Business Desk – Home Loan vs Mutual Fund : जब भी किसी व्यक्ति के पास एकमुश्त बड़ी रकम आती है, तो अक्सर सलाह दी जाती है कि होम लोन प्रीपेमेंट करने के बजाय उस पैसे को म्यूचुअल फंड में निवेश कर दें. तर्क यह दिया जाता है कि अगर म्यूचुअल फंड औसतन 15% रिटर्न देता है.

होम लोन पर सिर्फ 8% ब्याज देना पड़ रहा है, तो निवेश से होने वाली कमाई (SWP) से हर महीने EMI भरते रहिए. कागज पर यह रणनीति आकर्षक जरूर लगती है, लेकिन 15 साल के वास्तविक आंकड़े इसकी एक अलग ही तस्वीर दिखाते हैं.

गणित सही, लेकिन बाजार हमेशा साथ नहीं देता

यह रणनीति तभी सफल हो सकती है, जब शेयर बाजार हर साल लगातार अच्छा रिटर्न देता रहे. लेकिन वास्तविकता में बाजार कभी तेजी से चढ़ता है तो कभी अचानक बड़ी गिरावट भी दर्ज करता है. ऐसे समय यदि आप सिस्टमैटिक विदड्रॉल प्लान (SWP) के जरिए हर महीने EMI भरने के लिए पैसा निकाल रहे हैं, तो गिरते बाजार में आपको कम कीमत पर ज्यादा यूनिट्स बेचनी पड़ती हैं.

यही वजह है कि निवेश का मूलधन तेजी से घटने लगता है. बाद में बाजार में रिकवरी आने पर भी पोर्टफोलियो पहले जैसी स्थिति में नहीं पहुंच पाता और लंबी अवधि का रिटर्न भी प्रभावित हो जाता है.

15 साल के रिकॉर्ड में क्या सामने आया?

1 करोड़ रुपए के होम लोन पर इस रणनीति को पिछले 15 साल के वास्तविक रिकॉर्ड पर परखा गया. नतीजे उम्मीद के बिल्कुल विपरीत निकले. चार अलग-अलग तरह के म्यूचुअल फंड्स के प्रदर्शन का विश्लेषण किया गया. इनमें से तीन फंड ऐसे रहे, जिनमें निवेश के अंत तक इतना पैसा भी नहीं बचा कि लोन पर दिया गया ब्याज पूरी तरह कवर हो सके. इतना ही नहीं, दो बड़े फंड्स में तो लोन की अवधि पूरी होने से करीब तीन साल पहले ही पूरा निवेश खत्म हो गया. इसके बाद बची हुई EMI सीधे अपनी जेब से भरनी पड़ी. हालांकि एक फंड ने अच्छा रिटर्न दिया, लेकिन यह गारंटी नहीं है कि भविष्य में हर बार ऐसा ही प्रदर्शन देखने को मिलेगा.

सबसे बड़ा खतरा मानसिक दबाव

यह रणनीति सिर्फ गणित तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मानसिक तनाव भी बढ़ाती है. जब बाजार गिरता है और पोर्टफोलियो की वैल्यू लगातार कम होती दिखाई देती है, तब भी हर महीने EMI भरनी होती है. ऐसे में कई निवेशक घबराकर घाटे में ही अपना निवेश बेच देते हैं, जिससे नुकसान और बढ़ जाता है.

नौकरी गई या मेडिकल इमरजेंसी आई तो क्या होगा?

इस रणनीति का सबसे कमजोर पक्ष यह है कि यह सामान्य परिस्थितियों पर आधारित होती है. यदि बीच में नौकरी चली जाए, आय कम हो जाए या परिवार में मेडिकल इमरजेंसी जैसी स्थिति बन जाए, तो EMI का बोझ और निवेश दोनों एक साथ संभालना मुश्किल हो सकता है. ऐसे हालात में पूरा वित्तीय प्लान बिगड़ सकता है.

आखिर किसे चुनना ज्यादा समझदारी है?

अगर आपके पास अतिरिक्त पैसा है और आपका लक्ष्य वित्तीय सुरक्षा है, तो पहले होम लोन का बोझ कम करना या उसे पूरी तरह चुकाना अधिक सुरक्षित विकल्प माना जाता है. इससे ब्याज का खर्च कम होता है, मासिक EMI खत्म हो जाती है और भविष्य के वित्तीय जोखिम भी घट जाते हैं. वहीं, यदि आपकी आय स्थिर है, पर्याप्त इमरजेंसी फंड मौजूद है और आप बाजार के उतार-चढ़ाव का जोखिम उठा सकते हैं, तभी म्यूचुअल फंड में निवेश कर EMI चलाने जैसी रणनीति पर विचार किया जा सकता है.