Business Desk – Stock Market Crash History : शेयर बाजार में गिरावट कोई असामान्य घटना नहीं है। सामान्य गिरावट में बाजार कुछ प्रतिशत नीचे आने के बाद संभल सकता है, लेकिन जब बिकवाली इतनी तेज हो जाए कि थोड़े समय में बाजार का बड़ा हिस्सा अपनी कीमत खोने लगे।

निवेशकों का भरोसा टूट जाए और डर के कारण बिकवाली और बढ़ती जाए, तो इसे आम तौर पर मार्केट क्रैश कहा जाता है। सामान्य तौर पर बाजार अपने उच्चतम स्तर से करीब 20% गिर जाए तो इसे बड़ी गिरावट या क्रैश की स्थिति के तौर पर देखा जाता है।
भारतीय शेयर बाजार ने भी ऐसे कई बड़े उतार-चढ़ाव देखे हैं। 1992 का हर्षद मेहता कांड, 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट और 2020 का कोविड क्रैश इसके बड़े उदाहरण हैं। तीनों की वजह अलग थी, लेकिन बाजार का व्यवहार काफी हद तक एक जैसा रहा—पहले तेजी और भरोसा, फिर बड़ा झटका और उसके बाद घबराहट में तेज बिकवाली।
1992: हर्षद मेहता कांड से टूटा बाजार का भरोसा
1992 का संकट भारतीय वित्तीय बाजार की सबसे बड़ी घटनाओं में शामिल है। इसके केंद्र में शेयर कारोबारी हर्षद मेहता थे। उस समय बैंकिंग और शेयर बाजार के बीच लेनदेन की व्यवस्था में कई खामियां थीं। इनका इस्तेमाल करके बड़ी मात्रा में पैसा शेयर बाजार में लगाया गया और कुछ शेयरों की कीमतें तेजी से बढ़ीं।
जनवरी 1992 में सेंसेक्स करीब 2,300 के स्तर पर था, जो अप्रैल में बढ़कर 4,467 तक पहुंच गया। लेकिन अप्रैल में बैंकिंग लेनदेन से जुड़ी गड़बड़ियां सामने आने लगीं। निवेशकों का भरोसा टूटा और भारी बिकवाली शुरू हो गई। 28 अप्रैल 1992 को सेंसेक्स करीब 12.77% गिरा।
इस संकट के बाद बाजार में निगरानी और नियमन को मजबूत करने की दिशा में बड़े बदलाव हुए। निवेशकों के लिए सबक था कि केवल शेयर की बढ़ती कीमत देखकर कंपनी को मजबूत नहीं माना जा सकता। उसकी कमाई और कारोबार को भी देखना जरूरी है।
2008: अमेरिका का संकट भारत तक पहुंचा
2008 का संकट वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से जुड़ा था। अमेरिका में हाउसिंग और सबप्राइम कर्ज संकट ने वित्तीय संस्थानों को कमजोर किया। जनवरी 2008 में सेंसेक्स 20,873 के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा था।
इसके बाद संकट बढ़ता गया। जुलाई में अमेरिकी वित्तीय संस्थाओं Fannie Mae और Freddie Mac को लेकर चिंता बढ़ी और सितंबर में Lehman Brothers के दिवालिया होने से हालात और बिगड़ गए। भारतीय बाजार में भी बिकवाली तेज हो गई।
RBI के अनुसार 9 मार्च 2009 तक सेंसेक्स जनवरी 2008 के शिखर से करीब 60.9% नीचे आ चुका था। इससे निवेशकों को समझ आया कि भारतीय बाजार वैश्विक अर्थव्यवस्था और विदेशी निवेश के असर से अलग नहीं है।
2020: कोरोना ने बाजार को अचानक हिला दिया
2020 का संकट पहले दोनों से अलग था। इस बार महामारी ने दुनियाभर की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया। लॉकडाउन के कारण कारोबार बंद हुए और कंपनियों की कमाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई।
23 मार्च 2020 को सेंसेक्स करीब 13.2% टूट गया। मार्च के निचले स्तर तक सेंसेक्स जनवरी के उच्च स्तर से लगभग 39% गिर चुका था। लेकिन इसके बाद सरकारों और केंद्रीय बैंकों के आर्थिक समर्थन, वैक्सीन की उम्मीद और गतिविधियां शुरू होने से बाजार ने तेजी से वापसी की। सितंबर 2021 तक सेंसेक्स 60,000 के ऊपर पहुंच गया।
तीनों क्रैश में एक जैसा था बाजार का व्यवहार
1992 में वित्तीय व्यवस्था की गड़बड़ी, 2008 में वैश्विक बैंकिंग संकट और 2020 में महामारी—तीनों की वजह अलग थी। लेकिन हर बार पहले तेजी आई, फिर किसी बड़े झटके ने भरोसा तोड़ा और उसके बाद डर ने बिकवाली को बढ़ा दिया।
एक निवेशक गिरावट देखकर बेचता है, दूसरा जोखिम कम करता है और संस्थागत निवेशक भी अपनी हिस्सेदारी घटा सकते हैं। अगर बाजार में लीवरेज यानी उधार के पैसे से निवेश ज्यादा हो, तो गिरावट और तेज हो सकती है।
क्रैश से पहले किन संकेतों पर नजर रखें?
अत्यधिक बढ़ी हुई कीमतें, कंपनियों की कमाई की तुलना में बहुत ज्यादा मूल्यांकन, ज्यादा कर्ज और ब्याज दरों में बड़ा बदलाव बाजार के लिए जोखिम बढ़ा सकते हैं। ब्याज दरें बढ़ने पर कर्ज महंगा होता है और निवेशकों को सुरक्षित विकल्पों में बेहतर रिटर्न मिलने लगता है।
इसलिए बाजार में बड़ी गिरावट से बचने का कोई पक्का तरीका नहीं है, लेकिन निवेशक कंपनी की कमाई, मूल्यांकन, कर्ज, ब्याज दर और वैश्विक परिस्थितियों को समझकर जोखिम जरूर कम कर सकता है।



