चंडीगढ़। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राइट टू प्राइवेसी (निजता के अधिकार) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि किसी भी बालिग व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध शादी करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। किससे शादी करनी है या कब करनी है, यह पूरी तरह से व्यक्ति का निजी फैसला है और किसी भी परिवार को अपनी मर्जी थोपने का कोई अधिकार नहीं है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला मोहाली की रहने वाली एक एमबीए पास युवती से जुड़ा है। युवती ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बताया था कि वह अपने करियर पर ध्यान केंद्रित करने के लिए परिवार से अलग रह रही है। लेकिन उसके माता-पिता और रिश्तेदार उस पर अपनी पसंद के लड़के से शादी करने का लगातार दबाव बना रहे थे। युवती का आरोप है कि जब उसने इस शादी से इनकार किया, तो उसे घर बुलाकर जान से मारने की धमकी दी गई। इस मामले की शिकायत मोहाली के एसएसपी (SSP) से भी की गई थी, लेकिन जब पुलिस प्रशासन की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो न्याय की गुहार लेकर युवती को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की 3 बड़ी बातें

जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए संविधान के अनुच्छेद-21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला दिया और तीन बेहद तल्ख टिप्पणियां कीं।
विवाह संबंधी निर्णय किसी भी व्यक्ति के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक है। इसमें किसी भी तरह का बाहरी दबाव, पारिवारिक जबरदस्ती या ब्लैकमेलिंग कतई स्वीकार नहीं की जा सकती।
हर बालिग नागरिक को जीवन, गरिमा, निजता और स्वायत्तता का मौलिक अधिकार प्राप्त है। यह तय करना कि शादी करनी है या नहीं, या किससे करनी है, यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मूल हिस्सा है।
ऐसे मामलों में राज्य और पुलिस प्रशासन का यह पहला फर्ज है कि वे नागरिकों के जीवन और उनकी स्वतंत्रता की रक्षा करें।

हाईकोर्ट का एसएसपी को सख्त निर्देश

हाईकोर्ट ने मोहाली के एसएसपी को इस मामले में तुरंत संज्ञान लेने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी सबसे पहले युवती की सुरक्षा और खतरे के स्तर का आकलन करें। यदि उसकी जान या स्वतंत्रता को लेकर कोई वास्तविक खतरा नजर आता है, तो उसे तत्काल सुरक्षा मुहैया कराई जाए।