबंध का हिस्सा मानकर नहीं देखा जा सकता। यह किसी व्यक्ति के जीवन के सबसे कठिन समय में आर्थिक और चिकित्सकीय सहायता का महत्वपूर्ण माध्यम होता है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि स्वास्थ्य बीमा का उद्देश्य केवल औपचारिकताओं को पूरा करना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर मरीज को समय पर उपचार उपलब्ध कराना है। ऐसे में बीमा दावों के निपटारे में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का पालन किया जाना चाहिए। यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें आरोप है कि इलाज के दौरान हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम अस्वीकार किए जाने के कारण मरीज की स्थिति लगातार बिगड़ती गई और अंततः उसकी मृत्यु हो गई।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनुज अग्रवाल की अदालत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हर मेडिक्लेम फाइल के पीछे किसी परिवार की उम्मीद, संघर्ष और जीवन से जुड़ी चिंताएं छिपी होती हैं। अदालत ने Medi Assist Insurance TPA Private Limited द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जब कोई परिवार अपने प्रियजन को गंभीर बीमारी से जूझते हुए देखता है, तब स्वास्थ्य बीमा दावा केवल एक वित्तीय प्रक्रिया नहीं रह जाता। ऐसे समय में मेडिक्लेम क्लेम का खारिज होना महज पॉलिसी की शर्तों का अनुपालन नहीं, बल्कि मरीज और उसके परिजनों की उम्मीदों के टूटने जैसा होता है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि स्वास्थ्य बीमा से जुड़े मामलों को केवल तकनीकी या संविदात्मक नजरिए से नहीं देखा जा सकता। ऐसे दावों का सीधा संबंध मरीज के इलाज, उसके जीवन और परिवार की भावनात्मक तथा आर्थिक स्थिति से होता है।

3 साल की देरी पर कोर्ट सख्त

मामले में पत्नी की मृत्यु के बाद उसके पति ने न्याय की मांग को लेकर निचली अदालत का रुख किया था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि इलाज के दौरान बीमा दावा अस्वीकार किए जाने से परिस्थितियां बिगड़ीं, जिसके गंभीर परिणाम सामने आए। ट्रायल कोर्ट ने अप्रैल 2022 में मामले की सुनवाई के बाद बीमा कंपनी और उसकी थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर (टीपीए) कंपनी के खिलाफ आपराधिक साजिश और लापरवाही से जीवन को खतरे में डालने जैसे आरोपों के तहत समन जारी किए थे। इसके बाद इंश्योरेंस कंपनी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए पुनरीक्षण याचिका दायर की। हालांकि, यह याचिका लगभग तीन वर्ष की देरी से दाखिल की गई थी। मामले की सुनवाई करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने देरी को गंभीरता से लिया और कंपनी को राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इतनी लंबी देरी के लिए संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किए गए हैं, इसलिए देरी को माफ नहीं किया जा सकता।

जीवनरक्षक दवा के क्लेम पर उठा विवाद

यह मामला दिल्ली के कालकाजी निवासी धर्मवीर सिंह और उनकी दिवंगत पत्नी सुषमा सैनी से जुड़ा है। सुषमा सैनी मल्टीपल मायलोमा नामक एक गंभीर रक्त कैंसर से पीड़ित थीं और उनका इलाज कीमोथेरेपी के जरिए चल रहा था। अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, उपचार के शुरुआती चरण में बीमा कंपनी ने कुछ मेडिकल दावों को मंजूरी दी थी। हालांकि बाद में डॉक्टरों द्वारा आवश्यक बताई गई जीवनरक्षक दवा ‘बोर्टेजोमिब’(Bortezomib) के लिए किए गए क्लेम को बार-बार अस्वीकार कर दिया गया। शिकायत के मुताबिक, चिकित्सकों ने लिखित रूप से बीमा कंपनी को बताया था कि यह दवा मरीज के इलाज के लिए अत्यंत आवश्यक है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि समय पर क्लेम मंजूर नहीं होने और भुगतान में बाधा आने से उपचार प्रभावित हुआ। इसके बाद वर्ष 2018 में सुषमा सैनी का निधन हो गया। इसी घटना के बाद उनके पति ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और बीमा कंपनी तथा टीपीए की भूमिका पर सवाल उठाए।

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m