ऐसी सामान्य मान्यता है कि जो हर वक्त आसपास होगा वही ज़हन मे भी खास होगा। रोज़ की मुलाकात, हर दिन की बातचीत और दिन-रात के सुख-दुःख का हस्तांतरण हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन जाती हैं। इसके विपरीत, लंबे समय तक हमारी आँखों से ओझल रहने वाली प्यारी से प्यारी चीज़ पर भी वक्त की धूल चढ़ जाती है। धीरे-धीरे मन-मस्तिष्क उसकी अनुपस्थिति के लिए स्वयं को तैयार करने लगता है।

हालांकि डिजिटल युग ने भौतिक दूरी के इस गंभीर मसले को संभाल लिया है। मोबाइल और सोशल मीडिया ने दूर बैठे लोगों को भी सफलता पूर्वक एक दूसरे के संपर्क मे रखने का काम किया है। लेकिन फिर भी ऑनलाइन संपर्क किसी रिश्ते को पूरी तरह बचाए रखने वाला सम्पूर्ण विकल्प कभी नहीं हो सकता।

फासले रिश्तों का इम्तेहान है यह सच है दूरी रिश्ते खत्म कर सकती है मगर यह आवश्यक नहीं। फासले के बावजूद जीवित संबंध इस बात का भान ज़रूर कराते हैं कि रिश्ता कितना गहरा है। जिन संबंधों की नींव निकटता पर टिकी होती है दूरी बढ़ने पर वह निश्चित रूप से कमजोर पड़ जाती है। इसके उलट जिन रिश्तों में विश्वास, अपनापन और सच्ची भावनाएँ होती हैं वह संबंध वर्षों की दूरी के बावजूद कायम रहते हैं।

“Out of sight, out of mind.” अंग्रेजी की ये कहावत हमेशा से संदेहों मे रही है। क्योंकि रामचरितमानस में प्रेम की महत्ता बताते हुए कहा गया है- “रामहि केवल प्रेमु पिआरा।” सच्चा प्रेम बाहरी निकटता पर आधारित नहीं होता। प्रेम में व्यक्ति भौतिक रूप से भले ही दूर हो जाए लेकिन उसकी स्मृतियाँ और भावनाएँ मन के भीतर बनी रहती हैं।

जिस तरह दूरियाँ माँ-बेटे के रिश्तों को धूमिल नहीं कर सकती, परदेस मे रहने वालों के दिलों मे वतन की उल्फत कम नहीं कर सकती। बचपन के मित्र वर्षों बाद मिलें तो ऐसा महसूस होता है जैसे समय ने दोनों के बीच कोई दूरी पैदा ही न की हो। बहुत से लोग रोज़ हमारे आसपास होते हुए भी हमारे मन में कोई खास जगह नहीं बना पाते। इससे पता चलता है कि संबंधों पर दूरी का कम, भावनाओं का अधिक प्रभाव होता है। रिश्तों को यादों से नहीं, संवाद से बचाइए। छोटी-छोटी बातें रिश्तों में नई ऊर्जा भर देती हैं। अक्सर रिश्ते किसी बड़ी वजह से नहीं बल्कि छोटी-छोटी उपेक्षाओं से दूर होते हैं। आँखों से दूर रहने वाले को मन के समीप रखिए। संपर्क बनाए रखिए, संवाद बनाए रखिए और अपनापन जीवित रखिए।

सुमिरत जाहि मिटहिं अघ भारी। सोई कृपालु प्रणत हितकारी॥*रामचरितमानस की इस पंक्ति मे सच्चे स्मरण की शक्ति का बखान करते हुए कहा गया है कि स्मरण मनुष्य के भीतर सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। संक्षेप मे कहा जा सकता है “Out of sight, out of mind” हर रिश्ते में लागू नहीं होती। कुछ लोग नज़र से दूर होकर भी दिल के सबसे करीब रह सकते हैं। दूरी शरीरों के बीच हो सकती है सच्चे रिश्तों के बीच नहीं। अपनों का सम्मुख होना आवश्यक नहीं वह स्मृतियों मे भी आनंत काल तक जीवंत रह सकते हैं।

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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